UP BJP President: किस जाति से होगा यूपी का अलगा भाजपा अध्यक्ष? जातीय गणित में फंसी कुर्सी, कौन मारेगा बाजी?
UP BJP President Caste Factor: उत्तर प्रदेश में बीजेपी के नए प्रदेश अध्यक्ष को लेकर सियासी सरगर्मी तेज हो गई है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले संगठन में बड़े बदलाव की तैयारी है और इसी कड़ी में सबसे अहम फैसला है - यूपी बीजेपी का नया अध्यक्ष कौन होगा।
मौजूदा अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी का कार्यकाल पूरा हो चुका है और दिल्ली से लेकर लखनऊ तक मंथन का दौर जारी है। हाल ही में राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और जेपी नड्डा से मुलाकात ने इस चर्चा को और तेज कर दिया है।

🟡 10 साल से ओबीसी के हाथ में संगठन की कमान
बीते एक दशक का सियासी ट्रैक रिकॉर्ड देखें तो साफ पता चलता है कि बीजेपी ने यूपी संगठन की कमान लगातार ओबीसी समुदाय को सौंपी है। 2014 के बाद पहले केशव प्रसाद मौर्य, फिर कुर्मी समाज से आने वाले स्वतंत्र देव सिंह और उसके बाद जाट समाज के भूपेंद्र चौधरी को जिम्मेदारी दी गई। यानी पार्टी गैर-यादव ओबीसी को लगातार साधने में जुटी रही है। अब सवाल यही है कि मौर्य, कुर्मी और जाट के बाद अगली बारी किसकी होगी।
🟡 गैर-यादव ओबीसी पर फिर दांव!
बीजेपी की पूरी रणनीति फिर से गैर-यादव ओबीसी को मजबूत करने की दिख रही है। पार्टी को पता है कि यादव वोट बैंक समाजवादी पार्टी के साथ मजबूती से जुड़ा हुआ है, ऐसे में कुर्मी, मौर्य, लोध, निषाद और पाल जैसी जातियां ही चुनावी जीत की चाबी बन सकती हैं। यही वजह है कि नए अध्यक्ष के लिए लोध, निषाद और पाल समाज के नाम सबसे ज्यादा चर्चा में हैं।
🟡 लोधी समाज - पुराना भरोसा, मजबूत पकड़
लोधी समाज बीजेपी का पारंपरिक वोट बैंक माना जाता है। कल्याण सिंह के दौर से इस समाज का पार्टी से गहरा रिश्ता रहा है। यूपी सरकार में धर्मपाल सिंह, संदीप सिंह और केंद्र में बीएल वर्मा जैसे चेहरे इस समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं। संदीप सिंह स्वर्गीय कल्याण सिंह के पोते हैं, जिससे भावनात्मक जुड़ाव भी पार्टी को फायदा दे सकता है। वहीं बीएल वर्मा को दिल्ली दरबार का करीबी माना जाता है। अगर बीजेपी लोधी समाज पर दांव लगाती है तो इन नामों में से किसी एक की किस्मत खुल सकती है।
🟡 निषाद समाज - पूर्वांचल की चुनावी ताकत
निषाद समाज यूपी का लगभग 6 फीसदी वोट बैंक माना जाता है। यह समाज पूर्वांचल से लेकर पश्चिमी यूपी तक फैला हुआ है। मछुआरा, केवट, बिंद, कश्यप जैसी उपजातियों के रूप में इसका प्रभाव कई जिलों में निर्णायक है। इस समाज से साध्वी निरंजन ज्योति और बाबूराम निषाद जैसे नाम सबसे आगे चल रहे हैं। बाबूराम निषाद संगठन के पुराने सिपाही माने जाते हैं, जबकि निरंजन ज्योति केंद्रीय राजनीति में मजबूत पहचान रखती हैं। अगर बीजेपी निषाद समाज पर दांव खेलती है तो यह पूर्वांचल में बड़ी सियासी बढ़त दे सकता है।
🟡 पाल समाज - अतिपिछड़ा लेकिन गेमचेंजर
पाल समाज यूपी की आबादी में लगभग 3 फीसदी है, लेकिन कई सीटों पर यह निर्णायक भूमिका निभाता है। केंद्रीय मंत्री एसपी बघेल इस समाज का बड़ा चेहरा हैं। अगर बीजेपी पाल समाज से अध्यक्ष बनाती है तो यह संदेश जाएगा कि पार्टी अतिपिछड़ों को भी बराबरी की हिस्सेदारी दे रही है। इससे गैर-यादव ओबीसी के साथ अतिपिछड़ा वर्ग भी मजबूत तरीके से बीजेपी के साथ जुड़ सकता है।
🟡 अन्य नाम भी कतार में
इन चर्चित जातियों के अलावा अमरपाल मौर्य, अशोक कटारिया, विद्यासागर सोनकर, स्वतंत्र देव सिंह और राज्यसभा सांसद दिनेश शर्मा जैसे नाम भी कयासों में शामिल हैं। हालांकि पार्टी का फोकस इस बार साफ तौर पर जातीय संतुलन साधने पर टिका हुआ दिख रहा है।
🟡निषाद वोटों का जमीनी असर
लोध समाज का असर रामपुर, अलीगढ़, बुलंदशहर, आगरा, फिरोजाबाद, मैनपुरी, पीलीभीत, लखीमपुर, शाहजहांपुर, हरदोई, फर्रुखाबाद, इटावा, जालौन, झांसी जैसे कई जिलों में 5 से 10 फीसदी तक है। वहीं निषाद समाज गंगा के किनारे बसे जिलों - वाराणसी, बलिया, गाजीपुर, प्रयागराज, अयोध्या, जौनपुर, गोरखपुर, चंदौली और मिर्जापुर में चुनावी नतीजे पलटने की ताकत रखता है।
🟡 किसका पलड़ा भारी?
अब सवाल यही है कि बीजेपी किन समीकरणों को सबसे ज्यादा अहमियत देती है - पुराने भरोसे लोध समाज को, उभरती ताकत निषाद समाज को या फिर अतिपिछड़े पाल समाज को। 2027 की तैयारी के लिहाज से पार्टी ऐसा चेहरा चुनेगी जो संगठन को मजबूत करे, जातीय संतुलन साधे और चुनावी मैदान में सबसे ज्यादा फायदा दिला सके।
फिलहाल इतना तय है कि यूपी बीजेपी अध्यक्ष की कुर्सी सिर्फ संगठन का पद नहीं, बल्कि 2027 के चुनाव की दिशा तय करने वाली बड़ी सियासी चाबी बन चुकी है। अब निगाहें दिल्ली के फैसले पर टिकी हैं।
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