अयोध्या से अखिलेश यादव तक, मुलायम सिंह के 7 तगड़े फैसले

समाजवादी पार्टी में चल रही उठा-पटक के बीच कभी कैमरा सीएम अखिलेश यादव पर तो कभी शिवपाल यादव पर लगा हुआ था लेकिन पर्दे के पीछे से मुलायम सिंह यादव ऐसी एंट्री मारेंगे, ये किसी ने नहीं सोचा था।

नई दिल्ली। देश के सबसे बड़े सियासी कुनबे में इतने बड़े तूफान की उम्मीद किसी को नहीं थी। देश में ये पहली बार हुआ जब किसी बाप ने अपने मुख्यमंत्री बेटे को पार्टी से निकाल दिया। हालांकि समाजवादी पार्टी में चल रही उठा-पटक के बीच कभी कैमरा सीएम अखिलेश यादव पर तो कभी शिवपाल यादव पर लगा हुआ था लेकिन पर्दे के पीछे से मुलायम सिंह यादव ऐसी एंट्री मारेंगे, ये किसी ने नहीं सोचा था। यूपी के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले मुलायम का इतना बड़ा कदम सियासी गलियारों में हलचल मचाने वाला है लेकिन ऐसा पहली बार नहीं है जब उन्होंने इस तरह का फैसला लिया हो, इससे पहले भी मुलायम सिंह यादव अपने फैसलों से बड़े उलट-फेर कर चुके हैं। आइन नजर डालते हैं मुलायम के सात बड़े फैसलों पर।

mulayam singh yadav

1 - अयोध्या में कार सेवकों पर गोली चलवाने का फैसला

बात 1990 की है, जब मुलायम सिंह यादव यूपी के मुख्यमंत्री थे। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का मुद्दा गर्माया हुआ था। आंदोलन जब तेज हुआ तो हालात पर काबू पाने के लिए मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने कार सेवकों पर गोली चलाने का आदेश दे दिया। इसमें एक दर्जन से ज्यादा लोग मारे गए। मुलायम का ये बेहद बड़ा फैसला था। बाद में मुलायम ने खुद कहा था कि ये एक कठिन फैसला था।

2 - जब मुलायम ने बनाई अपनी अलग पार्टी

मुलायम सिंह यादव 1967 में सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतकर यूपी में सबसे कम उम्र के विधायक बने। सियासत के उतार चढ़ाव के बीच मुलायम ने 1992 में जनता दल से अलग होकर एक नए सियासी दल समाजवादी पार्टी की नींव रखी। राजनीतिक तौर पर ये कदम मुलायम का सबसे बड़ा फैसला था।

3 - 1993 में कांशीराम के साथ मिलकर चुनाव लड़े

इसे मुलायम सिंह यादव का मास्टर स्ट्रोक ही कहा जाएगा कि 1993 में वो वर्तमान में अपनी धुर-विरोधी पार्टी बसपा के साथ मिलकर चुनाव लड़े। इस गठबंधन के सामने भारतीय जनता पार्टी नहीं टिक पाई और चुनाव में हार गई। ये जीत इसलिए भी अहम थी क्योंकि उस समय बाबरी मस्जिद टूटने का मुद्दा गर्माया हुआ था। खैर कांशीराम के साथ चुनाव लड़ने के फैसले को मुलायम का बड़ा सियासी दांव माना गया।

4 - मनमोहन सरकार को न्यूक्लियर डील पर समर्थन

2008 में केंद्र में मनमोहन सिंह की सरकार थी और अमेरिका के साथ न्यूक्लियर डील से नाराज लेफ्ट ने सरकार का साथ छोड़ दिया था। संकट के इस समय में यूपीए सरकार को मुलायम सिंह यादव ने सहारा देने का एक बड़ा फैसला लिया। मुलायम ने बाहर से समर्थन देकर मनमोहन सिंह की सरकार बचाई। सियासी पंडितों ने उनके इस कदम को समाजवादी विचारधारा का विरोधी कदम बताया लेकिन मुलायम ने किसी की परवाह नहीं की।

5 - भाइयों को दरकिनार कर अखिलेश को बनाया सीएम

यूपी के तीन बार मुख्यमंत्री रहे मुलायम सिंह यादव ने जब 2012 में जीत का परचम लहराया तो सीएम का सेहरा बेटे अखिलेश के सिर बांधा। अखिलेश सियासत में नए थे जबकि उनके दोनों सगे भाई शिवपाल यादव और रामगोपाल यादव पार्टी के जन्म से ही सियासत के दांव पेंच सीख रहे थे। मुलायम ने किसी की नहीं सुनी और बेटे को गद्दी पर बिठाया। मुलायम सिंह यादव का यही फैसला वर्तमान में उनपर भारी पड़ रहा है

6 - रामगोपाल यादव को पार्टी से बाहर निकाला

अब से ठीक दो महीने पहले समाजवादी पार्टी में जब अखिलेश और शिवपाल के बीच तलवारें खिंची हुईं थी तो मुलायम ने एक कड़ा फैसला लेते हुए अपने भाई और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव को सपा से बाहर कर दिया। हालांकि रामगोपाल यादव का निष्कासन बाद में वापस ले लिया गया लेकिन मुलायम ने इतना बड़ा फैसला लेकर अपने ही परिवार में हलचल मचा दी थी।

7 - अखिलेश यादव 6 साल के लिए पार्टी से निष्कासित

2 दिन की उठा-पटक के बाद मुलायम सिंह यादव ने शायद अपने राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा फैसला लिया। यूपी विधानसभा चुनाव के लिए जब मुलायम ने उम्मीदवारों की सूची जारी की तो सीएम अखिलेश यादव भी अपनी लिस्ट निकालकर ले आए। फिर क्या था, मुलायम ने अखिलेश यादव और रामगोपाल यादव को 6 साल के लिए पार्टी से बाहर कर दिया। इस फैसले के बाद लखनऊ से लेकर दिल्ली तक सुनामी आई हुई है और हर किसी को 'अब आगे क्या होगा' का इंतजार है।

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