Tunday kabab के मालिक का इंतेकाल, लखनऊ की विश्‍व प्रसिद्ध मशहूर सवा सौ साल पुरानी दुकान का क्‍यों पड़ा ये नाम

लखनऊ की विश्‍व प्रसिद्ध मशहूर Tunday kabab दुकान के मालिक हाजी रईस का 85 साल में इंतेकाल हो गया। 1500 साल पुरानी की इस दुकान का नाम ये नाम बड़ी ही खास वजह से पड़ा।

tunde kebab

Tunday kabab:नवाबों के शहर लखनऊ को विश्‍व पटल पर यहां की चिकनकारी और जरदोज़ी के लिए जाना जाता है वहीं ज़ायके की दुनिया में इस शहर का नाम टुंडे कबाब के नाम से पहचाना जाता है। तहज़ीब और नफ़ासत के शहर लखनऊ का नाम अपने स्‍वाद से दुनिया में मशहूर करने वाले वो ही "टुंडे कबाब" के मालिक हाजी रईस साहब शुक्रवार को रुखसत हो गए। दिल का दौरा पड़ने से 85 साल के हाजी रईस का इंतेकाल हो गया और हमेशा के लिए दुनिया को अलविदा कह गए। शनिवार को उनको सुपुर्द-ए-खाक किया गया।

सवा सौ साल पहले इस शख्‍स ने की थी शुरूआत

सवा सौ साल पहले इस शख्‍स ने की थी शुरूआत

सवा सौ साल पहले वर्ष 1905 में हाजी मुरीद अली ने अपने घर में तैयार किए खास मसालों से कबाब बनाना शुरू किया जिसका जायका लोगों को इतना पसंद आया कि उनके हाथ का स्‍वादिष्‍ट कबाब खाने वालों की लाइन लगने लगी। सवा सौ साल पहले जो दस्‍तूर शुरू हुआ वो रौनक आज भी टुंडे कबाब की दुकानों पर नजर आती है। इसकी वजह टुंडे कबाब का स्‍वाद है। हाजी मुरीद ने अपने मसालों का गुर अपने बेटे हाजी रईस को सिखाया और अब उनके इंतेकाल के बाद टुंडे कबाब को उनकी तीसरी पीढ़ी संभालेगी।

कैसे पड़ा टुंडे कबाब नाम

कैसे पड़ा टुंडे कबाब नाम

लखनऊ के वरिष्‍ठ पत्रकार नावेद शिकोह ने हाजी रईस के निधन पर शोक व्‍यक्‍त करते हुए बताया कि "हाजी रईस के पिता हाजी मुरीद जिन्‍होंने ये दुकान सवा सौ पहले ये कबाब बनाने की शुरूआत की थी वो बचपन में वो पतंग उड़ाते समय छत से गिर गए जिसके कारण वो विकलांग हो गए और उनका एक हाथ बेकार हो गया था। लखनऊ की आम भाषा में जिस तरह एक पैर खराब होने वाले को लंगड़ा कहते हैं वैसे ही एक हाथ ना होने या खराब होने वाले को फूहड़ ज़बान में टुंडा कहा जाता था। इसलिए हाजी मुरीद को भी टुंडा कहा जाने लगा और जब उनके कवाब मशहूर हुए तो उसे टुंडे के कवाब कहा जाने लगा"।

टुंडे कबाब की कैसे हुई शुरूआत, भोपाल से है ये खास कनेक्‍शन

टुंडे कबाब की कैसे हुई शुरूआत, भोपाल से है ये खास कनेक्‍शन

लखनऊ में टुंडे कबाब की शुरुआत 1905 में हाजी मुराद अली ने लखनऊ के अकबरी गेट के पास सबसे पहले ये कबाब की छोटी सी दुकान खोली थी। हाजी मुरीद के बेटे रईस अहमद ने एक बार अपने इंटरव्‍यू में बताया था कि उनके पुरखे भोपाल के नवाब के खानसामा थे । नवाब और उनकी बेगम बुढ़ापे तक खाने पीने के बहुत शौकीन थे। इसलिए उनके लिए ये कबाब उनके वालिद हाजी रईस ने इजाद किए थे ताकि बिना दांत के भी वो खा सके। ये कबाब मुंह में जाते ही घुल जाते हैं। उम्रदराज होने के कारण पेट की सेहत का ख्‍याल रखते हुए उस समय वो कबाबों में बीफ के अलावा पपीते का अधिक प्रयो‍ग किया करते थे। उन्‍होंने चुनिंदा लगभग 100 मसालें मिलाए। कुछ समय बाद हाजी मुरीद का परिवार लखनऊ आ गया और यहां पर छोटी सी दुकान शुरू की आकर वो नवाबी कबाब का टेस्‍ट लोगों की जुबान पर चढ़ा दिया।

बेटियों को भी नहीं बताई कबाब की सीक्रेट रेसेपी

बेटियों को भी नहीं बताई कबाब की सीक्रेट रेसेपी

दुनिया भर में अपने लज़ीज कबाब से रूबरू करने वाला ये टुंडे कबाब के खानदान की बेटियां तक नहीं जानती कि इसमें क्‍या मसाले पड़ते हैं। कबाबों की रेसिपी हाजी के ख़ानदान की बेटियों को भी नहीं बताई गई। पीढ़ी दर पीढ़ी ये ही परंपरा चली आ रही है। इस कबाब को सौ मसालों से तैयार किया जाता है और ये मसालें दुनिया भर से मंगवाए जाते हैं और जिसे घर के मर्द बंद कमरे में कूट कर तैयार करते हैं।

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