यूपी में श्रीपति मिश्रा का जिक्र कर पीएम मोदी ने सिर्फ ब्राह्मण कार्ड नहीं खेला है, पूरी रणनीति समझिए
लखनऊ, 17 नवंबर: मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष पर निशाना साधने का मौका नहीं छोड़ा था। उन्होंने समाजवादी पार्टी पर भी वार किया और कांग्रेस को लपेटना भी नहीं भूले। कांग्रेस पर हमला करने के लिए उन्होंने एक ऐसा नाम लिया, जिसके बारे में चर्चा हो रही है कि वो ब्राह्मण कार्ड खेल गए हैं। पीएम मोदी ने यूपी के पूर्व सीएम श्रीपति मिश्रा के साथ कांग्रेस में हुए कथित अपमानजनक व्यवहार का जिक्र किया था। लेकिन, अगर पीएम मोदी की पूरी रणनीति को समझने की कोशिश करें तो वह एक तीर से कई शिकार करना चाह रहे हैं। वो उत्तर प्रदेश में भाजपा और ब्राह्मण समाज में आई कथित दूरी को दूर तो करना चाहते ही हैं, वह हिंदुत्व के उस पुख्ता एजेंडे को भी और सॉलिड करके गए हैं, जो भाजपा के वोट बैंक का आधार रहा है।

दिग्गज ब्राह्मण चेहरे का जिक्र कर पीएम ने साधा दूर का निशाना
पूर्वांचल एक्सप्रेसवे के उद्घाटन के मौके पर सुल्तानपुर में मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूपी के 13वें मुख्यमंत्री श्रीपति मिश्रा का जिक्र छेड़ा तो तत्काल तो यही लगा कि वो योगी सरकार से ब्राह्मणों की कथित मायूसी को दूर करना चाह रहे हैं। पीएम मोदी ने कहा कि यूपी की राजनीति का इतना बड़ा कद होते हुए भी उनकी अपनी ही पार्टी ने उनको 'अपमानित' करने का काम किया। माना जाता है कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की आबादी करीब 12 फीसदी है और उस लिहाज से इसे ब्राह्मण कार्ड समझना स्वाभाविक भी है। श्रीपति मिश्रा जौनपुर-सुल्तानपुर सीमा के पास शेशपुर गांव के रहने वाले थे। अगर हम कांग्रेस के उस दिग्गज नेता के अपनी पार्टी से मोहभंग होने की बात पर ही सिर्फ ध्यान देंगे तो इसका मतलब होगा कि हम भाजपा की रणनीति के एक ही हिस्से को समझ पा रहे हैं। असल में पीएम मोदी ने इस एक ब्राह्मण नाम से दूर का निशाना साधा है।

श्रीपति मिश्रा को क्यों छोड़ना पड़ा था सीएम पद ?
पीएम मोदी ने यह तो बताया कि मिश्रा को अपनी ही पार्टी में नीचा दिखाया गया था। लेकिन, स्वाभाविक तौर पर इसके बाद सवाल उठता है कि आखिर ऐसी क्या बात थी कि उन्हें उत्तर प्रदेश जैसे देश के सबसे राज्य का मुख्यमंत्री बनाकर कांग्रेस ने कुछ ही दिन बाद कुर्सी छीन ली थी? यह इतिहास का करीब चार दशक पुराना मामला जरूर है, लेकिन बीजेपी की मौजूदा राजनीति में पूरी तरह से फिट बैठता है। श्रीपति मिश्रा 1982 में कांग्रेस के मुख्यमंत्री बने और 1984 में इस्तीफा देने को मजबूर कर दिए गए। सीधे शब्दों में समझें तो उन्हें पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का आशीर्वाद तो मिला था, लेकिन वे पूर्व पीएम राजीव गांधी को खुश करने में नाकाम रहे और इसलिए उनकी कुर्सी चली गई।

ब्राह्मण वोट पर हर पार्टी की है नजर
जहां तक उनके जरिए यूपी के ब्राह्मण समाज की मायूसी दूर करने की बात है तो यह बात जानना भी जरूरी है कि आमतौर पर धर्म-कर्म और पूजा-पाठ से जुड़ा रहा यह समाज मौजूदा माहौल में स्वाभाविक तौर पर भाजपा के साथ माना जाता है। उसपर से जिस तरह से अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण हो रहा है, वह इस समुदाय के लिए सामान्यतौर पर दिल को छू लेने वाला मसला रहा है। लेकिन, योगी सरकार के कार्यकाल में ब्राह्मणों से थोड़ी दूरी आने की बात कही जा रही है। ऐसा सोचने की वजह ये है कि किसी ब्राह्मण चेहरे की जगह योगी आदित्यनाथ जैसे राजपूत नेता को सत्ता की कुर्सी मिलना। यही वजह है कि बसपा के नेता मंचों पर त्रिशूलों का प्रदर्शन कर रहे हैं तो सपा भगवान परशुराम की मूर्तियां लगाने की बात कह रही है। मायावती को तो 2007 में ब्राह्मण वोटों का चस्का लग भी चुका है। इसलिए अगर बीजेपी इस समाज को अपने साथ एकजुट करना चाहती है तो इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है।

भाजपा की रणनीति क्या है ?
दरअसल, ब्राह्मण समाज को रिझाने-मनाने के अलावा बीजेपी श्रीपति मिश्रा जैसे राज्य के दिग्गज ब्राह्मण चेहरे के जरिए अपना हिंदुत्व का ऐजेंडा भी पुख्ता करना चाह रही है। श्रीपति मिश्रा केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान के अलावा कांग्रेस के उन चंद दिग्गज चेहरों में शामिल हैं, जिन्होंने शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटने को लेकर राजीव गांधी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। तब वे मछलीशहर से लोकसभा के सांसद थे और सदन में अपनी ही पार्टी की सरकार की आलोचना की थी। राजीव से रिश्ते बिगड़ने की वजह से उन्हें पार्टी से निकाल भी दिया गया था। हालांकि, बाद में उनकी वापसी जरूर हुई, लेकिन कभी भी पहले जितना सम्मान नहीं मिल पाया। शाहबानो विवाद की जड़ में तीन तलाक का मसला था, जिसे मोदी सरकार ने हटाया है और बीजेपी इसे भुनाने का कोई मौका नहीं छोड़ती। भाजपा को लगता है कि यह मुद्दा जिंदा रखकर वह अपनी हिंदुत्व की धारा बनाए रख सकती है। दूसरी तरफ उसे यह भी उम्मीद है कि आम मुस्लिम महिलाओं का नजरिया पार्टी के प्रति जरूर नरम हुआ है। यही वजह है कि उसने अपने अल्पसंख्यक मोर्चा को टारगेट दिया है कि यूपी विधानसभा चुनाव में हर बूथ पर कम से कम 30 मुस्लिमों को 'कमल' खिलाने के लिए राजी करें।

भाजपा में ही श्रीपति मिश्रा के बेटे
श्रीपति मिश्रा का 2002 के दिसंबर में निधन हो गया। इससे पहले 1989 में उनके बेटे राकेश मिश्रा एमएलसी बन गए। पिछले विधानसभा चुनाव से ठीक पहले 2016 में उन्होंने भी कांग्रेस छोड़ दिया और भाजपा में शामिल हो गए। कहा जाता है कि उनको भगवा धारण करवाने में बीजेपी नेता रीता बहुगुणा जोशी ने बड़ी भूमिका निभाई जो खुद भी कांग्रेस छोड़कर आई थीं। (श्रीपति मिश्रा की तस्वीर सौजन्य-यूपी विधानसभाप्रोसिडिंग्स डॉट कॉम)
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