5 लाख कानपुर पुलिस को नहीं दिया तो 8 बेगुनाहों को भेज दिया जेल
कानपुर। उत्तर प्रदेश में कानपुर के चकेरी सर्किल के डीएसपी ने प्रेस कॉफ्रेंस करके आठ युवकों को मीडिया के सामने पेश किया था और उन्हें अवैध हथियारों का कारोबारी बताया था। पुलिस ने दावा किया था कि ये आठों युवक दस अवैध हथियारों को लेकर आ रहे थे, तभी कानपुर की सीमा पर पुलिस ने इन्हें पकड़ लिया। पांच पुलिस अफसरों ने सभी को जेल भेजकर महकमे की गुड बुक में अपना नाम दर्ज करा लिया। लेकिन कहते हैं कि अपराधी कितना भी चालाक क्यों न हो, अपने जुर्म का कोई न कोई निशान छोड़ जाता है। अपराधी की भांति काम कर रहे ये पुलिस अधिकारी भी एक चूक कर बैठे और अपने गुनाह के निशान सीसीटीवी कैमरे के सामने छोड़ आये।

पुलिस का गुनाह सीसीटीवी में कैद
दरअसल पुलिस ने जिस संजय केसरवानी को गिरोह का सरगना बताकर कानपुर सीमा पर पकड़ा जाना बताया था, उसे उसके फल के गोदाम से उठाया गया था। पुलिस ने उससे पांच लाख रुपये की मांग की और पैसा न मिलने पर उसे थाने लाकर असली गुनहगार की जगह जेल भेज दिया। ये सारा वाकया सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गया। जमानत पर जेल से रिहा होने के बाद पीड़ित परिवार मीडिया के सामने आया और पुलिस द्वारा संजय को गोदाम से उठाने का वीडियो रिलीज कर दिया।

आठ युवकों को बताया हथियार सप्लायर
पुलिस के इस खेल को समझने के लिये कानपुर पुलिस की छह अप्रैल की प्रेस कॉन्फ्रेंस का कवरेज फिर से दिखानी होगी। तब कानपुर कैण्ट सर्किल के डीएसपी ने मीडिया के सामने आठ युवकों को पेश किया था। पकड़े गये बीटेक के एक छात्र ने मीडिया के सामने हकीकत बयान करनी चाही थी तब भी उसे डपट कर पीछे धकेल दिया गया था। डीएसपी स्तर के अधिकारी ने दावा किया था कि ये आठों युवक अवैध हथियारों के सप्लायर हैं और उन्नाव जिले से दस हथियार लेकर कानपुर डिलीवरी देने आ रहे थे, तभी उनके पांच जांबाज अफसरों ने उन्हें रंगे हाथों पकड़ लिया।

पुलिस ने बनाई मनगढ़ंत कहानी
हलांकि पुलिस ने उस समय भी जो कहानी गढ़ी थी, उसमें तमाम छेद थे। मसलन क्या आठों तस्कर हथियारों की इतनी बड़ी खेप लेकर कई किलोमीटर पैदल चलकर कानपुर आ रहे थे। यदि वे किसी गाड़ी पर थे, तो उस गाड़ी को सीज क्यों नहीं किया गया। ये हथियार उन्नाव में किस फैक्ट्री में बनते थे और इन्हें किसके हाथों बेचा जा रहा था, इन सवालों को तब भी डीएसपी साहब टाल गये थे। अपने पांच जांबाज अफसरों की तरीफ के पुलन्दे बांधने वाले डीएसपी के पास इस बात का भी कोई जवाब नहीं था कि क्या ये एक महज 'इत्तेफाक' था कि तीन अलग-अलग इलाकों के चौकी और बीट प्रभारी किसी एक चौराहे पर इकट्ठे हो गये थे।

कहां हैं असली गुनहगार
इतने सारे इत्तेफाक अगर पुलिस के साथ होते हैं तो एक इत्तफाक पीड़ित संजय के साथ भी होता है। वो ये कि पुलिस जिस संजय को कानपुर सीमा से गिरफ्तार होना दिखाती है। दरअसल उसे उसके स्टोर से उठाया गया होता है और इत्तफाकन ये सारा नजारा सीसीटीवी फुटेज में कैद हो जाता है। कोई तो असली कसूरवार होगा जिसे छोड़कर पुलिस ने उनके अवैध हथियार संजय और बाकी के सात बेकसूर युवकों के माथे मढ़ दिये?












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