UP BJP President: कौन हैं वो 6 नेता? इन्ही में से कोई एक बनेगा यूपी भाजपा का अध्यक्ष, 2 ब्राह्मण का भी नाम
UP BJP President: उत्तर प्रदेश बीजेपी संगठन में बड़े फेरबदल की चर्चा महीनों से चल रही थी और अब यह फाइनल राउंड में पहुंच चुकी है। प्रदेश के सभी जिलाध्यक्षों की नियुक्ति पूरी हो चुकी है और पार्टी में संकेत मिल रहे हैं कि नया प्रदेश अध्यक्ष इसी महीने घोषित किया जा सकता है। सवाल सिर्फ इतना ही नहीं है कि नया अध्यक्ष कौन होगा, बल्कि यह भी कि बीजेपी किस जातीय संतुलन पर दांव लगाएगी। ब्राह्मण या ओबीसी या फिर पार्टी किसी सरप्राइज मूव के तहत दलित चेहरे को कमान सौंपेगी?
मौजूदा तस्वीर बताती है कि बीजेपी छह नेताओं के नामों पर गंभीरता से विचार कर रही है। ये छह चेहरे अलग-अलग सामाजिक वर्गों का प्रतिनिधित्व करते हैं और पार्टी के लिए 2027 के चुनावी रोडमैप में अहम भूमिका निभा सकते हैं। आइए जानते हैं, कौन हैं ये छह दिग्गज और क्यों इनके नाम सबसे ज्यादा चर्चा में हैं।

ब्राह्मण और ओबीसी के बीच फंसा समीकरण, दलित कार्ड भी हो सकता है मास्टरस्ट्रोक
बीजेपी में माना जा रहा है कि अगर ब्राह्मण और ओबीसी के बीच संतुलन बनाना मुश्किल हुआ, तो पार्टी दलित चेहरे को आगे करके विपक्ष के PDA नैरेटिव को सीधा जवाब दे सकती है। यही वजह है कि तीनों ही वर्गों से दो-दो नेताओं के नाम सबसे ऊपर चल रहे हैं ब्राह्मण वर्ग से दिनेश शर्मा और हरीश द्विवेदी, ओबीसी (लोध) से धर्मपाल सिंह और बीएल वर्मा और दलित नेताओं में रामशंकर कठेरिया और विद्यासागर सोनकर। इनमें से हर नाम अपने-अपने क्षेत्र, अनुभव और स्वीकार्यता के आधार पर किसी भी क्षण अंतिम चुनाव बन सकता है।
कौन हैं वो 6 नेता, जो यूपी भाजपा अध्यक्ष बनने की रेस में आगे हैं
🟡 1. डॉ. दिनेश शर्मा: तीन दशकों का अनुभव, संगठन से सरकार तक लंबी यात्रा
ब्राह्मण वर्ग से सबसे आगे माने जा रहे डॉ. दिनेश शर्मा बीजेपी के उन चुनिंदा नेताओं में हैं, जिन्होंने संगठन, सरकार और संसद तीनों जगह अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। लखनऊ में जन्मे दिनेश शर्मा RSS पृष्ठभूमि वाले परिवार से आते हैं और पेशे से प्रोफेसर रहे हैं।
उनकी राजनीतिक यात्रा 1987 में विद्यार्थी परिषद से शुरू हुई और आगे चलकर दो बार लखनऊ के मेयर बने। 2017 में वह उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री बने और विधान परिषद में नेता सदन की जिम्मेदारी निभाई। 2023 में उन्हें निर्विरोध राज्यसभा भेजा गया। उनका प्रशासनिक अनुभव और संगठन पर पकड़ उन्हें मजबूत दावेदार बनाता है।
🟡 2. हरीश द्विवेदी: एबीवीपी से लोकसभा तक पहुंचे, ब्राह्मण कोटे में सबसे मजबूत दावेदार
ब्राह्मण समुदाय से दूसरा बड़ा नाम है हरीश द्विवेदी का, जो संगठन में लगातार काम करते हुए केंद्र की राजनीति में भी अपनी पहचान बना चुके हैं। बस्ती के रहने वाले द्विवेदी 1991 में एबीवीपी से जुड़े और धीरे-धीरे संगठन की विभिन्न जिम्मेदारियों से होते हुए दो बार लोकसभा पहुंचे।
2014 और 2019 में उन्होंने बस्ती सीट से जीत हासिल की। हालांकि यह सीट 2024 में उनके हाथ से निकल गई, लेकिन पार्टी की राष्ट्रीय टीम में मंत्री और बिहार के सह प्रभारी जैसी जिम्मेदारियां उन्हें हमेशा केंद्रीय नेतृत्व के करीब रखती हैं। उन्हें ब्राह्मण चेहरा और संगठन का भरोसेमंद नेता माना जाता है।
