यूपी विधानसभा चुनाव 2017: 'जीत की चाबी, डिंपल भाभी'...यूपी चुनाव में गूंजेंगे ऐसे नारे

यूपी विधानसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन को लेकर सभी सियासी दल चुनावी गणित साधने की कवायद में जुटे हुए हैं। चुनावों में नारों का भी अहम योगदान होता है। प्रमुख सियासी दलों के नारों पर एक नजर...

नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश में चुनावी शंखनाद के बाद सभी सियासी दलों में मैदान मारने की होड़ लग चुकी है। सभी दल अपने मुताबिक रणनीति बनाने में जुटे हैं चाहे उम्मीदवार के चुनने से जुड़ा मामला हो या फिर चुनावी नारे हों। सभी सियासी दल मुद्दों के आधार पर अपने नारे लेकर चुनाव मैदान में उतरते हैं। इन नारों के जरिए सियासी दलों का उद्देश्य यही होता है कि वो सीधे वोटरों के दिलों तक पहुंच सकें। यही वजह है कि 2012 के विधानसभा चुनावों में अखिलेश यादव ने नारा दिया था 'उम्मीद की साइकिल'। जिसे मतदाताओं ने सराहा और अखिलेश यादव सत्ता तक पहुंच गए। ये भी पढ़ें- सपा ने जारी की तीसरी लिस्ट, अपर्णा यादव को मिला टिकट

up election 'जीत की चाबी, डिंपल भाभी'...यूपी चुनाव में गूंजेंगे ऐसे नारे

प्रमुख सियासी दलों की ओर से लगाए जा रहे ये खास नारे

इस बार जिस तरह से समाजवादी पार्टी दो-फाड़ नजर आ रही है, विवाद में चुनाव चिन्ह साइकिल ही है। ऐसे में पार्टी कार्यकर्ताओं ने इस बार के चुनाव प्रचार में इस नारे से परहेज किया है। इसके साथ-साथ एक और नारा जो 2007 में पार्टी की ओर से दिया गया था...'यूपी में है दम, क्योंकि जुर्म यहां है कम', इससे भी पार्टी ने परहेज किया है।

सपा में झगड़े के बीच अखिलेश यादव के समर्थन में नारे

सपा में झगड़े के बीच अखिलेश यादव के समर्थन में नारे

भले ही समाजवादी पार्टी में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है लेकिन यूपी चुनाव में अखिलेश यादव के समर्थक पूरी तरह से तैयार हैं। उन्होंने अखिलेश यादव के समर्थन में कई नारे उछाले हैं जिससे वोटरों को अपनी ओर खींचा जा सके। इनमें से एक नारा है 'ये जवानी है कुर्बान, अखिलेश भैया तेरे नाम' जिसे ज्यादा उछाला जा रहा है। इसके साथ-साथ 'विकास का पहिया अखिलेश भैया' और 'काम बोलता है' जैसे नारे सियासी गलियारे में गूंज रहे हैं। अखिलेश यादव के साथ-साथ उनकी पत्नी डिंपल को भी नारों में जगह दी गई है। ऐसा ही एक नारा है- 'जीत की चाबी, डिंपल भाभी'। इसके साथ-साथ समाजवादी पार्टी में चल रहे झगड़े पर जो नारे अखिलेश यादव के समर्थन में लगाए जा रहे वो हैं... 'नो कन्फ्यूजन नो मिस्टेक, सिर्फ अखिलेश सिर्फ अखिलेश', वहीं एक अन्य नारा है 'यूपी की मजबूरी है, अखिलेश यादव जरूरी है'।

