यूपी विधानसभा चुनाव 2017: बीएसपी को मुस्लिम वोटों की उम्मीद, क्या पूरी होगी मायावती की रणनीति?

बसपा ने प्रदेश की करीब 200 सीटों पर उम्मीदवारों का ऐलान करीब एक महीने पहले ही कर दिया था। पार्टी को इसी का फायदा मिलने की उम्मीद है। पिछले चुनाव में ज्यादातर सीटों पर सपा और बसपा का सीधा मुकाबला था।

लखनऊ। यूपी चुनाव को लेकर अपनी रणनीति को तेजी से आगे बढ़ाने वाली बहुजन समाज पार्टी ने प्रदेश की सभी सीटों पर सबसे पहले उम्मीदवारों का ऐलान किया। बसपा के उम्मीदवार अब अपनी रणनीति को जमीन पर उतारने की कवायद में जुट चुके हैं। इसका पता इसी बात से चल जाता है कि पार्टी के उम्मीदवार घर-घर जाकर मतदाताओं को अपनी ओर खींचने की कवायद में जुट चुके हैं।

सपा-कांग्रेस में गठबंधन के बीच बीएसपी को मुस्लिम वोटरों से उम्मीद

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शामली विधानसभा सीट से बीएसपी के उम्मीदवार मोहम्मद इस्लाम चुनाव प्रचार में जुटे हुए हैं। वो घर-घर जाकर मतदाताओं को हाथी के चुनाव निशान पर वोट देने की अपील कर रहे हैं। शामली विधानसभा सीट कांग्रेस के पास है, कांग्रेस ने यहां से एक बार फिर पंकज मलिक को ही चुनाव मैदान में उतारा है। इस बार कांग्रेस का समाजवादी पार्टी से गठबंधन हुआ है ऐसे में इसकी ताकत और बढ़ गई है।

बसपा ने 97 मुस्लिम उम्मीदवारों को दिया है टिकट

बसपा ने 97 मुस्लिम उम्मीदवारों को दिया है टिकट

शामली सीट की बात करें तो यहां 30 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं। पिछले चुनाव में कांग्रेस और सपा यहां से अलग-अलग लड़ती रही हैं, लेकिन इस बार चुनाव में दोनों पार्टियों के एक होने के पीछे वजह यही है कि उन्हें प्रदेश 18 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं का साथ मिल सकता है। खास तौर से पश्चिमी यूपी में इस गठबंधन को ज्यादा फायदा की उम्मीद है। हालांकि मायावती ने भी इसी वोटबैंक पर सेंध की योजना बना रखी है। पार्टी की रणनीति भी इसी के इर्द-गिर्द बनाई गई है। इसीलिए बीएसपी सुप्रीमो ने प्रदेश में 97 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया है। पार्टी को उम्मीद है कि अगर मुस्लिम मतदाताओं का उन्हें समर्थन मिला तो उनकी रणनीति कामयाब हो सकती है।

पिछले विधानसभा चुनाव में सपा-बसपा के बीच दिखी थी सीधी टक्कर

पिछले विधानसभा चुनाव में सपा-बसपा के बीच दिखी थी सीधी टक्कर

कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच यूपी चुनाव को लेकर गठबंधन हो गया है। हालांकि पहले चरण के चुनाव में महज कुछ दिन ही बचे हैं ऐसे में दोनों ही दलों के उम्मीदवारों को अपने पक्ष में मतदाताओं को लुभाने के लिए बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवारों से कम समय मिला है। बसपा ने प्रदेश की करीब 200 सीटों पर उम्मीदवारों का ऐलान करीब एक महीने पहले ही कर दिया था। पार्टी को इसी का फायदा मिलने की उम्मीद है। पिछले चुनाव में प्रदेश की ज्यादातर सीटों पर सपा और बसपा का ही सीधा मुकाबला देखने को मिला था। 2012 में प्रदेश की हर सात में से एक सीट पर सपा और बसपा के कांटे की टक्कर देखने को मिली थी। इस चुनाव में उम्मीदवारों के बीच जीत का अंतर भी महज एक फीसदी था। उस समय समाजवादी पार्टी को 229 सीटें आई थी, वहीं बहुजन समाज पार्टी को महज 80 सीट पर संतोष करना पड़ा। बीजेपी को 2012 के चुनाव में 47 सीटें आई थी वहीं कांग्रेस को 29 सीटें मिली थी। फिलहाल सपा और कांग्रेस के एक साथ आने के बाद यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा कि ये गठबंधन इस बार 300 से ज्यादा सीटें हासिल करेगी।

बीएसपी ने प्रदेश में सबसे पहले घोषित किए उम्मीदवार

बीएसपी ने प्रदेश में सबसे पहले घोषित किए उम्मीदवार

मायावती की रणनीति पर गौर करें तो पार्टी के दलित वोट पर सेंधमारी की संभावना कम ही है। पार्टी की नजर प्रदेश में 20 फीसदी मुस्लिम वोटबैंक पर है। पार्टी को उम्मीद है कि समाजवादी पार्टी में अंदरुनी कलह का उन्हें फायदा मिल सकता है। फिलहाल सपा का झगड़ा सुलझ गया है, अखिलेश पार्टी के सर्वेसर्वा बन गए हैं। हालांकि बसपा को उम्मीद है कि मुस्लिम मतदाता मुलायम सिंह यादव के साथ खड़े थे, हो सकता है कि वो अखिलेश से सीधे नहीं खुद को जोड़ सकें, ऐसे में उन्हें फायदा मिल सकता है।

प्रदेश में करीब 20 फीसदी मुस्लिम मतदाता

प्रदेश में करीब 20 फीसदी मुस्लिम मतदाता

शामली सीट से बीएसपी उम्मीदवार मोहम्मद इस्लाम इलाके में सपा सरकार पर सीधा निशाना बोल रहे हैं। उनका कहना है कि सपा सरकार में इलाके में हिंसा हुई और सत्ताधारी पार्टी ने कुछ नहीं किया। उन्होंने कहा कि भले कांग्रेस और सपा साथ हो गए हों, वो मतदाताओं की विश्वास जीतने में कामयाब नहीं होंगे। दूसरी कांग्रेस पार्टी से उम्मीदवार पंकज मलिक कहना है कि लोग बहुजन समाज पार्टी को जानते हैं ऐसे में वो बीएसपी को वोट देकर अपना वोट खराब नहीं करेंगे। प्रदेश मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अच्छा काम किया, कांग्रेस ने भी अपना कार्य पूरा किया है। बता दें कि मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान शामली में भी इसका असर देखने को मिला था। इस दौरान हुई हिंसा में करीब 62 लोगों की मौत हुई। इन दंगों के कुछ महीनों बाद हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने यहां अच्छा प्रदर्शन किया, साथ ही प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 71 पर जीत हासिल की।

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