क्या अखिलेश यादव के सामने बड़ी लकीर खींचना चाहते हैं शिवपाल, जानिए
लखनऊ, 16 अप्रैल: उत्तर प्रदेश में इस समय मुलायम सिंह यादव के परिवार में काफी उठापटक देखने को मिल रही है। समाजवादी राजनीति के शिखर और जनता के नेता कहे जाने वाले डॉ. राम मनोहर लोहिया ने एक समय में यह कहा था कि विपक्ष को किसी बड़े फैसले के लिए पांच साल बाद चुनाव का इंतजार नहीं करना चाहिए। कुछ इसी तरह से प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव अब अखिलेश यादव के सामने एक नई लकीर खींचते नजर आ रहे हैं। चुनाव के दौरान सम्मान न पाने वाले शिवपाल को लेकर अटकलें लगाईं जा रही हैं कि वह 19 अप्रैल को बीजेपी का दामन थाम सकते हैं। हालांकि यह अभी चर्चाएं ही हैं लेकिन जिस तरह से शिवपाल पिछले कुछ दिनों से संकेत दे रहे हैं उससे ऐसा जरूर लग रहा है जल्द ही वह कुछ बड़ा करने वाले हैं।

अखिलेश ने शिवपाल को 'दोहरे धर्म के संकट' में डाला
शिवपाल यादव ने समाजवादी पार्टी से हाथ मिलाया था लेकिन इस बार अखिलेश यादव ने पिछली बार से भी बड़ा धार्मिक संकट खड़ा कर दिया है। 2016 में जब अखिलेश समाजवादी पार्टी में बदलाव का नया इतिहास लिख रहे थे तो शिवपाल अपने परिवार और पार्टी दोनों में अलग-थलग और कमजोर लग रहे थे। तब मुलायम की लाख कोशिशें भी नहीं चलीं। न अखिलेश माने और न शिवपाल। तो रास्ते जुदा हो गए। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले शिवपाल और अखिलेश दोनों की एक बार फिर मुलाकात हुई। अखिलेश ने चाचा से हाथ मिलाते हुए ही गठबंधन की लंबी लाइन खींची थी, क्योंकि वह प्रसपा का विलय कर सपा में अपने लिए कोई नया गुट और नई मुसीबत नहीं लाना चाहते थे। शिवपाल भी मान गए और इतने लचीले हो गए कि वे केवल एक सीट के लिए राजी हो गए।

शिवपाल की बगावत को रोकना आसान नहीं
चुनाव नतीजों के बाद जब अखिलेश अपने आपको सबसे बड़े राजनीतिक संघर्ष के लिए खुद को तैयार कर रहे थे तो उन्होंने चाचा को उस रणनीति से दूर रखा। नतीजा यह है कि चाचा ने पर्दे के पीछे से मिल रही 'शक्ति' का इस्तेमाल करते हुए भतीजे अखिलेश के सामने नई नीति और रणनीति का ट्रेलर दिखाना शुरू कर दिया है। अखिलेश के लिए इस बार शिवपाल की बगावत से निपटना आसान नहीं होगा। अखिलेश अब इसे लेकर न सिर्फ बैकफुट पर नजर आ रहे हैं, बल्कि दोहरे धर्मसंकट की स्थिति में भी पहुंच गए हैं। अगर वह शिवपाल को हटाते हैं तो उनका एक विधायक भी हार जाएगा, लेकिन इससे भी बड़ी समस्या यह है कि पार्टी में पुरानी दरार का दायरा चौड़ा होगा और यादव वोट बैंक में बड़ी सेंध लगने का दायरा और भी ज्यादा बढ़ जाएगा।

समान नागरिक संहिता का समर्थन करने का अर्थ
16 दिसंबर से 15 अप्रैल 2022 के बीच पांच महीने भी नहीं बीते हैं कि शिवपाल ने अब तक का सबसे बड़ा कदम उठाया है। पिछली बार बगावत के बाद पार्टी से बाहर रहते हुए हमला कर रहे थे, लेकिन इस बार भी छत वही है। अगर वह पीएसपी के अध्यक्ष के पद पर हैं तो विधानसभा में समाजवादी पार्टी के विधायक भी हैं। ऐसे में जब वे कहते हैं कि - समान नागरिक संहिता अगर वे इसे लागू करने के लिए देश में आंदोलन शुरू करने के लिए तैयार हैं, तो इसका अर्थ बहुत चौंकाने वाला हो जाता है।

असमंजस में हैं शिवपाल सिंह समर्थक
वहीं, इटावा में एमएलसी चुनाव के दिन शिवपाल सिंह यादव ने सैफई में यह कह कर सनसनी मचा दी थी कि जिसने वोट दिया है वह जीतेगा। वहीं इटावा में समाजवादी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा है। इसलिए माना जा रहा है कि शिवपाल सिंह ने पिछले दरवाजे से बीजेपी की मदद की है। वहीं शिवपाल सिंह यादव की बीजेपी में एंट्री को लेकर कोई बयान सामने नहीं आया है। इसलिए उनके समर्थक शिवपाल सिंह की चुप्पी को नहीं समझ रहे हैं। क्योंकि शिवपाल सिंह यादव ने अभी तक अपनी भविष्य की रणनीति के बारे में खुलासा नहीं किया है। साथ ही उन्होंने अपनी पार्टी की कार्यकारिणी को भंग कर दिया है।












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