इलाहाबाद: भाजपा ने दलबदलू नेताओं को सर आंखों पर बिठाया. पढ़िए प्रत्याशियों के बारे में सबुकछ
भाजपा की सूची देखकर बागी हुये टिकट के दावेदारों ने संगठन की मुश्किल को बढा दिया है।
इलाहाबाद। यूपी विधानसभा चुनाव के लिये भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशियों की एक और बहुप्रतीक्षित सूची जारी हुई है । 155 प्रत्याशियों की इस सूची में इलाहाबाद की 12 विधानसभा सीटों में से 8 पर प्रत्याशियों की घोषणा कर दी गई है। जबकि बची हुई चार विधानसभा सीटों के अपना दल गठबंधन में जाने की संभावना है । इस सूची में दलबदलू नेताओं को खासी वरीयता दी गई है । जिसमें सपा, बसपा और कांग्रेस से आये नेता अब भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ेंगे। लेकिन अब भाजपा की सूची देखकर बागी हुये टिकट के दावेदारों ने संगठन की मुश्किल को बढा दिया है। Read Also: अखिलेश भविष्य के पीएम पद के दावेदार, केंद्र में सरकार बनाएंगे
कई नेताओं ने सीधे तौर पर भाजपा यूपी अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य पर आरोप लगाये हैं कि भारी रकम लेकर दलबदलू लोगों को प्रत्याशी बनाया गया है। जबकि वर्षों से पार्टी के लिये काम कर रहे कार्यकर्ताओ व दावेदारों को उपेक्षित किया गया है । सबसे आश्चर्य की बात यह रही कि दो दिन पहले ही भाजपा का दामन थामने वाले नंद गोपाल गुप्ता नंदी को भी टिकट दे दिया गया । जबकि एक साथ भाजपा ज्वॉइन करने वाले हर्ष व विक्रमाजीत को भी प्रत्याशी बना दिया गया।
सही मायने में तो टिकट बंटवारे में दलबदलू नेताओं का जलवा देखने को मिला। फाफामऊ से विक्रमाजीत मौर्य, फूलपुर से प्रवीण पटेल, करछना से पीयूष रंजन निषाद, शहर पश्चिमी से सिद्धार्थ नाथ सिंह, शहर उत्तरी से हर्ष बाजपेई, शहर दक्षिणी से नंद गोपाल गुप्ता नंदी, बारा से डॉ० अजय भारतीय व कोरांव से राजमणि कोल को प्रत्याशी घोषित किया गया है । जबकि मेजा, सोरांव (सुरक्षित), हण्डिया व प्रतापपुर विधानसभा सीट पर प्रत्याशी घोषित नहीं किये गये हैं
इन सीटों के अपना दल गठबंधन में जाने की पूर्ण संभावना है । फिलहाल अभी किसी तरह की आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है । सबसे खास बात यह है कि इलाहाबाद शहर दक्षिणी से प्रत्याशी नंद गोपाल गुप्ता नंदी बसपा से निष्काषित हैं और कांग्रेस छोड़कर दो दिन पहले ही बीजेपी में पत्नी अभिलाषा (मेयर इलाहाबाद ) के साथ आये हैं। जबकि इलाहाबाद शहर उत्तरी से प्रत्याशी हर्ष वर्धन बाजपेई पहले बसपा में थे। बाद में सपा की साइकिल पर चढ़े और अब बीजेपी में आये हैं । केशव मौर्य के पार्थ माने जाने वाले हर्ष का टिकट बहुत पहले से ही कन्फर्म माना जा रहा था।
वहीं शहर पश्चिमी से प्रत्याशी सिद्धार्थ नाथ सिंह हैं। यह भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं। पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के नाती हैं । कायस्थ वोटों को भुनाने व दूर की गोट खेलने के लिये राष्ट्रीय राजनीति छोड़कर अब विधायकी का चुनाव लड़ेंगे । जबकि फूलपुर से प्रत्याशी प्रवीण पटेल हैं। फूलपुर से विधायक रह चुके प्रवीण बसपा छोड़ बीजेपी में शामिल हुये हैं। जबकि फाफामऊ से प्रत्याशी विक्रमाजीत मौर्य हैं, यह भी बसपा में मंत्री रहे हैं और बसपा छोड़कर आये हैं। अब बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ेंगे ।

