Punjab Politics: पंजाब में कैसे साइलेंट किंगमेकर बने डेरे? क्यों हर पार्टी को चाहिए इनका साथ, किसका कितना असर
Punjab Dera Politics: पंजाब की सियासत के बारे में एक कहावत बहुत मशहूर है-"जिसके साथ डेरे, उसके साथ वोटों के घेरे।" सत्ता का रास्ता भले ही चंडीगढ़ के विधानसभा भवन से होकर गुजरता हो, लेकिन उसकी चाबी आज भी मालवा, दोआबा और माझा के 'डेरों' के पास ही सुरक्षित रहती है।
जब 2027 के पंजाब विधानसभा चुनावों में अब एक साल से भी कम का समय बचा है, तब राज्य के स्थानीय निकाय चुनाव के नतीजों और राजनीतिक उथल-पुथल के बीच, डेरों की सक्रियता एक बार फिर चरम पर पहुंच गई है।

26 मई 2026 को डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह के 30 दिनों के पैरोल पर जेल से बाहर आया तब पंजाब के सियासी गलियारों में यह चर्चा बेहद तेज हो गई है कि इस बार 'डेरा फैक्टर' किस करवट बैठेगा। 'किस्सा कुर्सी दा' के इस विशेष एपिसोड में कहानी पंजाब के उन बेहद ताकतवर डेरों का जिन्होंने आजादी से लेकर आज तक सूबे की हुकूमत बनाने और गिराने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई है।
आजादी से पहले ही शुरू हो गया था डेरों का रसूख
पंजाब की राजनीति और इन डेरों का रिश्ता नया नहीं है। सन 1947 में देश के विभाजन से पहले भी विभिन्न संप्रदायों के डेरे पंजाब के सामाजिक और राजनीतिक जीवन को प्रभावित करते रहे हैं। अकाली राजनीति का शुरुआती दौर मास्टर तारा सिंह और संत फतेह सिंह जैसे धार्मिक नेताओं के नेतृत्व में आगे बढ़ा।
अकाली दल का संबंध हमेशा SGPC, गुरुद्वारों और सिख धार्मिक संस्थाओं से जुड़ा रहा। दूसरी ओर, जनसंघ (जो बाद में भाजपा बनी) ने शहरी और व्यापारिक वर्ग को साधने के लिए आर्य समाज और सनातन धर्म की संस्थाओं का सहारा लिया। खुद को धर्मनिरपेक्ष कहने वाली कांग्रेस भी इस खेल में कभी पीछे नहीं रही। एक सच है कि ज्ञानी जैल सिंह ने अकाली दल के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव को रोकने के लिए शुरुआत में संत जरनैल सिंह भिंडरावाले और उनके दमदमी टकसाल (डेरे) को परोक्ष रूप से बढ़ावा दिया था।
2009 में संत रामानंद की हत्या से बदल गई दलित राजनीति
बात मई 2009 की है जब ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में कुछ कट्टरपंथियों द्वारा संत रामानंद की हत्या कर दी गई। इस घटना के बाद पंजाब की सड़कों पर जो दलित आक्रोश और हिंसा भड़की, उसने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया। इस घटना ने साबित कर दिया कि डेरा बल्लां के एक इशारे पर पूरा पंजाब थम सकता है। इसके बाद डेरे ने सिख धर्म से अलग होकर एक नए 'रविदासिया धर्म' और 'अमृतवाणी' ग्रंथ की घोषणा की।
Radha Swami Satsang Beas Role: डेरा सच्चा सौदा और ब्यास बने वोट बैंक का 'साइलेंट' ताकत
Diplomatic Titbits की रिपोर्ट के मुताबिक- पंजाब के मालवा क्षेत्र में, जहां विधानसभा की सबसे ज्यादा 69 सीटें हैं, वहां डेरों का प्रभाव सबसे निर्णायक माना जाता है। पार्टियों ने समय-समय पर अकाली दल के वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए बाबा राम रहीम के डेरा सच्चा सौदा का खुलकर इस्तेमाल किया।
इस डेरे का एक 'पॉलिटिकल विंग' है, जो चुनाव से ठीक एक दिन पहले अपने करोड़ों अनुयायियों को किसी एक पार्टी को एकमुश्त वोट देने का गुप्त व्हिप जारी करता है। राम रहीम के जेल जाने के बावजूद ग्रामीण इलाकों में प्रेमियों (अनुयायियों) का वोट बैंक आज भी बरकरार है।

