राजनीति में आने से पहले सेना में रहे थे हुकुम सिंह, 1965 की जंग में थे शामिल

पश्चिमी यूपी का बड़ा राजनीतिक चेहरा थे हुकुम सिंह, सात बार विधाय

कैराना। कैराना लोकसभा से भाजपा के सांसद हुकुम सिंह का शनिवार रात को निधन हो गया। उन्होंने नोएडा के जेपी अस्पताल में अंतिम सांस ली। वो 80 साल के थे। हुकुम सिंह सात बार विधायक रहे और 2014 में लोकसभा में पहुंचे। उनके निधन पर पीएम मोदी ने शोक जाहिर किया है। कुछ दिनो पहले भी उनके मौत की अफवाह उड़ी थी लेकिन उनकी बेटी ने इसका खंडन कर दिया था। अपने समर्थकों के बीच बाबू जी के नाम से मशहूर रहे हुकम सिंह पश्चिम उत्तर प्रदेश का बड़ा राजनीतिक चेहरा थे, वो लगातार सुर्खियों में भी बने रहते थे। गुर्जर नेता के तौर पर भी उनकी पहचान थी। 2016 में उन्होंने कैराना से हिन्दुओं के पलायन का मुद्दा उठाते हुए कहा था कि मुस्लिमों के भय के चलते हिन्दु घर छोड़ रहे हैं। इसको लेकर वो काफी चर्चा में रहे थे।

पीसीएस जे पास किया था, सेना के लिए छोड़ी थी नौकरी

पीसीएस जे पास किया था, सेना के लिए छोड़ी थी नौकरी

कैराना में 5 अप्रैल 1938 को जन्मे बाबू हुकुम सिंह वकील, जज, सैनिक, और नेता रहे हैं। कैराना में ही 12वीं तक की पढ़ाई करने के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हुकुम सिंह ने बीए और एलएलबी की पढ़ाई की थी। इसके बाद उन्होंने वकालत शुरू की। इसी दौरान उन्होंने हुकुम सिंह ने पीसीएस जे की परीक्षा पास कर ली थी। ये वो समय था जब चीन और भारत जंग के मैदान में आमने-सामने थे। भारत को चीन के सामने कमजोर पड़ रहा था। हुकुम सिंह ने जज की नौकरी छोड़ सेना में भर्ती होने का फैसला किया। 1963 में हुकुम सिंह सेना में अधिकारी हो गए।

1965 में पाक के खिलाफ जंग में लिया हिस्सा

1965 में पाक के खिलाफ जंग में लिया हिस्सा

1965 में जब पाकिस्तान ने भारत पर हमला किया तो अपनी सैन्य टुकड़ी के साथ हुकुम सिंह ने अपनी टुकड़ी के साथ पाकिस्तानी सेना का सामना किया। इस समय कैप्टन हुकुमसिंह राजौरी के पूंछ सेक्टर में तैनात थे। कुछ साल सेना में रहने के बाद 1969 में उन्होंने सेना से इस्तीफा दे दिया और वकालत के पेशे में लौट आए। इस दफा वकालत के साथ-सात उन्होंने राजनीति में भी हाथ आजमा और 1970 में बार संघ अध्यक्ष का चुनाव लड़ा और जीता जीत भी गए। इसके बाद वो राजनीति में सक्रिय हो गए और कांग्रेस में शामिल हो गए। 1974 में वो कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा पहुंचे।

कांग्रेस के टिकट पर हुकुम सिंह दो बार विधायक चुने गए। 1980 में हुकुम सिंह ने कांग्रेस का हाथ छोड़ दिया और लोकदल के टिकट पर चुनाव लड़ा। तीसरी बार 1985 में उन्होंने लोकदल के टिकट पर चुनाव जीता। वो वीर बहादुर सिंह की सरकार में राज्यमंत्री और नारायण दत्त तिवारी की सरकार में कैबिनेट मंत्री बने। हुकुम सिंह 1980 में लोकदल के अध्यक्ष और 1984 में वे विधानसभा के उपाध्यक्ष भी रहे।

2014 में बने सांसद

2014 में बने सांसद

बाद में हुकुम सिंह भाजपा में शामिल हो गए। 1995 में बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ा और एक बार फिर विधायक बने। कल्याण सिंह की सरकार में वो मंत्री भी बने। 1995 से वो लगातार भाजपा में थे। भाजपा से ही उन्होंने 2009 में कैराना लोकसभा से चुनाव लड़ा लेकिन हार गए। 2014 में वो लोकसभा पहुंचे। हुकुम सिंह पर 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के बाद भी भड़काऊ भाषण देने के आरोप लगे थे और उन पर मुकदममे भी दर्ज हुए थे।

पश्चिम यूपी में बीते 23 साल से वो भाजपा के बड़े चेहरे थे लेकिन खास बात ये है कि हुकुम सिंह का राष्ट्रीय स्वंससेवक संघ से कोई जुड़ाव नहीं रहा और ना ही कभी राम मंदिर आंदोलन को लेकर वो सक्रिय रहे। इसी के चलते क्षेत्र के मुस्लिमों में भी वो काफी लोकप्रिय रहे।

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