इलाहाबाद शहर उत्तरी - हर्षवर्धन बाजपेई
हर्ष ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है और युवाओ के बीच अच्छा-खासा जुड़ाव है । इनके माता पिता भी अलग अलग राजनैतिक दलों में कद्दावर नेता हैं। राजनीति हर्ष को विरासत में मिली है। कांग्रेस सरकार में हर्ष की दादी राजेंद्री कुमारी वाजपेयी मंत्री बनी बाद में राज्यपाल भी बनाई गई।
समाजवादी महिला प्रकोष्ठ की राष्ट्रीय अध्यक्ष रंजना वाजपेयी के बेटे हर्ष वाजपेयी बीते विधानसभा चुनाव में शहर उत्तरी से बसपा प्रत्याशी रहे थे । लेकिन कांग्रेस के अनुग्रह नारायण सिंह से चुनाव हार गये। शहर के हर बड़े कार्यक्रम में हर्ष की मौजूदगी इन्हे काफी लोकप्रिय बनाये हुये है। पिछले विधानसभा चुनाव में हर्षवर्धन को 38695 वोट मिले थे। जबकि कांग्रेस प्रत्याशी अनुग्रह ने 54766 वोट के साथ जीत हासिल की थी।
मजबूती - हर्ष युवा और ऊर्जावान हैं युवाओ के बीच अच्छा-खासा क्रेज है । पूरे परिवार की राजनीति का फायदा मिलता है। चुनाव भी लड़ें हैं और आगे बढकर लीड करने वाले नेता हैं। इनका एक बड़ा वोट बैंक है जो वाजपेयी परिवार के समर्थन में हमेशा रहता है ।
कमजोरी - यह विधानसभा क्षेत्र कांग्रेस के अनुग्रह नारायण सिंह का अभेद्य किला है। अनुग्रह के जमीनी वोट को तोड़ने की क्षमता व्यक्तिगत तौर पर नहीं है न ही अनुग्रह की लोकप्रियता के आगे हर्ष कहीं ठहरते हैं । दलबदलू छवि भी हर्ष को कमजोर करेगी।

फाफामऊ - विक्रमाजीत मौर्य
नवाबगंज विधानसभा के रूप में जाने वाली फाफामऊ विधानसभा से भाजपा के सबसे ज्यादा दावेदार थे। दर्जन की संख्या में ब्राह्मण दावेदारों प्रचार प्रसार में जुटे थे लेकिन उसके बीच मौर्य ने बाजी मारी । इसी विधानसभा से बसपा के टिकट पर विक्रमाजीत मौर्य ने चुनाव जीता है और मायावती के मंत्रीमंडल मंडल में जगह बनाई थी । लेकिन चुनावी समीकरणों के फेर में लोकल राजनीति से दूरी बनाते गये और लखनऊ में ही प्रदेश की राजनीति में मशगूल हो गये । इधर अगले चुनाव में टिकट भी कट गया और गुरु मौर्य बसपा से विधायक बन गये। खुद को उपेक्षित मान रहे विक्रमाजीत बसपा के मौर्य वोट बैंक के ध्रुवीकरण में स्वामी प्रसाद मौर्य के साथ अहम भूमिका भी निभाते थे। लेकिन बसपा में खत्म होते अपने रूआब और भविष्य को तलाशते हुये भाजपा के गलियारे में पहुंच गये। सही मौका व ऑफर देखकर भाजपा ज्वॉइन कर ली। लेकिन मौजूदा सपा विधायक अंसार अहमद और बेहद ही लोकप्रिय व जमीनी नेता बसपा प्रत्याशी मनोज पाण्डेय से पार पाना मुश्किल होगा ।
मजबूती - मौर्य बिरादरी के वोट आसानी से बटोरेंगे। अपना दल का समर्थन भी यहां लाभदायक होगा। कद्दावर नेताओ में गिनती होती है और वोट बैंक बरकरार है ।
कमजोरी - मंत्री बनने के बाद भी विधानसभा के लिये कुछ खास न करना। जनता के बीच न जाना और वर्षों से लोकल राजनीति से दूर रहना। स्थानीय भाजपा नेताओ के साथ तालमेल का अभाव भी प्रमुख कमजोरी है।

