कर्नाटक में खत्म नहीं हुआ नाटक! राहुल-सिद्धारमैया की मीटिंग में क्या हुआ, बेटा डिप्टी CM बनेगा या मंत्री?

Karnataka Political Crisis (Siddaramaiah vs DK Shivakumar): कर्नाटक की राजनीति में मुख्यमंत्री बदलने वाला है लेकिन सियासी हलचल अभी खत्म नहीं हुई है। साल 2023 के विधानसभा चुनाव में मिली प्रचंड जीत के बाद आलाकमान के साथ तय हुए 'रोटेशनल फॉर्मूले' के तहत सिद्धारमैया ने आखिरकार भारी मन से ही सही, लेकिन कुर्सी छोड़ दी है। अब राज्य की कमान प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और संकटमोचक कहे जाने वाले डीके शिवकुमार के हाथों में जाने का रास्ता पूरी तरह साफ हो चुका है। वे जून के पहले हफ्ते (1 या 3 जून) में मुख्यमंत्री पद की शपथ ले सकते हैं।

लेकिन कहानी सिर्फ इतनी नहीं है। मुख्यमंत्री पद छोड़ने के तुरंत बाद सिद्धारमैया बेंगलुरु से वाया जयपुर होते हुए दिल्ली पहुंचे। दिल्ली आते ही उन्होंने कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी, सोनिया गांधी और राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से बेहद अहम मुलाकात की। इस मुलाकात के दौरान राहुल गांधी ने सिद्धारमैया को गले लगाकर उनका स्वागत किया, जबकि खड़गे उनके कंधे पर हाथ रखकर ढाढस बंधाते नजर आए। लेकिन इस पूरी भावुकता के पीछे जो असली इनसाइड स्टोरी है, वह कांग्रेस के 2029 के आम चुनाव के मास्टर प्लान से जुड़ी है।

Siddaramaiah Rahul Gandhi meet

सिद्धारमैया के इस्तीफे के बाद जो सबसे बड़ी तस्वीर निकलकर सामने आई है, वह सिर्फ सत्ता परिवर्तन की नहीं, बल्कि कांग्रेस के 2029 वाले बड़े राष्ट्रीय ब्लूप्रिंट की मानी जा रही है। दिल्ली में राहुल गांधी, सोनिया गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से सिद्धारमैया की मुलाकात ने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि आखिर सिद्धारमैया अपने बेटे डॉ. यतींद्र सिद्धारमैया को साथ लेकर दिल्ली क्यों पहुंचे? राजनीतिक गलियारों में अब यह सवाल तेजी से घूम रहा है कि क्या कांग्रेस कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन के साथ-साथ OBC समीकरण को भी नए तरीके से सेट कर रही है? और क्या यतींद्र को मंत्री या डिप्टी सीएम बनाकर पार्टी दक्षिण भारत में नया सामाजिक संतुलन बनाने की तैयारी में है? ऐसे में आइए समझते हैं कि आखिर दिल्ली की इस हाई-प्रोफाइल मीटिंग में क्या खिचड़ी पकी, सिद्धारमैया के बेटे यतींद्र को क्या मिलने वाला है और राहुल गांधी का 'मिशन साउथ' क्या है।

🔷सिद्धारमैया की दिल्ली मीटिंग में क्या हुआ?

सिद्धारमैया ने मुख्यमंत्री पद छोड़ने के एक दिन बाद दिल्ली पहुंचकर राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे से लंबी बातचीत की। कांग्रेस के भीतर से जो संकेत निकलकर सामने आ रहे हैं, उनके मुताबिक चर्चा सिर्फ राज्यसभा सीटों तक सीमित नहीं थी। बातचीत में नई कैबिनेट, एमएलसी नियुक्तियां, मंत्री पदों का संतुलन और 2028-29 की चुनावी रणनीति भी शामिल रही।

