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Maha Kumbh 2025: महाकुंभ में श्रद्धालुओं को 151 फीट ऊंचे त्रिशूल के होंगे दर्शन, भूकंप और तूफान भी होंगे बेअसर

Maha Kumbh 2025: उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में होने वाले महाकुंभ मेले के दौरान श्रद्धालु एक अनोखे और भव्य दृश्य के साक्षी बनेंगे। यह दृश्य 151 फीट ऊंचे त्रिशूल का होगा। जो न केवल भक्ति और आस्था का प्रतीक है। बल्कि वास्तुशिल्प की अद्वितीय कृति भी है। यह विशाल त्रिशूल जो दुनिया का सबसे बड़ा त्रिशूल है। मजबूत भूकंप सहित सभी प्राकृतिक आपदाओं के खिलाफ अपनी मजबूती और लचीलेपन को दर्शाता है।

त्रिशूल की अनोखी विशेषताएं

स्टील और अन्य धातुओं के संयोजन से निर्मित इस त्रिशूल का वजन 31 टन से अधिक है। यह 80 फीट गहराई तक जमीन में धंसा हुआ है। जो इसे अत्यधिक स्थायित्व प्रदान करता है। यह अद्वितीय ढांचा जूना अखाड़े में स्थित है। जो भगवान भोलेनाथ की पूजा करने वाले शैव संप्रदाय के संतों का पवित्र स्थान है। इस त्रिशूल की भव्यता और दिव्यता इसे महाकुंभ में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए आस्था और आध्यात्मिकता का केंद्र बना देती है।

trishul

जूना अखाड़े के प्रवक्ता नारायण गिरि ने बताया कि महाकुंभ में इस त्रिशूल के दर्शन करना भगवान शिव का विशेष आशीर्वाद प्राप्त करने के समान है। यह त्रिशूल अन्य कुंभ शहरों में स्थित त्रिशूलों की तुलना में सबसे बड़ा और भव्य है।

2019 में हुआ था उद्घाटन

यह विशाल त्रिशूल पहली बार 2019 के कुंभ मेले के दौरान मौजगिरी आश्रम में स्थापित किया गया था। 13 फरवरी 2019 को इस त्रिशूल का उद्घाटन तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की उपस्थिति में हुआ था। इस भव्य आयोजन ने पूरे देश के संतों और भक्तों को मौजगिरी आश्रम की ओर आकर्षित किया।

हर दिन सुबह त्रिशूल के समक्ष पूजा-अर्चना और फूल अर्पित किए जाते हैं। जो इसे श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाता है।

डमरू से होगा महाकुंभ का धार्मिक माहौल और जीवंत

त्रिशूल के साथ-साथ एक विशाल डमरू भी तैयार किया जा रहा है। जो महाकुंभ के धार्मिक और सांस्कृतिक अनुभव को और गहरा करेगा। यह डमरू शिव की दिव्य ऊर्जा का प्रतीक है और भक्तों के आध्यात्मिक अनुभव को और भी समृद्ध बनाएगा।

जूना अखाड़े के संरक्षक महंत हरि गिरि और नारायण गिरि ने इस त्रिशूल के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि यह प्रयागराज महाकुंभ का प्रतीक चिह्न होगा। साथ ही उन्होंने इसे अन्य कुंभ शहरों में भी इसी तरह के धार्मिक प्रतीकों को स्थापित करने की दिशा में एक कदम बताया।

आस्था और विज्ञान का संगम

यह त्रिशूल न केवल आध्यात्मिक विश्वास का प्रतीक है। बल्कि इसकी निर्माण प्रक्रिया में वैज्ञानिक सिद्धांतों का भी समावेश किया गया है। इसकी भव्यता और मजबूती भक्ति और विज्ञान के मेल का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करती है।

श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण

प्रयागराज के कीडगंज क्षेत्र में यमुना नदी के तट पर स्थित जूना अखाड़ा और मौजगिरी आश्रम का यह त्रिशूल महाकुंभ 2025 में आने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए ईश्वर से जुड़ने और अटूट आस्था के प्रतीक को देखने का एक अनूठा अवसर प्रदान करेगा।

प्रयागराज महाकुंभ 2025 के इस त्रिशूल का दर्शन न केवल आध्यात्मिकता का अनुभव देगा। बल्कि भक्ति की शक्ति और वास्तुशिल्पीय कौशल का बेजोड़ संगम भी प्रस्तुत करेगा। यह त्रिशूल आने वाले समय में श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र और महाकुंभ का सबसे बड़ा आकर्षण बनेगा।

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