फूलपुर - प्रवीण पटेल
प्रवीण पटेल झूंसी विधानसभा से विधायक रहे हैं । बसपा के टिकट पर इन्होंने चुनाव लड़ा और जीत हासिल करते हुये अपनी पहचान बनाई । लेकिन अगली विधान सभा में सपा की लहर से लड़ नहीं पाये और चुनाव हार गये । पटेल की तेज तर्रार छवि और मिलनसार स्वाभाव से यह जनता के बीच खासे लोकप्रिय हैं। क्षेत्र में बने रहना, हर तरह के कार्यक्रम में बुलावे पर शिरकत करना इनकी व्यक्तिगत छवि को बेहद मजबूत करता है। भाजपा में आने के बाद से हिंदूवादी नेता बनने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं । फिलहाल शुरुआती दिनों से ही टिकट के लिये प्रयासरत और दावेदार थे । बैकवर्ड लॉबी के चर्चित नेताओ में गिनती होती है। बीते विधानसभा चुनाव में प्रवीण को 64998 वोट मिले। जबकि प्रवीण को पटखनी देने वाले सईद अहमद ने 72898 वोटों के साथ जीत हासिल की थी।
मजबूती - प्रवीण पटेल की सबसे बड़ी मजबूती उनका खुद का वोट बैंक है। जो उन्होने अपने व्यक्तिगत प्रयासों से पाया है। विधायक रह चुके हैं और हर बिरादरी के वोट लाने में सक्षम हैं ।
कमजोरी - दलबदल नेता की छवि सबसे बड़ी कमजोरी है । विधायक रहते हुये कोई विशिष्ट उपलब्धि भी हासिल नहीं कर सके हैं ।

इलाहाबाद शहर पश्चिमी - सिद्धार्थ नाथ सिंह
भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय सचिव की भूमिका निभा रहे सिद्धार्थ नाथ पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के नाती है । सिद्धार्थ आन्ध्र प्रदेश के प्रभारी रहे हैं जबकि पश्चिम बंगाल के भी सह प्रभारी रहे हैं । लोकसभा चुनाव के दौरान फूलपुर लोकसभा क्षेत्र से सांसदी का चुनाव लड़ने के लिये प्रयासरत थे। लेकिन केशव मौर्य को टिकट मिला था। अब यूपी की राजनीति में बड़ी गोट खेलने के लिये राष्ट्रीय राजनीति छोड़कर विधायकी का चुनाव लड़ेंगे। कायस्थ का एक बड़ा वर्ग बहुत लंबे समय से कायस्थ बिरादरी को टिकट देने की मांग कर रहा था। अब उस पर खरा उतरने की जिम्मेदारी सिद्धार्थ पर है। भाजपा के हाई कमान व पीएम के नजदीकी सिद्धार्थ का यहां से चुनाव लड़ना भी विशेष रणनीति का हिस्सा ही माना जा रहा है । लेकिन इसी विधानसभा से बसपा की बेहद ही लोकप्रिय विधायक पूजा पाल व इलाहाबाद विश्वविद्यालय की पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष ऋचा सिंह भी चुनाव लड़ रही हैं। इन दोनो की चुनौती से पार पाना आसान नहीं होगा।
मजबूती - भाजपा के बड़े नेताओं में शुमार हैं और कायस्थ वोट बैंक पर आसानी से कब्जा कर लेंगे। शास्त्री जी का नाम जुड़ा होना भी फायदे मंद है।
कमजोरी - लोकल राजनीति में कभी सक्रिय नहीं रहे हैं और जनता के साथ खास जुड़ाव भी नहीं रहा है। अभी तक विधानसभा क्षेत्र य इलाहाबाद के लिये कुछ भी व्यक्तिगत य व्यवहारिक तौर पर नहीं कर सके हैं।

इलाहाबाद शहर दक्षिणी - नंद गोपाल गुप्ता नंदी
इलाहाबाद की राजनीति में चमकते सितारे की तरह उभरे नंद गोपाल गुप्ता नंदी किसी फिल्मी कहानी का किरदार लगता है। एक फल विक्रेता कैसे राजनेता बना यह स्टोरी बड़ी ही दिलचस्प है। बसपा से विधायक बनकर कैबिनेट मंत्री बनने वाले नंदी इलाहाबाद के बहुचर्चित व्यक्तित्व में से एक हैं। बम हमले में मौत से लड़कर वापस आने वाले नंदी को बसपा से निष्काषित कर दिया गया था । नंदी ने कांग्रेस के टिकट पर पिछला चुनाव लड़ा और हार गये। लेकिन पत्नी अभिलाषा गुप्ता को मेयर का चुनाव लड़ाया जिसमें अभिलाषा ने जीत दर्ज की । खुद अभिलाषा भी तेज तर्रार व चर्चित नेत्री हैं । व्यवसायी से लेकर नेता और समाजसेवी हर रूप में नंदी ने खुद को ढाला है और सीट जिताने वाले खिलाड़ी हैं ।
मजबूती - व्यापारी समेत हर वर्ग में पैठ और वोट बैंक सुरक्षित । राजनैतिक जमीन पूरी तरह से मजबूत व लोकप्रियता के मामले में अव्वल । विकास कार्यों में अहम योगदान बड़ी उपलब्धि ।
कमजोरी - बार बार दल बदलना छवि को धूमिल कर रह है । अति-आत्मविश्वास के साथ ही दो दिन पहले ही भाजपा में आना। स्थानीय भाजपा नेताओ का विरोध ।

