Taj corridor case: Mayawati की बढ़ेंगी मुश्किलें, ताज़ कारिडोर घोटाले में CBI को मिली अभियोजन की स्वीकृति
ताज़ कारिडोर घोटाले में CBI को अभियोजन की स्वीकृति मिल गई है। इसके बाद अब अटकलें लगाईं जा रही हैं इस मामले की जांच सीबीआई तेज कर सकती है जिससे मायावती की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

Taj corridor case: उतर प्रदेश में 175 करोड़ रुपये के ताज हेरिटेज कॉरिडोर मामले में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती की मुश्किलें बढ़ने वाली है। इस मामले में सीबीआई को अभियोजन चलाने की स्वीकृति मिल गई है। ऐसा माना जा रहा है कि अभियोजन की स्वीकृति मिलने के बाद सीबीआई मायावती पर शिकंजा कस सकती है। दरअसल जब ताज कॉरोडोर घोटाला हुआ था तब मायावती ही यूपी की सीएम थीं। तत्कालीन सिंचाई मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी का नाम भी इसमें शामिल है जो फिलहाल बसपा छोड़कर कांग्रेस में जा चुके हैं।
महेंद्र शर्मा पर मुकदमा चलाने की मंजूरी
सूत्रों के मुताबिक, नेशनल प्रोजेक्ट्स कंस्ट्रक्शन कॉरपोरेशन (NPCC) ही ताज कॉरिडोर परियोजना का काम कर रही थी। इसका उद्देश्य ताजमहल के पास पर्यटक सुविधाओं को उन्नत करना था। इसे मायावती के कार्यकाल के दौरान लागू किया जाना था। इसके तत्कालीन महाप्रबंधक (अब सेवानिवृत्त) महेन्द्र शर्मा पर मुकदमा चलाने की स्वीकृति मिल गई है।
शर्मा के खिलाफ मुकदमा चलाने का किया था अनुरोध
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सीबीआई के अभियोजन अधिकारी अमित कुमार ने नवंबर 2022 में मामले में शर्मा के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी का अनुरोध किया और एनपीसीसी ने पिछले महीने मंजूरी दे दी। पिछले 20 वर्षों में मामले में पहली बार इस मामले में अभियोजन की स्वीकृति मिली है। लखनऊ में सीबीआई की विशेष अदालत (भ्रष्टाचार) 22 मई को अभियोजन स्वीकृति की जांच करेगी और मामले को आगे बढ़ाएगी।
एनपीसीसी के अधिकारियों को गवाह बना सकती है CBI
सीबीआई एनपीसीसी के वरिष्ठ अधिकारियों को भी गवाह बनाने जा रही है, जिन्होंने हाल ही में शर्मा के खिलाफ अभियोजन की मंजूरी दी थी। उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल टीवी राजेश्वर ने जून 2007 में बसपा के फिर से सत्ता में आने के बाद मायावती के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति से इनकार करते हुए कहा था कि उनके और अन्य आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं।
बसपा सरकार ने अभियोजन की स्वीकृति देने से कर दिया था इंकार
राजेश्वर के इस कदम के बाद तत्कालीन बसपा सरकार ने तत्कालीन प्रमुख सचिव (पर्यावरण) आरके शर्मा और सचिव राजेंद्र प्रसाद के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति की अनुमति से इनकार कर दिया था। इसके बाद सीबीआई ने 2008 में मामले में आगे की कार्यवाही बंद कर दी थी। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ नवंबर 2012 में मुकदमा चलाने की मंजूरी के अभाव में मामले को बंद करने के ट्रायल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा।
सीबीआई ने दर्ज किया था मामला
सीबीआई ने भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी (आपराधिक साजिश), 420 (धोखाधड़ी), 467 (दस्तावेजों की जालसाजी), 468 (धोखाधड़ी के उद्देश्य से जाली दस्तावेजों का उपयोग करना) और 471 (जाली दस्तावेजों को असली के रूप में इस्तेमाल करना) के तहत मामला दर्ज किया था। इसके अलावा प्राथमिकी में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(डी) के तहत आधिकारिक पद के दुरुपयोग के आरोप भी शामिल थे।












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