अमृतसर के पास स्थित डेरा ब्यास की कूटनीति बिल्कुल अलग है। यह डेरा कभी भी किसी राजनीतिक मंच पर खुलकर नहीं आता, लेकिन इसकी भूमिका बेहद सूक्ष्म और अचूक (Discrete but subtle) होती है। देश के प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक इस डेरे के प्रमुख के सामने सिर झुकाने आते हैं। इसका मौन समर्थन ही किसी भी पार्टी की किस्मत बदलने के लिए काफी होता है।
डेरा सचखंड बल्लां बना दलित राजनीति का 'मक्का-मदीना'
दलित डेरों में सबसे शीर्ष पर नाम आता है डेरा सचखंड बल्लां (जालंधर) का। संत सरवन दास द्वारा स्थापित इस डेरे के संतों ने जब विदेशों का दौरा करना शुरू किया, तो NRI भक्तों ने दिल खोलकर दान दिया। डेरा बल्लां के संत गरीब दास और संत रामानंद ने उत्तर प्रदेश के वाराणसी में गुरु रविदास की जन्मस्थली 'सीर गोवर्धनपुर' में एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया। जब वहां के उच्च जाति के लोगों ने इसका विरोध किया, तो बाबू कांशीराम और यूपी की तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने इस डेरे को पूरी राजनीतिक और कानूनी सुरक्षा दी।
Dalit Ravidassia Vote Bank: दोआबा के दलितों ने कैसे बदली चुनावी परिणामों की तस्वीर?
पंजाब में देश की सबसे बड़ी दलित आबादी 30% से अधिक निवास करती है। यही वजह है कि राज्य में अब 'दलित डेरे' सबसे बड़े पावर सेंटर बनकर उभरे हैं। दोआबा क्षेत्र के दलित समुदाय, खासकर रविदासिया चमार समाज, आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत मजबूत रहा। जालंधर, कानपुर और कोलकाता के चमड़ा उद्योग में उनकी बड़ी भागीदारी थी।
फिर 1960 और 70 के दशक में बड़ी संख्या में दलित परिवार ब्रिटेन और बाद में यूरोप, अमेरिका और खाड़ी देशों में जाकर बस गए। विदेशों से आए पैसे ने पंजाब के दलित समाज को आर्थिक और सामाजिक रूप से मजबूत किया। । पंजाब की दलित आबादी भौगोलिक और धार्मिक रूप से विभाजित है:
माझा और मालवा में अधिकांश दलित समाज सिख धर्म का पालन करता है, जिन्हें 'मजहबी सिख' या 'रविदासिया सिख' कहा जाता है। दोआबा क्षेत्र (जालंधर, होशियारपुर, कपूरथला) में मुख्य रूप से रविदासिया चमार, आद-धर्मी, वाल्मीकि और कबीरपंथी समाज रहता है, जो गुरु रविदास, भगवान वाल्मीकि और संत कबीर के अनुयायी हैं।
आर्थिक संपन्नता और 'NRI' बने इनकी सबसे बड़ी ताकत
दोआबा के दलितों (विशेषकर चमार समाज) का उत्थान तब शुरू हुआ जब वे जालंधर, कानपुर और कोलकाता में चमड़े (Leather) के बड़े कारोबार से जुड़े। इसके बाद 1960 और 1970 के दशक में इस समाज का बड़े पैमाने पर यूके (UK) में प्रवास हुआ। बाद में यह सिलसिला खाड़ी देशों, अमेरिका, जर्मनी, इटली और ऑस्ट्रिया तक फैल गया।
विदेशी धरती से आए 'एनआरआई फंड्स' (NRI Funds) ने इन दलित डेरों की कायापलट कर दी। इस आर्थिक मजबूती ने युवा पीढ़ी को उच्च शिक्षा दिलाई और बाबू कांशीराम के 'बामसेफ' व 'बसपा' आंदोलन ने उन्हें अपनी राजनीतिक ताकत का अहसास कराया।
चुनाव आते ही क्यों सक्रिय हो जाते हैं राजनीतिक दल?
इतिहास गवाह है कि मास्टर गुरबंता सिंह, चौधरी जगजीत सिंह से लेकर महेंद्र सिंह कापी (कांग्रेस), प्रकाश सिंह बादल (अकाली दल) और आम आदमी पार्टी के नेता हमेशा इन डेरों के सामने नतमस्तक रहे हैं।मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में भी बिसात बिछ चुकी है। शिरोमणि अकाली दल के नेतृत्व ने डेरा बेबे जौरे और संत निर्मल दास (रायपुर रसूलपुर) से संपर्क साध लिया है।
कुछ दिनों पहले योग गुरु बाबा रामदेव और डेरा ब्यास के प्रमुख ने भी इन डेरों का दौरा किया है। आम आदमी पार्टी और नवनियुक्त भाजपा प्रदेश अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों भी इन डेरों के जरिए ग्रामीण वोट बैंक को अपने पाले में करने की जुगत में हैं।
सबसे बड़ा सवाल: क्या 2027 में भी दलित वोट एकजुट रहेगा?
विश्लेषकों का मानना है कि पंजाब की राजनीति में दलित डेरों की ताकत तभी प्रभावी रहती है जब समुदाय एकजुट रहता है। पंजाब की 30% दलित और ग्रामीण आबादी इस चुनाव में किंगमेकर है। लेकिन डेरा राजनीति का सबसे बड़ा पेंच यह है कि यदि अलग-अलग डेरे अलग-अलग राजनीतिक दलों का समर्थन करते हैं, तो यह विशाल वोट बैंक आपस में बंट जाता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार डेरा प्रमुखों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने समाज की राजनीतिक एकता को बचाए रखने की होगी, क्योंकि इतिहास गवाह है-संगठन में ही शक्ति है; बिखरे तो कुर्सी हाथ से गई।














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