Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

मध्य प्रदेश के इस गांव में 50 साल से ज्यादा नहीं जीते हैं पुरुष, विधवा महिलाओं की तादाद कर देगी आपको हैरान

पन्ना। बुंदेलखंड क्षेत्र के पन्ना जिले में एक गांव ऐसा है जहां पुरुषों की औसत उम्र 50 वर्ष से भी कम है। इस गांव में ज्यादातर पुरुष असमय ही काल कवलित हो जाते हैं। 50 वर्ष से अधिक उम्र का पुरुष यहां खोजने पर भी नहीं मिलता। गांव का सबसे बुजुर्ग व्यक्ति सूरज दयाल गौड है जिसकी उम्र लगभग 53 वर्ष है। यहां अधिकांश पुरुष सिलीकोसिस जैसी जानलेवा बीमारी से ग्रसित हैं, जिसके कारण मेहनत व मजदूरी करने में अक्षम हैं। गांव के तकरीबन 40 फीसदी पुरुष इस खतरनाक बीमारी की चपेट में हैं। पुरुषों की असमय मौत होने के कारण इस अभागे गांव में विधवा महिलाओं की भरमारहै। गांव में कई महिलायें तो ऐसी भी हैं, जिनका 30-35 वर्ष की उम्र में ही सुहाग उजड़ गया, ऐसी स्थिति में बच्चों व परिवार के भरण पोषण का भार उन्हीं के ऊपर है।

मध्य प्रदेश के इस गांव में 50 साल से ज्यादा नहीं जीते हैं पुरुष, विधवा महिलाओं की तादाद कर देगी आपको हैरान

आपदाओं से ग्रसित है यह गांव

उल्लेखनीय है कि पन्ना जिला मुख्यालय से महज 7 किमी की दूरी पर आपदाओं से ग्रसित यह गांव मनौर गुडियाना स्थित है। तकरीबन 700 की आबादी वाले इस छोटे से गांव में गरीबी का गहरा दर्द छिपा है। यहां जाकर ऐसा प्रतीत होता है कि गरीबी, भुखमरी और बीमारी इस गांव के आदिवासियों की नियति बन चुकी है। परम्परागत रूप से मनौर गुडियाना गांव के पुरुष पत्थर की खदानों में काम करते रहे हैं, उनकी आजीविका का यह साधन ही उनके लिए अभिशाप साबित हुआ है।

मध्य प्रदेश के इस गांव में 50 साल से ज्यादा नहीं जीते हैं पुरुष, विधवा महिलाओं की तादाद कर देगी आपको हैरान

यह बीमारी है मुख्य वजह

पत्थर की खदानों में 5-10 साल तक लगातार काम करने वाले पुरुष जानलेवा बीमारी सिलीकोसिस के शिकार हो गए हैं, जिसके चलते उनकी कार्यक्षमता जहां पूरी तरह से खत्म हो गई है, वहीं वे धीरे-धीरे मौत की ओर अग्रसर हो रहे हैं। सिलीकोसिस पीडि़त गांव के आदिवासियों का सही व समय पर इलाज न होने के कारण 50 वर्ष की उम्र तक पहुंचने से पहले ही ज्यादातर पुरुषों की मौत हो जाती है। यही वजह है कि मनौर गुडियाना गांव में विधवा महिलाओं की संख्या तुलनात्मक रूप से बहुत अधिक है। ग्रामीणों के मुताबिक मौजूदा समय इस छोटे से गांव में 30 से अधिक विधवा महिलाएं हैं जो अपने व परिवार के भरण पोषण हेतु संघर्ष कर रही हैं।

मध्य प्रदेश के इस गांव में 50 साल से ज्यादा नहीं जीते हैं पुरुष, विधवा महिलाओं की तादाद कर देगी आपको हैरान

जंगल बना आजीविका का सहारा

खेती-किसानी न होने तथा रोजी-रोजगार के अभाव में गांव के आदिवासियों का एकमात्र सहारा जंगल है। आदिवासी महिलाएं जंगल से जलाऊ लकड़ी लाती हैं, जिसे 7 किमी. दूर पन्ना ले जाकर बेंचती हैं। लकड़ी बेंचने से जो भी पैसा मिलता है उसी से पूरे परिवार का भरण पोषण होता है। गांव के कुछ युवक जो पत्थर खदानों में काम नहीं करते वे काम की तलाश में महानगरों की तरफ पलायन कर जाते हैं। ऐसी स्थिति में शारीरिक रूप से अक्षम व मेहनत मजदूरी करने में असमर्थ पुरुष ही गांव में रहते हैं, जबकि महिलाएं पूरे दिन मेहनत करती हैं। महिलाओं का ज्यादा वक्त जंगल में गुजरता है, वे पत्थर खदान के प्रदूषण से दूर रहती हैं, यही वजह है कि पुरुषों के मुकाबले वे अधिक वर्षों तक जीवित रहती हैं।

मध्य प्रदेश के इस गांव में 50 साल से ज्यादा नहीं जीते हैं पुरुष, विधवा महिलाओं की तादाद कर देगी आपको हैरान

गांव में स्कूल लेकिन बच्चे नहीं जाते पढ़ने

मनौर गुडयाना गांव में स्कूल है जरूर लेकिन गांव के बच्चे यहां पढ़ने नहीं जाते। स्कूल की हालत देखकर ही लगता है कि यहां किसी तरह की कोई गतिविधि नहीं होती। गांव की आदिवासी महिला दुजिया बाई व हल्की बाई ने बताया कि वे बच्चों को स्कूल इसलिए नहीं भेज पाती क्योंकि सुबह लकड़ी लेने जंगल निकल जाते हैं। लकड़ी लेकर जब तक जंगल से वापस घर लौटते हैं तब तक स्कूल का समय निकल चुका होता है। हल्की बाई ने बताया कि 30 वर्ष की उम्र में ही उसके पति रामप्रसाद की मौत सिलीकोसिस के कारण हो गई। मेरे चार बच्चे हैं जिन्हें पालने की जबावदेही मेरे ऊपर है। इस विधवा महिला ने बताया कि जंगल ही हमारी आजीविका का सहारा हैं।

मध्य प्रदेश के इस गांव में 50 साल से ज्यादा नहीं जीते हैं पुरुष, विधवा महिलाओं की तादाद कर देगी आपको हैरान

सिलीकोसिस के उपचार की नहीं है कोई व्यवस्था

जानलेवा सिलीकोसिस की बीमारी का प्रकोप अकेले मनौर गुडयाना में नहीं अपितु पन्ना जिले के उन सभी इलाकों में है जहां पत्थर की खदानें चलती हैं। जिले में रोजी-रोजगार के कोई अन्य साधन व अवसर न होने के कारण गरीब आदिवासी पत्थर खदानों में काम करने को मजबूर होते हैं। पत्थर काटने व तोड़ने में उसकी डस्ट धीरे-धीरे श्वॉस नली में फेफड़ों तक पहुंच जाती है। यही डस्ट 5-6 सालों में खदान के कारीगर व मजदूर को बेबस और लाचार बना देती है। जिले में सिलीकोसिस पीड़ित मरीजों की संख्या काफी होने के बावजूद यहां पर उनके इलाज की कोई माकूल व्यवस्था नहीं है।

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+