Krishna Aur Chitthi Review: क्रिकेट, धर्म, संघर्ष की नहीं बल्कि उम्मीद और भरोसे की कहानी है 'कृष्णा और चिट्ठी'
फिल्म: कृष्णा और चिट्ठी (Krishna Aur Chitthi)
स्टारकास्ट: अरुण गोविल, दर्शील सफारी, सज्जाद डेलाफ्रूज, मीर सरवर, फैज खान, विनय भारद्वाज
डायरेक्टर: विनय भारद्वाज और सौमित्र सिंह
रनटाइम: 2 घंटे 1 मिनट
स्टार: 3 (***)
Krishna Aur Chitthi Review: 'कृष्णा और चिट्ठी' उन फिल्मों में से है जो शुरुआत में एक साधारण कहानी लगती है लेकिन धीरे-धीरे अपने इमोशंस से आपको बांध लेती है। ये फिल्म सिर्फ क्रिकेट, धर्म या संघर्ष की कहानी नहीं है बल्कि उम्मीद और भरोसे की कहानी है। उस भरोसे की जो मुश्किल हालात में इंसान को टूटने नहीं देता।

क्या है फिल्म 'कृष्णा और चिट्ठी' की कहानी?
फिल्म की कहानी अर्जुन (दर्शील सफारी) के आसपास घूमती है। अर्जुन क्रिकेट का दीवाना है और सचिन तेंदुलकर को भगवान मानता है। लेकिन उसकी जिंदगी सिर्फ मैदान तक सीमित नहीं है। कश्मीर की पृष्ठभूमि में पली उसकी जिंदगी डर, राजनीति और संघर्ष के बीच फंसी हुई है।
अतीत और भविष्य को जोड़ती है मूवी की स्टोरी
-तभी उसकी जिंदगी में एक चिट्ठी आती है, जो सिर्फ एक कागज नहीं बल्कि उसके अतीत और भविष्य के बीच का पुल बन जाती है। यही चिट्ठी कहानी को भावनात्मक मोड़ देती है। इस चिट्ठी का कनेक्शन उस जमीन से होता है, जिसके लिए अर्जुन के पिता लड़ रहे हैं और अर्जुन उसमें एक अहम कड़ी बन जाता है।
-फिल्म की सबसे अच्छी बात ये है कि यह बहुत जोर-जबरदस्ती से भावुक बनने की कोशिश नहीं करती। कई दृश्य बेहद शांत हैं लेकिन वही सीन सबसे ज्यादा असर छोड़ते हैं। निर्देशक विनय भारद्वाज और सौमित्र सिंह ने कहानी को बड़े ड्रामेटिक अंदाज में पेश करने के बजाय उसे सादगी के साथ दिखाया है।
फिल्म की स्टारकास्ट और उनकी एक्टिंग
-दर्शील सफारी इस फिल्म का दिल हैं। उनके किरदार में एक मासूमियत है, जो आपको उनके साथ जोड़ देती है। कई जगह सिर्फ उनकी आंखें ही पूरा दर्द बयां कर देती हैं।
-अरुण गोविल की मौजूदगी फिल्म में आध्यात्मिक एहसास लेकर आती है। उनका स्क्रीन टाइम ज्यादा नहीं है लेकिन जब भी वह आते हैं, कहानी में एक अलग शांति महसूस होती है। सज्जाद डेलाफ्रूज और मीर सरवर ने भी अपने किरदारों को गंभीरता से निभाया है।
कैसा है फिल्म का म्यूजिक?
-फिल्म का संगीत और बैकग्राउंड स्कोर इसे खास बनाता है। खासकर इमोशनल सीन्स में म्यूजिक काफी असरदार बन जाता है। कश्मीर की खूबसूरत लोकेशंस स्क्रीन पर शानदार लगती हैं और फिल्म को विजुअली मजबूत बनाती हैं।
-हालांकि फिल्म कुछ जगहों पर धीमी पड़ जाती है। सेकंड हाफ में कुछ सीन छोटे किए जा सकते थे। साथ ही, कुछ डायलॉग्स थोड़े ज्यादा फिल्मी महसूस होते हैं लेकिन इसके बावजूद फिल्म अपने भावनात्मक असर की वजह से जुड़ी रहती है।
एक शांत एहसास जैसी है ये फिल्म
'कृष्णा और चिट्ठी' कोई बड़ी कमर्शियल फिल्म नहीं है बल्कि एक शांत एहसास जैसी फिल्म है। यह आपको थिएटर से निकलने के बाद भी कुछ देर तक सोचने पर मजबूर करती है। अगर आपको ऐसी कहानियां पसंद हैं जिनमें दिल हो, दर्द हो और उम्मीद भी तो यह फिल्म जरूर देखी जा सकती है।













Click it and Unblock the Notifications