बीएसपी के नारों 'बहन जी' पर खास फोकस

बीएसपी के नारों 'बहन जी' पर खास फोकस

बहुजन समाज पार्टी की ओर से भी चुनाव को लेकर खास नारे गूंज रहे हैं। 2007 में प्रदेश में कानून व्यवस्था को चोट करते हुए बीएसपी की ओर से नारा दिया गया 'चढ़ गुंडन की छाती पर, बटन दबाओ हाथी पर', जिसे मतदाताओं ने पसंद किया और 2007 में मायावती को बड़ी जीत हासिल हुई। हालांकि 2012 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। ऐसे में बीएसपी इस बार नए नारों से मैदान में उतरी है। बीएसपी के नारों पर गौर करें तो 'बेटियों को मुस्कुराने दो, बहजी को आने दो', 'बहन जी को आने दो, प्रदेश को गुंडे-माफिया से बचाने को', 'गांव-गांव को शहर बनाने दो, बहन जी को आने दो' और 'डर से नहीं, हक से वोट दो, बेइमानों को चोट दो'। इसके साथ-साथ एक और नारा बहुजन समाज पार्टी की ओर से उछाला जा रहा है वो है... 'कमल, साइकिल, पंजा होगा किनारे, यूपी चलेगा हाथी के सहारे'। इस नारे के जरिए सभी सियासी दलों पर निशाना साधा गया है।

बीजेपी के नारों में विकास और पीएम मोदी पर खास फोकस

बीजेपी के नारों में विकास और पीएम मोदी पर खास फोकस

बीजेपी की बात करें तो उन्होंने अपने प्रचार का आगाज जिन नारों से किया है उसमें विकास के मुद्दे को उठाया गया है, साथ ही नरेंद्र मोदी का नाम भुनाने की कोशिश की गई है। बीजेपी के नारों पर गौर करें तो 'सबका साथ, सबका विकास' के साथ-साथ 'जय श्री राम', 'भारत माता की जय' प्रमुख हैं। कुछ और नारे हैं... 'एक देश में दो विधान, नहीं चलेंगे' और 'दो बातें कभी ना भूल, नरेंद्र मोदी और कमल का फूल'। पार्टी की ओर से प्रदेश में मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया है ऐसे में पार्टी केंद्रीय नेतृत्व के सहारे सुशासन का मुद्दा यूपी चुनावों में उठा रही है। ये बातें उनके नारे में भी दिख रही है... 'साथ आएं-परिवर्तन लाएं', 'परिवर्तन लाएं-कमल खिलाएं', 'जन-जन का संकल्प परिवर्तन एक विकल्प', 'ना इकाई-ना दहाई, पूरा दो तिहाई'। वहीं एक अन्य नारा जो ज्यादा तेजी से उछाला जा रहा है... 'गली-गली मचा है शोर, जनता चली भाजपा की ओर', इसके अलावा 'अबकी बार बीजेपी सरकार' को बदलकर 'अबकी बार 300 के पार' उछाला जा रहा है।

कांग्रेस के नारों में निशाने पर विपक्षी पार्टियां और मोदी सरकार

कांग्रेस के नारों में निशाने पर विपक्षी पार्टियां और मोदी सरकार

कांग्रेस की बात करें तो उन्होंने चुनाव प्रचार की शुरूआत सितंबर 2016 से ही शुरू कर दिया था। उस समय पार्टी ने शीला दीक्षित को यूपी में अपना मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित किया था। इसी समय नारा दिया गया '27 साल, यूपी बेहाल'। 1989 के बाद 27 साल से यूपी की सत्ता से बाहर चल रही कांग्रेस पार्टी ने इस नारे के जरिए यूपी का हालात को लेकर विरोधी दलों को घेरने की कोशिश की है। इसके अलावा कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की किसान यात्रा के दौरान नारा दिया गया 'कर्जा माफ, बिजली बिल हाफ, एमएसपी का करो हिसाब'। इसके जरिए मोदी सरकार पर निशाना साधा गया था। नोटबंदी के बाद कांग्रेस पार्टी की ओर से कुछ नए नारे सामने आए हैं, जिसमें प्रधानमंत्री मोदी और केंद्र सरकार पर निशाना साधा गया है। ये नारे हैं... 'गरीबों से खींचो, अमीरों को सींचों' और 'सूट-बूट की सरकार, रुलाए गरीबों को बार-बार'। ये भी पढ़ें- इलाहाबाद: भाजपा ने दलबदलू नेताओं को सर आंखों पर बिठाया. पढ़िए प्रत्याशियों के बारे में सबुकछ

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