राम मंदिर का CEO कितना पावरफुल होगा? क्या सरकार चलाएगी मंदिर प्रशासन? मोदी के सबसे भरोसमंद अफसर ने बताया सबकुछ
अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के बाद से मंदिर प्रशासन एक बहुत बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। पिछले कुछ दिनों में दान चोरी के आरोपों, एसआईटी (SIT) जांच और चंपत राय और अनिल मिश्रा जैसे बड़े नामों के इस्तीफों के बाद अब मंदिर की सुरक्षा और पैसों के मैनेजमेंट को मजबूत करने की तैयारी है।
इसी कड़ी में राम मंदिर के लिए देश के पहले चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर (CEO) की तलाश तेज हो गई है। राम मंदिर ट्रस्ट ने 13 जुलाई को एक्स पोस्ट में राम मंदिर के लिए CEO पद के लिए वैकेंसी निकाली है।

हर किसी के मन में यह सवाल है कि इस नए CEO के पास कितनी ताकत होगी? क्या मंदिर का पूरा कंट्रोल अब सरकार के हाथों में चला जाएगा?
इन सभी सवालों से पर्दा उठाते हुए राम मंदिर कंस्ट्रक्शन कमिटी के चेयरमैन नृपेंद्र मिश्रा ने सीईओ की शक्तियों और सरकार के रोल को लेकर स्थिति एकदम साफ कर दी है। रिटायर्ड IAS अफसर नृपेंद्र मिश्रा 2014 से 2019 तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रधान सचिव रह चुके हैं। इन्हें पीएम मोदी का भरोसेमंद अफसर माना जाता है।
सरकार का कितना होगा दखल और किसके इशारे पर काम करेगा CEO?
नृपेंद्र मिश्रा ने इंटरव्यू में बताया कि राम मंदिर के नए CEO के कामकाज में केंद्र या राज्य सरकार का किसी भी तरह का कोई दखल नहीं होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि CEO पूरी तरह से राम मंदिर ट्रस्ट के अधीन रहकर काम करेगा। एक तरह से CEO की भूमिका ट्रस्ट के एक मददगार (असिस्टेंट) के रूप में होगी।
सरकार का काम सिर्फ व्यवस्थाओं में सहयोग देना है, लेकिन मंदिर के अंदरूनी फैसलों, पैसों के हिसाब-किताब या मैनेजमेंट में सरकार का कोई रोल नहीं होगा। ट्रस्ट ही सर्वोपरि रहेगा और वही यह तय करेगा कि सीईओ को कितनी आजादी और पावर देनी है।
नए CEO को मिलेंगी कौन-कौन सी बड़ी शक्तियां?
राम मंदिर के इतिहास में पहली बार बनने जा रहे CEO के पास कई अहम जिम्मेदारियां होंगी। नृपेंद्र मिश्रा के मुताबिक, सीईओ के पास मुख्य रूप से ये अधिकार और काम होंगे।
- पैसे और बजट का पूरा मैनेजमेंट: मंदिर में आने वाले चढ़ावे, दान और वित्तीय व्यवस्थाओं की सीधी देखरेख सीईओ के जिम्मे होगी, ताकि दान चोरी जैसी घटनाओं पर हमेशा के लिए लगाम लगाई जा सके।
- भक्तों की सुविधाओं का ध्यान: अयोध्या आने वाले करोड़ों रामभक्तों को किसी तरह की परेशानी न हो, उनके रुकने, दर्शन और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम देखना सीईओ का मुख्य काम होगा।
- भरोसा कायम रखना: हालिया विवादों के बाद भक्तों के मन में मंदिर के मैनेजमेंट को लेकर जो भी शंकाएं हैं, उन्हें दूर कर अटूट विश्वास बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती होगी।
- अपनी टीम बनाने की छूट: सीईओ को अपने काम के लिए खुद का स्टाफ और टीम तैयार करने की पूरी पावर होगी, हालांकि यह सब भी ट्रस्ट के नियमों के दायरे में ही होगा।
कौन चुनेगा राम मंदिर का पहला CEO?
इस बड़े और जिम्मेदार पद के लिए सही उम्मीदवार खोजने का काम एक बेहद हाई-प्रोफाइल कमेटी को सौंपा गया है। 6 जुलाई को ट्रस्ट ने इस तीन सदस्यीय कमेटी का ऐलान किया था, जिसमें जस्टिस (रिटायर्ड) प्रमोद कोहली, लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) विष्णुकांत चतुर्वेदी और सुरेश हवारे (पूर्व चेयरपर्सन, NIT रायपुर) शामिल हैं।
इस कमेटी ने दिल्ली में हुई अपनी अहम बैठक में सीईओ के पद के लिए जरूरी योग्यताएं (अर्हता) और फॉर्म भरने की आखिरी तारीख तय कर दी है। इस चयन प्रक्रिया से खुद को दूर रखते हुए नृपेंद्र मिश्रा ने साफ किया कि वह नामों की सिफारिश करने वाली इस कमेटी की बैठकों का हिस्सा नहीं बनेंगे।
आगे क्या होगा?
जब नृपेंद्र मिश्रा से पूछा गया कि क्या हाल के विवादों से भक्तों के बीच कोई नाराजगी है, तो उन्होंने दावा किया कि सुग्रीव किला और अंगद टीला के पास आने वाले भक्तों से बात करने पर सिर्फ सकारात्मक बातें ही सामने आई हैं। पूजा-पाठ या व्यवस्था को लेकर भक्तों में कोई शिकायत नहीं है।
मंदिर के भविष्य और अगले कदमों को लेकर 22 जुलाई को ट्रस्ट की एक बहुत बड़ी बैठक होने जा रही है। इस बैठक में शामिल होने के सवाल पर नृपेंद्र मिश्रा ने कहा कि वह बिना वोटिंग राइट्स वाले एक एक्स-ऑफिशियो डायरेक्टर हैं। अगर बैठक का एजेंडा मंदिर के कंस्ट्रक्शन (निर्माण) से जुड़ा होगा, तो वह इसमें जरूर शामिल होंगे और अपनी राय रखेंगे, अन्यथा वह एजेंडा देखने के बाद ही इसमें जाने का फैसला करेंगे।














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