ओम प्रकाश राजभर को उन्हीं के गढ़ में घेरने की तैयारी, जानिए बीजेपी को मिला कौन सा बड़ा हथियार
लखनऊ, 13 दिसंबर: उत्तर प्रदेश की सियासी जंग में लड़ाई एक वोट की है, बीजेपी चाहे समाजवादी पार्टी हो कि वोट की दौड़ में कोई पीछे न छूटे। हर कोई अपने-अपने तरीके से जातियों को साधने में लगा हुआ है। स्थिति यह हो गई है कि कुछ साल पहले तक जो जातियां राजनीतिक गलियारों में नहीं थीं, वे आज राजनेताओं के लिए अनमोल हो गई हैं। बीते रविवार को लखनऊ में राजभर समाज के कई बड़े नेता बीजेपी में शामिल हुए लेकिन बीजेपी में शामिल होने वाले नेताओं में समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक कालीचरण राजभर का भी नाम है जो ओम प्रकाश राजभर की काट बन सकते हैं।

दरअसल कालीचरण राजभर 2002 और 2007 में जहुराबाद विधान सभा क्षेत्र से बसपा के विधायक निर्वाचित हुए। बाद में उन्होंने बीएसपी छोड़कर समाजवादी पार्टी ज्वाइन कर लिया था। गत रविवार को लखनऊ में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में कालीचरण राजभर ने बीजेपी का दामन थामा। दरअसल ओमप्रकाश राजभर का समाजवादी पार्टी के साथ राजनीतिक गठबंधन होने के बाद सपा से कालीचरण राजभर को टिकट नहीं मिल पाता, इसलिए वह बीजेपी में शामिल हो गए।
बीजेपी को हालांकि बहुत पहले से ही जहुराबाद विधान सभा सीट पर एक मजबूत उम्मीदवार के रूप की तलाश थी। अब जाकर उसे कालीचरण राजभर जैसा कैंडिडेट मिल जाएगा। 2012 के चुनाव में कालीचरण राजभर हैट्रिक लगाते-लगाते रह गए थे। इनकी हार की वजह ओपी राजभर बने थे। उस चुनाव में राजभर वोटों का विभाजन हो गया था। कालीचरण राजभर और ओपी राजभर के बीच वोटों के विभाजन के प्रतिफल समाजवादी पार्टी की शादाब फातिमा विजयी होने में कामयाब रहीं थी। पिछले चुनाव में ओम प्रकाश राजभर का गठबंधन बीजेपी के साथ था इसलिए वो जीतने में कामयाब हो गए लेकिन इसबार लड़ाई पूरी दिलचस्प होगी क्योंकि कालीचरण हारने के बाद भी दोनों चुनावों में ददसूरे नंबर पर थे।

ओम प्रकाश राजभर का मुकाबला करने की रणनीति
कालीचरण के अलावा महाराजा सुहेलदेव सेना के अध्यक्ष बब्बन राजभर, भारतीय संघर्ष समाज पार्टी के मदन राजभर, मोनू राजभर जैसे नेताओं के नाम शामिल हैं। राज्य की राजनीति में इन नेताओं के नाम भले ही पहले न सुने हों और न पढ़े हों, लेकिन इन लोगों का अपने-अपने क्षेत्रों में अच्छा राजनीतिक प्रभाव है। मऊ में मदन राजभर, श्रावस्ती में मोनू राजभर, गाजीपुर में कालीचरण राजभर का उनकी जातियों पर अच्छा प्रभाव है। ये नेता चुनाव जीतेंगे या नहीं ये तो वक्त ही बताएगा लेकिन ये नाम किसी का भी जातिगत समीकरण बिगाड़ने के लिए काफी है।
राजभर समाज के नेताओं को पार्टी में शामिल करने के पीछे की बड़ी वजह ओम प्रकाश राजभर का मुकाबला करना है, जो कभी बीजेपी के सहयोगी रहे ओम प्रकाश राजभर इस बार अखिलेश यादव के साथ हैं. राजभर की राजनीतिक स्थिति यह है कि, उनके पास 4 विधायक हैं, खुद कैबिनेट मंत्री थे, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले, भाजपा के साथ चीजें खराब हो गईं और उन्हें छोड़ दिया।
2014 के बाद से चर्चा में आए राजभर क्यों जरूरी हैं?
आज से 10 साल पहले राजभर जाति के बारे में शायद ही किसी को पता होगा, लेकिन 2014 में जब भाजपा ने ओम प्रकाश राजभर को महत्व दिया, तो न केवल यूपी में बल्कि राज्य के बाहर भी लोग राजभर जाति के बारे में जानने लगे। इस जाति के लोगों की संख्या का कोई सटीक आंकड़ा नहीं है। 2001 में हुकुम सिंह की अध्यक्षता वाली सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया था कि उत्तर प्रदेश में राजभर जाति की कुल जनसंख्या 2.44 प्रतिशत हैं।

ओम प्रकाश की बारगेनिंग से परेशान थी बीजेपी
हालांकि ओम प्रकाश राजभर का दावा है कि सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन को ध्यान में रखते हुए वर्तमान में इनकी जनसंख्या 4.44 प्रतिशत होगी। यूपी की 100 से अधिक सीटों पर इनकी जाति के लोगों का प्रभाव है। इस समुदाय का नेतृत्व करने वाले नेताओं का दावा है कि वाराणसी, जौनपुर, चंदौली, गाजीपुर, आजमगढ़, देवरिया, बलिया और मऊ जिलों में राजभर की आबादी का 18-20 प्रतिशत हिस्सा है, जबकि अयोध्या, अंबेडकर नगर, गोरखपुर, संत कबीरनगर की सीटें हैं। महाराजगंज, कुशीनगर इन, बस्ती, बहराइच, सिद्धार्थनगर, बलरामपुर और श्रावस्ती, राजभर में 10 प्रतिशत वोट होने का दावा है।












Click it and Unblock the Notifications