Loksabha Election 2024: BSP में क्षमतावान जातिगत नेताओं को तलाशने में जुटीं मायावती, जानिए इसकी वजहें
यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा सुप्रीमो मायावती इस समय लोकसभा चुनाव की हिसाब से नेताओं को जिम्मेदारी पकड़ाने में जुटी हैं।
Bahujan Samaj Party chief Mayawati: बहुजन समाज पार्टी (Bahujan Samaj Party) प्रमुख मायावती ने अपने भरोसेमंद सिपहसालार मुनकाद अली को फिर से मेरठ की कमान सौंपी है तो दूसरी ओर उन्होंने दो अन्य नेताओं को भी पदमुक्त कर दिया है। बसपा के सूत्रों की माने तो मायावती 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव की तैयारियों के लिहाज से ही हर कदम उठा रही हैं ताकि समय रहते संगठन को दुरुस्त किया जा सके।
मायावती ने अब अपने भरोसेमंद लोगों को महत्वपूर्ण संगठनात्मक जिम्मेदारियां देने के अलावा उन लोगों के लिए उपयुक्त जगह तलाशने में व्यस्त हैं जो बसपा छोड़कर अन्य राजनीतिक दलों में शामिल हो गए थे।

भरोसेमंद नेताओं को अहम जिम्मेदारी
सोमवार को मायावती ने पूर्व राज्यसभा सदस्य मुनकाद अली को बड़ी जिम्मेदारी देते हुए उन्हें फिर से मेरठ का संयोजक नियुक्त किया था। पहले यह जिम्मेदारी शमसुद्दीन राईन के पास थी, जिन्हें अब बरेली मंडल की जिम्मेदारी दी गई है। कई मंडलों के संयोजक रहे सतपाल और मोहित जाटव से भी जिम्मेदारी वापस ले ली गई है।
पार्टी के भीतर जातिगत नेताओं की तलाश
सूत्रों ने कहा कि पार्टी के पुनर्निर्माण के लिए और विशेष रूप से पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं के बसपा छोड़ने के मद्देनजर मायावती ने अब वरिष्ठों को पार्टी के भीतर उन जातियों का प्रतिनिधित्व करने के लिए "संभावित" नेताओं की "तलाश" करने का निर्देश दिया है जिनके नेता नहीं हैं। 2016 के बाद से ही बीएसपी ने दूसरी पंक्ति के कई नेताओं को खो दिया है जिसमें पासी, कुर्मी, कुशवाह-मौर्य जैसे कई अहम जातियां शामिल हैं।
बाहरी नेताओं के बजाए अंदर के नेताओं पर फोकस
बसपा के एक पदाधिकारी ने कहा कि हमें नहीं लगता कि ये नेता वापस आएंगे या बहनजी (मायावती) उन्हें दोबारा शामिल करेंगी। रिक्त स्थानों को पार्टी के भीतर से भरने की जरूरत है। पार्टीजन अब हर स्तर पर संभावित नेताओं की तलाश करेंगे। उन्हें नेताओं के रूप में तैयार किया जाएगा। पार्टी अंतर पाटने के लिए बाहर से भी नेताओं को आयात कर सकती है।
कई दिग्गज नेता छोड़ चुके हैं बहनजी का साथ
गौरतलब है कि 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले कई बड़े नेता बसपा से बाहर हो गए थे। अन्य पिछड़ा वर्ग के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने जून 2016 में बसपा छोड़ दी। एक महीने बाद, एक और दिग्गज आरके चौधरी चले गए। चौधरी एक प्रमुख पासी नेता हैं। पासी समुदाय यूपी में दूसरा सबसे बड़ा अनुसूचित जाति समुदाय है और जाटवों के बाद लगभग 16 प्रतिशत है। जाटवों के बारे में कहा जाता है कि वे राज्य की कुल दलित आबादी का 50 प्रतिशत से अधिक हैं।
कई जातियों के प्रभावशाली नेताओं का आभाव
अगस्त 2017 में एक और प्रभावशाली पासी नेता, इंद्रजीत सरोज का निष्कासन हुआ। इन निष्कासनों ने पार्टी के मतदाता आधार को नुकसान पहुंचाया। इससे नेताओं में घबराहट पैदा हो गई और मतदाताओं का मोहभंग हो गया। पार्टी के एक पदाधिकारी ने कहा, "हमें इन दलित और ओबीसी समुदायों तक पहुंचने के लिए सक्रिय नेताओं की जरूरत है ताकि उन्हें अपने पास वापस लाया जा सके।"
बसपा छोड़ने के बाद दूसरे दलों में मिली बड़ी जिम्मेदारी
अक्टूबर 2016 में बीएसपी छोड़ने वाले बृजलाल खाबरी अब यूपी में कांग्रेस की कमान संभाल रहे हैं। मायावती के एक और वरिष्ठ सहयोगी नसीमुद्दीन सिद्दीकी भी उनका साथ छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए. ठाकुर जयवीर सिंह और एसपी सिंह बघेल, जो पहले बसपा में थे, अब भारतीय जनता पार्टी सरकार में मंत्री हैं। 2007 में बसपा के सोशल इंजीनियरिंग प्रयोग के मुख्य समर्थकों में से एक, ब्रजेश पाठक भाजपा सरकार में उपमुख्यमंत्री हैं।
बड़े नेताओं ने अपने क्षेत्रों में बसपा को नुकसान पहुंचाया
बसपा के सूत्रों ने कहा कि, "हमारे कम से कम एक दर्जन पूर्व नेता योगी आदित्यनाथ सरकार में हैं। पश्चिमी यूपी में, इसने पार्टी के लिए एक बड़ा अंतर पैदा किया है क्योंकि इनमें से कई नेता इस क्षेत्र में प्रभाव रखते हैं, जैसे हमारे पूर्व सांसद नरेंद्र कश्यप हैं जो भाजपा में शामिल हो गए। इसके अलावा, बसपा के दूसरे नंबर के नेता सतीश चंद्र मिश्रा पिछले कई महीनों से गायब हैं और पार्टी में उनकी वर्तमान स्थिति के बारे में कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है।












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