🟡 3. धर्मपाल सिंह: चार बार के विधायक, OBC लोध समुदाय में मजबूत पकड़
बीजेपी अगर ओबीसी पर बड़ा दांव खेलती है, तो धर्मपाल सिंह इस रेस में एक अहम नाम हैं। बरेली जिले के लोधी परिवार में जन्मे धर्मपाल चार बार विधायक चुने जा चुके हैं और योगी सरकार में मंत्री हैं।
उन्होंने हमेशा अपने विधानसभा क्षेत्र आंवला में गहरी पकड़ बनाए रखी है और 2017 में सपा उम्मीदवार को हराकर दोबारा विधानसभा पहुँचे थे। उनके पास संगठन और सरकार दोनों का अनुभव है। लोधी समुदाय में उनकी स्वीकार्यता उन्हें OBC कार्ड के तौर पर मजबूत बनाती है।
🟡 4. बीएल वर्मा: लोध (OBC) नेता, मोदी सरकार में मंत्री और संगठन के कद्दावर चेहरे
बीएल वर्मा इस समय OBC समूह के सबसे चर्चित दावेदार हैं। बदायूं के रहने वाले वर्मा ने राजनीति बूथ स्तर से शुरू की और आज केंद्रीय मंत्री हैं। वह पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के करीबी रहे हैं और सुनील बंसल के विश्वसनीय नेताओं में गिने जाते हैं। संगठन में प्रदेश मंत्री से लेकर ब्रज क्षेत्र के अध्यक्ष और फिर भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष तक उन्होंने कई जिम्मेदारियाँ संभालीं।
राज्यसभा सदस्य और केंद्र में दो मंत्रालयों की जिम्मेदारी ने उनकी राजनीतिक साख और बढ़ा दी है। संगठन में उनकी पकड़ और OBC समाज पर प्रभाव उन्हें शीर्ष रेस में बनाए हुए है।
🟡 5. रामशंकर कठेरिया: दलित चेहरे में सबसे मजबूत, RSS प्रचारक और इटावा-आगरा बेल्ट में गहरी पकड़
अगर बीजेपी दलित नेता को आगे करती है, तो सबसे प्रमुख नाम कठेरिया का ही है। इटावा के रहने वाले कठेरिया आरएसएस के 13 साल तक प्रचारक रहे हैं और दलित समाज पर उनका गहरा अध्ययन रहा है।
इटावा-मैनपुरी-आगरा बेल्ट में उनकी लोकप्रियता पार्टी के लिए यादव बहुल क्षेत्रों में संगठन विस्तार का बड़ा मौका साबित हो सकती है। वह दो बार सांसद रहे हैं और केंद्र में मंत्री भी रह चुके हैं। पार्टी नेतृत्व के कई गुटों में उनकी स्वीकार्यता उन्हें संभावित 'सरप्राइज पिक' बना सकती है।
🟡 6. विद्यासागर सोनकर: जमीन से जुड़े नेता, बूथ अध्यक्ष से एमएलसी तक का सफर
दूसरे दलित दावेदार के तौर पर विद्यासागर सोनकर का नाम तेजी से उभर रहा है। 1985 में बूथ अध्यक्ष बने सोनकर ने धीरे-धीरे नगरपालिका, जिलाध्यक्ष, सांसद, एमएलसी और संगठन के कई अहम पदों पर काम किया।
RSS पृष्ठभूमि और पूर्वांचल में मजबूत पकड़ उन्हें एक संतुलित चेहरा बनाती है। काशी और गोरखपुर प्रांत में उनके काम ने उन्हें संगठन का भरोसेमंद विकल्प बनाया है। उनकी जमीन से जुड़ी छवि और साफ-सुथरी पहचान उन्हें एक सुरक्षित चुनाव भी बनाती है।
छह नाम, कई समीकरण... लेकिन फैसला होगा राजनीति के तात्कालिक संदेश पर
यूपी बीजेपी अध्यक्ष का चुनाव केवल जातीय गणित नहीं, बल्कि 2027 के चुनावों की रणनीति भी तय करेगा। इन छह नामों में से जो भी चुना जाएगा, वह संगठन की दिशा और चुनावी तैयारी दोनों पर असर डालेगा। अब बस इंतजार है बीजेपी के उस ऐलान का, जो यूपी की राजनीति में नया समीकरण खड़ा कर सकता है और आने वाले महीनों का राजनीतिक एजेंडा तय करेगा।












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