UP में नवजातों की कीमत 60 हजार! फर्जी डॉक्टर-IVF सेंटर्स मानव तस्करी के सरगना? कैसे होती थी डील फिक्स?
UP Bareilly Human Trafficking Network Busted: उत्तर प्रदेश पुलिस ने एक बार फिर संगठित अपराध की जड़ों को हिलाकर रख दिया है। बरेली में एक नर्स को कथित तौर पर बच्चों की तस्करी करने वाले बड़े गिरोह की सरगना बताते हुए पुलिस ने पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश किया है। यह गिरोह गरीब, अविवाहित गर्भवती महिलाओं और निःसंतान दंपतियों के बीच खतरनाक सांठगांठ करता था। नवजात शिशुओं को चोरी या अगवा कर नकली डॉक्टरों, बिचौलियों और नर्सों के जरिए अवैध रूप से बेचा जाता था।
पुलिस की इस सफलता की शुरुआत एक डेढ़ साल के मासूम बच्चे ऋषभ के अपहरण से हुई, जिसे मंदिर परिसर से अगवा किया गया था। अब यह मामला सिर्फ एक अपहरण नहीं, बल्कि अस्पतालों, IVF केंद्रों और अंतरराज्यीय गिरोह तक फैला हुआ माफिया सिंडिकेट साबित हो रहा है।

मंदिर से शुरू हुई कहानी, नेटवर्क तक पहुंची जांच
24 मई 2026 को बरेली के प्रसिद्ध मनाउना धाम मंदिर परिसर से डेढ़ साल के ऋषभ का अपहरण कर लिया गया। बच्चे के परिजनों की तहरीर पर पुलिस ने तुरंत एक्शन लिया। 26 मई को पुलिस की मुठभेड़ में दो मुख्य अपहरणकर्ता योगेश कन्नौजिया और पवन सिंह गिरफ्तार हुए। बच्चा सुरक्षित बरामद कर लिया गया। पूछताछ में दोनों ने चौंकाने वाला खुलासा किया। उन्हें एक निःसंतान दंपति के लिए बच्चा लाने के बदले 60,000 रुपये की पेशकश की गई थी। आगे की जांच ने पूरे नेटवर्क को उजागर कर दिया।
पुलिस के अनुसार, इस रैकेट का मास्टरमाइंड उत्तम बाजपेयी (लखीमपुर निवासी) है। उसे निर्देश मिले सीतापुर के नकली डॉक्टर संजय विश्वास और लखीमपुर खीरी के केशव राम उर्फ मंजेश (मैगलगंज) से। ये दोनों गिरोह के लिए बच्चों की सप्लाई का जिम्मा संभालते थे। अगवा किए गए बच्चे को बरेली के मेडिकल कॉलेज में काम करने वाली नर्स सीता को सौंपा जाना था। जांच में सीता इस पूरे रैकेट की मुख्य सरगना के रूप में सामने आई है।
नर्स सीता: अस्पतालों से जुड़ी मुख्य सप्लायर
सीता, मूल रूप से बदायूं जिले के दातागंज की रहने वाली, फिलहाल मिर्जागंज में रहती है। पुलिस का आरोप है कि उसके देश भर के कई निजी अस्पतालों और IVF केंद्रों से गहरे संबंध थे। वह अविवाहित गर्भवती महिलाओं को निशाना बनाती थी।
मोडस ऑपरेंडी (कार्यशैली) इस प्रकार था:
- गिरोह के सदस्य अस्पतालों, बस स्टैंडों, मेलों और बाजारों में गरीब, अकेली गर्भवती महिलाओं की तलाश करते थे।
- उन्हें प्रसव के दौरान मुफ्त मदद, छुपकर डिलीवरी और भरोसेमंद इलाज का लालच दिया जाता था।
- प्रसव के बाद नवजात शिशु को 'बेहतर भविष्य' का झांसा देकर या जबरन अलग कर लिया जाता था।
- बच्चे को नकली डॉक्टरों और बिचौलियों के जरिए निःसंतान दंपतियों या अन्य खरीदारों को 50,000 से लाखों रुपये में बेच दिया जाता था।
पुलिस अधीक्षक (दक्षिण) अंशिका वर्मा ने बताया कि जांच से कई निजी मेडिकल सेंटर्स और IVF क्लिनिक्स से संभावित लिंक मिले हैं। सीता के कॉल रिकॉर्ड की जांच चल रही है, जिससे और बड़े खुलासे होने की आशंका है।
गिरोह के सदस्य और पुलिस एक्शन
26 मई को योगेश और पवन की गिरफ्तारी के बाद अब तक छह अन्य आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। पुलिस का कहना है कि जांच आगे बढ़ने पर और सदस्य रडार पर आ सकते हैं।
वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अनुराग आर्य ने कहा, 'ये लोग बच्चों की चोरी और तस्करी को संगठित अपराध के रूप में चला रहे थे। इसलिए उनके खिलाफ गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई की जाएगी।'पुलिस अब आरोपियों की अवैध संपत्तियों की पहचान कर जब्त करने की प्रक्रिया शुरू कर चुकी है। लखीमपुर, सीतापुर, बदायूं और अन्य जिलों में विशेष टीमें भेजी गई हैं।
बच्चों की तस्करी: उत्तर प्रदेश में गंभीर समस्या
उत्तर प्रदेश में बच्चों की तस्करी और अवैध अडॉप्शन का मामला नया नहीं है। गरीबी, अशिक्षा, लिंग भेदभाव और IVF क्लिनिक्स की बढ़ती संख्या ने इस अपराध को बढ़ावा दिया है।
पुलिस सूत्रों के अनुसार, ऐसे गिरोह अक्सर, नकली डॉक्टरों और नर्सों का सहारा लेते हैं। सरकारी अस्पतालों के आसपास नेटवर्क चलाते हैं। फर्जी दस्तावेजों के जरिए बच्चों को 'लीगल' अडॉप्शन का रूप देते हैं।
इस मामले में बच्चे की उम्र जानने के बाद सरगना ने उसे लेने से मना कर दिया था क्योंकि बड़ा बच्चा अपने माता-पिता को याद रख सकता था। इससे साबित होता है कि गिरोह मुख्य रूप से नवजात शिशुओं को ही टारगेट करता था, जिन्हें आसानी से 'बेचा' जा सकता था।
बच्चों के अधिकारों पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि अस्पतालों और IVF केंद्रों में सख्त निगरानी की जरूरत है। हर डिलीवरी का रिकॉर्ड, मां और बच्चे दोनों की पहचान और अडॉप्शन प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाना चाहिए। राज्य सरकार को बाल अधिकार संरक्षण आयोग के साथ मिलकर ऐसे नेटवर्क पर लगातार नजर रखनी चाहिए।
उत्तर प्रदेश पुलिस की इस कार्रवाई को सराहना चाहिए, लेकिन यह सिर्फ शुरुआत है। पूरे नेटवर्क को पूरी तरह से खत्म करने, दोषियों को सजा दिलाने और ऐसी घटनाओं को दोहराने से रोकने के लिए सिस्टम स्तर पर सुधार जरूरी हैं। हर बच्चे का अधिकार है, सुरक्षित बचपन और परिवार का।













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