अगर सपा में हुई टूट तो किस पार्टी को होगा सीधा फायदा और क्यों?

यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का बागी रुख कायम है। उन्होंने रविवार यानि 23 अक्टूबर को पार्टी के सभी विधायकों और एमएलसी की आपात बैठक बुलाई है।

नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश की सत्तारुढ़ समाजवादी पार्टी में ड्रामा खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा। चाचा शिवपाल यादव और भतीजे अखिलेश यादव के बीच जारी विवाद फिलहाल थमता दिख नहीं रहा है। इस बीच कयास लगने लगे हैं कि समाजवादी पार्टी कहीं टूट तो नहीं जाएगी?

akhilesh

सपा में जारी विवाद पर दूसरी पार्टियों बना रही रणनीति

अगर ऐसा होगा तो इसका सीधा फायदा विपक्षी पार्टियों को होना तय है। बीजेपी हो या फिर बहुजन समाज पार्टी या कांग्रेस। सभी दल यूपी चुनाव को लेकर रणनीति बिछाने में जुटे हुए हैं।

उनकी नजर समाजवादी पार्टी में मचे घमासान पर भी है। ऐसे में एसपी में बिखराव की स्थिति में वोटबैंक को साधने की कवायद के लिए सियासी दांव का इंतजार कर रहे हैं।

सपा में डैमेज कंट्रोल की कोशिशें तेज

सपा में डैमेज कंट्रोल की कोशिशें तेज

ऐसी स्थिति नहीं आए इसके लिए सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव लगातार कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने समाजवादी पार्टी को भीतर की कलह को सुलझाने के लिए पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठक की। साथ ही पार्टी नेताओं को दोनों धड़ों को साधने की कोशिश में जुटे हुए हैं।

हालांकि यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का बागी रुख कायम है। उन्होंने रविवार यानि 23 अक्टूबर को पार्टी के सभी विधायकों और एमएलसी की आपात बैठक बुलाई है। यह आपात बैठक उस वक्त बुलाई गई है जब अखिलेश यादव ने पार्टी में आगामी चुनाव के लिए टिकटों के बंटवारे का अधिकार मांगा है।

दूसरी ओर सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने 24 अक्टूबर को सपा के सभी विधायकों, सांसदों और पूर्व सांसदों की एक बैठक बुलाई है। पार्टी सूत्रों को उम्मीद है कि इन बैठकों में पार्टी का विवाद सुलझ जाएगा लेकिन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के तेवर किसी और ओर इशारा कर रहे हैं।

अगर टूट हुई तो विपक्ष की नजर इनके वोटबैंक पर

अगर टूट हुई तो विपक्ष की नजर इनके वोटबैंक पर

समाजवादी कुनबे का झगड़ा अगर ऐसे ही रहा और अगर वाकई में समाजवादी पार्टी में टूट होती है तो इससे जहां सपा को सीधा नुकसान होगा। वहीं भाजपा और बहुजन समाज पार्टी को इससे बड़े फायदे की उम्मीद है।

अगर सपा में फूट हुई तो सीधे-सीधे उनके वोटबैंक में सेंध लगेगी। जो तबका अभी तक समाजवादी पार्टी को पसंद करता था, उन्हें ही अपना वोट देता था। बिखराव के बाद ये वर्ग आखिर तय कैसे करेगा कि उसे किसे वोट देना है। ऐसे में कहीं ना कहीं वो दूसरे दल में भविष्य तलाशेंगे।

सपा से जुड़े मुस्लिम नेताओं ने विवाद को लेकर उठाए सवाल

सपा से जुड़े मुस्लिम नेताओं ने विवाद को लेकर उठाए सवाल

मुस्लिम वोटबैंक समाजवादी पार्टी के लिए काफी अहम होता है। समाजवादी पार्टी में जारी घमासान से सबसे ज्यादा परेशान इससे जुड़े मुस्लिम नेता हैं। उन्होंने इस मुद्दे पर पार्टी अध्यक्ष से मुलाकात करके इसे जल्द खत्म करने की मांग की है।

सपा से जुड़े मुस्लिम नेताओं का कहना है कि जिस तरह से सपा में अखिलेश गुट और शिवपाल गुट अलग-अलग मोर्चा खोले हुए हैं इससे वोटरों में बिखराव होगा। इसका फायदा विपक्ष उठाएगा।

मायावती ने पहले मुस्लिम वोटबैंक पर साध चुकी हैं दांव

मायावती ने पहले मुस्लिम वोटबैंक पर साध चुकी हैं दांव

बता दें कि उत्तर प्रदेश के चुनावी समर में मुसलमानों का वोट 17 फीसदी के करीब है। ये वोटबैंक कोई भी नतीजा पलटने की ताकत रखता है। अभी यूपी में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी मुसलमानों की सबसे बड़ी हमदर्द के तौर पर सामने आती हैं।

अगर सपा का झगड़ा नहीं सुलझा तो उनका ये वोटबैंक कहीं न कही मायावती की पार्टी बीएसपी के पास जाने की उम्मीद है। वैसे भी कुछ समय पहले मायावती ने रैली के दौरान कहा था कि मुसलमान समाजवादी पार्टी को वोट देकर अपना वोट बेकार न करें क्योंकि वहां परिवार के भीतर ही घमासान मचा हुआ है।

बीजेपी और कांग्रेस की नजर भी मुस्लिम वोटरों पर

बीजेपी और कांग्रेस की नजर भी मुस्लिम वोटरों पर

समाजवादी पार्टी में झगड़े का फायदा बीजेपी भी लेने की फिराक में हैं उसकी योजना यादव वोटरों को साधने की है। साथ ही मुस्लिम वोट बैंक पर भी बीजेपी नजरें गड़ाई हुई है। बीजेपी ने रणनीति के तहत एक बार फिर से मुख्यमंत्री का चेहरा सामने नहीं रखकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सहारे में यूपी में जोरआजमाईश करने की योजना में है।

इसके लिए पार्टी ने प्रदेश में प्रधानमंत्री मोदी की कई रैलियां रखी हैं। साथ ही मुस्लिम वोट बैंक को साधने के लिए क्षेत्रीय स्तर पर खास कार्यक्रम चलाने की योजना बना रही है।

कांग्रेस पार्टी भी बना रही अपनी रणनीति

कांग्रेस पार्टी भी बना रही अपनी रणनीति

बीजेपी के रणनीतिकार यूपी में बदल रहे सियासी माहौल पर नजरें गड़ाए हुए हैं। वहीं कांग्रेस पार्टी भी सपा में फूट का फायदा उठाने से नहीं हिचकना चाहेगी। कम से कम इसके रणनीतिकार प्रशांत किशोर इस माहौल को जरूर साधना चाहेंगे।

फिलहाल ये देखने की बात होगी कि सपा में जारी विवाद कहां तक जाएगा और इस पूरे घमासान का फायदा आखिर कौन सी पार्टी 2017 में उठा पाएगी?

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