दिलचस्प बात यह रही कि राहुल गांधी ने सिद्धारमैया का गर्मजोशी से स्वागत किया। दोनों नेताओं की तस्वीरें सामने आने के बाद यह साफ दिखा कि कांग्रेस नेतृत्व किसी टकराव का संदेश नहीं देना चाहता। पार्टी लगातार यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि नेतृत्व परिवर्तन पूरी सहमति से हुआ है। हालांकि, सबसे ज्यादा राजनीतिक चर्चा उस समय शुरू हुई जब सिद्धारमैया अपने बेटे यतींद्र को भी साथ लेकर मीटिंग में पहुंचे। इससे यह अटकलें तेज हो गईं कि नई सरकार में यतींद्र की भूमिका लगभग तय मानी जा रही है।

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🔷राहुल-खड़गे से क्या हुई बात और राज्यसभा सीट पर क्यों बरकरार है सस्पेंस?

कांग्रेस आलाकमान चाहता है कि सिद्धारमैया जैसा कद्दावर और अनुभवी नेता अब राज्य की राजनीति से थोड़ा ऊपर उठकर राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका निभाए। इसके लिए पार्टी ने उन्हें राज्यसभा के रास्ते दिल्ली लाने और केंद्र में एक बड़ा पद सौंपने का पूरा ऑफर तैयार रखा है। लेकिन पेंच यहीं फंसा हुआ है। 77 साल के बुजुर्ग और जमीनी नेता सिद्धारमैया ने आलाकमान के इस 'नेशनल रोल' वाले प्रस्ताव को बेहद विनम्रता से ठुकरा दिया है।

सिद्धारमैया का साफ कहना है कि उनकी राष्ट्रीय राजनीति में कोई खास दिलचस्पी नहीं है और वह कर्नाटक की धरती पर रहकर ही राज्य की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाना चाहते हैं।

हालांकि दिल्ली की बैठक में राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने उन्हें मनाने की पूरी कोशिश की है, लेकिन सिद्धारमैया के राज्यसभा जाने पर सस्पेंस अभी भी पूरी तरह बरकरार है। इस मुलाकात के दौरान सिद्धारमैया ने राष्ट्रीय राजनीति में आने के बजाय राज्यसभा और विधान परिषद (MLC) चुनावों के लिए अपने पसंदीदा उम्मीदवारों की एक लिस्ट राहुल गांधी को सौंप दी।

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🔷मीटिंग में बेटे को भी ले गए साथ, क्या यतींद्र बनेंगे डिप्टी सीएम या मंत्री?

दिल्ली की इस हाई-प्रोफाइल बैठक में सबसे ज्यादा ध्यान जिस चेहरे ने खींचा, वह थे सिद्धारमैया के 45 वर्षीय बेटे डॉक्टर यतींद्र सिद्धारमैया। यतींद्र पेशे से एक पैथोलॉजिस्ट (डॉक्टर) हैं और वर्तमान में कर्नाटक विधान परिषद के सदस्य (MLC) हैं। वह इससे पहले अपने पिता की पारंपरिक सीट 'वरुणा' से विधायक भी रह चुके हैं। बड़े भाई राकेश के असामयिक निधन के बाद ही यतींद्र ने राजनीति में कदम रखा था।

दिल्ली में राहुल गांधी और सोनिया गांधी के सामने सिद्धारमैया ने अपने इस डॉक्टर बेटे के राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित करने के लिए मजबूत पैरवी की है। सूत्रों की मानें तो नई कैबिनेट में यतींद्र सिद्धारमैया का मंत्री बनना पूरी तरह तय हो चुका है। अगर वे सीधे डिप्टी सीएम बनते हैं, तो यह एक बड़ा सरप्राइज होगा, लेकिन मंत्री पद को लेकर कोई शक नहीं है।

सिद्धारमैया ने राहुल गांधी के सामने अपने बेटे के लिए मनपसंद विभागों की डिमांड भी रख दी है। वे चाहते हैं कि उनके बेटे को निम्नलिखित में से कोई एक महत्वपूर्ण पोर्टफोलियो मिले:

🔹चिकित्सा शिक्षा और पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग (Medical Education & OBC Welfare)

🔹उद्योग विभाग (Industries)