बारा - डॉ० अजय भारतीय
सपा छोड़कर भाजपा का दामन थामने वाले बारा विधायक अजय भारतीय ने 16 साल पहले समाजवादी पार्टी से ही अपने राजनैतिक कैरियर को शुरू किया था । सपा के टिकट पर वर्ष 2000 में चाका ब्लाक के प्रमुख बने थे। इसके बाद जब वर्ष 2003-04 में सपा की सरकार बनी तो उन्हें उत्तर प्रदेश अनुसूचित जाति, जनजाति आयोग का अध्यक्ष बनाया गया। वर्ष 2012 में हुए विधानसभा चुनाव में उन्हें सपा ने बारा विधानसभा क्षेत्र से टिकट दिया और उन्होंने जीत हासिल की थी। तब अजय को 46182 वोट मिले थे। जबकि बसपा प्रत्याशी भोलानाथ चौधरी को 42426 वोटों के साथ हार का सामना करना पड़ा था । जीत के बाद दलित होने के नाते उन्
अजय को मंत्री पद मिलने की बात कही जा रही थी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। कहा जा रहा है कि बीते दो सालों से सपा में उनकी उपेक्षा शुरू हो गई थी। यही कारण है कि उन्हें पार्टी छोड़नी पड़ी। भाजपा में मौका देखकर पहुंच गये और अब टिकट भी मिल गया ।
मजबूती - अजय मौजूदा विधायक है और एक बड़ा वोट बैंक इनके पास है। लोगो से अच्छा जुडाव है और हर वर्ग से वोट मिलता है।
कमजोरी - चाटूकारो से घेराव और जनता के लिये कुछ खास न कर पाना। दलबदलू नेता की छवि में नजर आना।

कोरांव - राजमणि कोल
कोरांव से बीजेपी ने राजमणि कोल को मैदान में उतारा है। राजमणि कोल कोरांव से पहले भी चुनाव लड़ चुके हैं।लेकिन चुनाव हार गये । लेकिन अपनी जमीनी नेता की छवि के चलते इलाके के चर्चित नेता है। वर्तमान में कोरांव में बसपा के विधायक राजबलि जैसल से इनका 36 का आंकड़ा हैं। इस बार राजबलि के प्रति लोगों में आक्रोश का फायदा कोल को मिलना तय माना जा रहा है। यहां बीजेपी की राह आसान होगी और कोल विजयी प्रत्याशी साबित हो सकते है। फिलहाल कोल पूरे जोश के साथ बीते पांच साल से अपनी राजनैतिक जमीन को मजबूत करते रहे हैं।
मजबूती - जमीनी नेता और क्षेत्र में बने रहना साथ ही हर बिरादरी के साथ जुड़ाव । वोटो को अपने पक्ष में तब्दील करने की पूरी क्षमता कोल में है।
कमजोरी - चुनाव में जीत हासिल नहीं हुई है। मानसिक व व्यवहारिक दबाव । खुल कर विरोध नहीं करना और चाटुकारिता में रहना ।

करछना - पीयूष रंजन निषाद
इलाहाबाद के जमुनापार इलाके में अपने नाम से पहचाने जाने वाले रंजन की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह पूरे वर्ष क्षेत्र के हर सामाजिक कार्यो में मौजूद रहते हैं। करछना एक पिछड़ा इलाका माना जाता है और वहां के लोगों की मदद करने में रंजन का बड़ा योगदान होता है। इलाके के बड़े व्यवसाई व रसूख के चलते ही यह बड़े नेताओ के चहेते हैं। केशव प्रसाद मौर्य के नजदीकियों में ही इनकी गिनती होती है।
मजबूती - व्यापारी संगठन पर मजबूत पकड़ है और बड़ा वर्ग साथ है। पिछड़ी जाती के लोगों का वोट मिलेगा।












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