🔹जल संसाधन विभाग (Water Resources)

कांग्रेस आलाकमान भी इस मांग को पूरी तरह खारिज नहीं कर सकता क्योंकि सिद्धारमैया के हटने से राज्य के बड़े ओबीसी (OBC) वोट बैंक में कोई गलत संदेश न जाए, इसके लिए उनके बेटे को सरकार में बड़ी और मलाईदार हिस्सेदारी देना पार्टी की मजबूरी भी है।

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🔷2029 का प्लान: राहुल गांधी का 'मिशन साउथ' और 'OBC कार्ड'

अगर हम बड़े राजनीतिक फलक पर देखें, तो राहुल गांधी का आत्मविश्वास 2024 के लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद से काफी बढ़ा हुआ है। साल 2025 में पार्टी ने दिल्ली से लेकर बिहार तक कई तरह के राजनीतिक प्रयोग और 'हिट एंड ट्रायल' फॉर्मूले आजमाए। अब 2026 में आकर कांग्रेस की रणनीति पूरी तरह से आकार लेती दिख रही है। राहुल गांधी का सबसे बड़ा फोकस उत्तर भारत के मुकाबले दक्षिण भारत (South India) पर शिफ्ट हो चुका है।

कांग्रेस अच्छे से जानती है कि 2019 में जब राहुल गांधी अमेठी से चुनाव हार गए थे, तब केरल के वायनाड ने ही उन्हें सहारा दिया था। आज 2026 में कांग्रेस के पास न सिर्फ वायनाड और रायबरेली जैसी सीटें सुरक्षित हैं, बल्कि अमेठी में भी उसने वापसी कर ली है। अब 2029 के आम चुनाव की बिसात दक्षिण भारत से ही बिछाई जा रही है, जिसके मुख्य स्तंभ इस प्रकार हैं:

🔹सिद्धारमैया और खड़गे की जोड़ी: राहुल गांधी के 2029 के एजेंडे में जाति जनगणना और ओबीसी का मुद्दा सबसे ऊपर है। इस नैरेटिव को सेट करने के लिए उन्हें मजबूत चेहरों की जरूरत है। जहां मल्लिकार्जुन खड़गे पार्टी के सबसे बड़े दलित चेहरे हैं, वहीं सिद्धारमैया कांग्रेस के सबसे कद्दावर और बड़े ओबीसी नेता हैं। राहुल गांधी इन दोनों बुजुर्ग लेकिन बेहद सक्रिय नेताओं के दम पर पूरे देश में ओबीसी और दलित कार्ड खेलने की तैयारी में हैं।

🔹क्षेत्रीय दलों को सीधा संदेश: राहुल गांधी ने देश के क्षेत्रीय दलों के प्रति अपना नजरिया पहले ही साफ कर दिया था। 2025 की दिल्ली में अरविंद केजरीवाल के साथ हो या 2026 के पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के मामले में, कांग्रेस अब क्षेत्रीय क्षत्रपों के सामने झुकने के बजाय अपनी शर्तों पर राजनीति कर रही है। बिहार में तेजस्वी यादव को भी कांग्रेस इसी तरह साध रही है।

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🔷नए सीएम डीके शिवकुमार की राह आसान नहीं, कैबिनेट को लेकर मची रार

सिद्धारमैया के हटने के बाद भले ही डीके शिवकुमार का मुख्यमंत्री बनना तय हो गया है। ना जा रहा है कि 1 या 3 जून को वह मुख्यमंत्री पद की शपथ ले सकते हैं। लेकिन कर्नाटक कांग्रेस के भीतर की अंदरूनी कलह और गुटबाजी थमती नजर नहीं आ रही है। असली चुनौती नई कैबिनेट में संतुलन बैठाने की है। डीके शिवकुमार वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं। ऐसे में कांग्रेस OBC, SC और ST समुदायों को साथ रखने के लिए कई डिप्टी सीएम बनाने पर विचार कर रही है। पार्टी के भीतर चार डिप्टी सीएम मॉडल पर भी चर्चा हो चुकी है।

SC कोटे से जी परमेश्वर और प्रियंक खड़गे का नाम चर्चा में है। वहीं ST चेहरे के तौर पर सतीश जरकीहोली और लिंगायत समुदाय से एमबी पाटिल को भी अहम माना जा रहा है। यानी कांग्रेस सिर्फ सरकार नहीं बना रही, बल्कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले सामाजिक समीकरणों की नई प्रयोगशाला तैयार कर रही है।

राज्य में सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने के लिए नई सरकार में तीन से चार डिप्टी सीएम बनाए जाने की पुरजोर चर्चा है। उप-मुख्यमंत्री पद की रेस में कई बड़े नाम शामिल हैं:

🔹एससी (SC) कोटे से: वरिष्ठ नेता जी. परमेश्वर और मल्लिकार्जुन खड़गे के बेटे प्रियांक खड़गे।

🔹एसटी (ST) कोटे से: सतीश जरकीहोली।

🔹लिंगायत समाज से: एमबी पाटिल।

इसी बीच कैबिनेट बर्थ को लेकर दिल्ली से लेकर बेंगलुरु तक लॉबिंग शुरू हो गई है। एमएलसी नागराज यादव ने तो सीधे कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे को चिट्ठी लिखकर मांग कर दी है कि या तो उन्हें कर्नाटक सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाया जाए या फिर सीधे राज्यसभा भेजा जाए। वहीं कोलार जिले के कई विधायक और विधान परिषद सदस्य दिल्ली में 10 राजाजी मार्ग (खड़गे के निवास) पर डेरा डाले हुए हैं, जिनकी मांग है कि नए मंत्रिमंडल में उनके जिले को उचित प्रतिनिधित्व मिलना ही चाहिए।

🔷'एक व्यक्ति, एक पद' का फॉर्मूला और कांग्रेस का नया जोखिम

कर्नाटक में सत्ता हस्तांतरण को सुचारू रूप से चलाने के लिए आलाकमान बेहद फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है। कांग्रेस संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने बीती रात सतीश जरकीहोली को फोन कर साफ शब्दों में कह दिया कि पार्टी 'एक व्यक्ति, एक पद' के कड़े फॉर्मूले पर काम करेगी। वेणुगोपाल ने जरकीहोली के सामने विकल्प रखा कि या तो वे नई सरकार में कैबिनेट मंत्री बन जाएं या फिर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष (KPCC Chief) की जिम्मेदारी संभालें। इस पर जरकीहोली ने सिद्धारमैया से चर्चा करने के बाद ही कोई अंतिम फैसला लेने की बात कही है।

गठबंधन और सूबे की राजनीति में कांग्रेस अब राजस्थान (अशोक गहलोत) और छत्तीसगढ़ (भूपेश बघेल) जैसी गलतियों को दोहराना नहीं चाहती, जहां क्षेत्रीय नेताओं के अड़ियल रवैये के कारण पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा था। केरल में वीडी सतीशन के नाम पर सहमति बनाकर जिस तरह कांग्रेस ने हाल ही में जीत हासिल की, उसी आत्मविश्वास के दम पर कर्नाटक का यह बड़ा फैसला लिया गया है।

तमिलनाडु में भी कांग्रेस ने अपनी राजनीतिक चतुरता दिखाते हुए डीएमके को झटका देकर अभिनेता से नेता बने सी. जोसेफ विजय की पार्टी 'टीवीके' (TVK) के साथ हाथ मिला लिया है और वहां की कैबिनेट में हिस्सेदारी भी पा ली है। साफ है कि कांग्रेस दक्षिण के राज्यों में अपने पैरों को बेहद मजबूत कर रही है ताकि 2019 जैसी गलतियों से सबक लेकर 2029 की दिल्ली की गद्दी पर सीधे कब्जा जमाया जा सके। अब देखना यह है कि सिद्धारमैया को दिल्ली लाने की राहुल गांधी की यह जिद क्या रंग लाती है या फिर सिद्धारमैया कर्नाटक के 'किंगमेकर' बनकर ही संतोष करेंगे।

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