क्या अनशन पर बैठे किसी इंसान को पुलिस जबरन उठा सकती है? क्या बिना मर्जी ड्रिप लगाना सही है? क्या कहता है कानून
Sonam Wangchuk Hunger Strike: नीट पेपर लीक को लेकर 20 दिनों से अनशन पर बैठे सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को 18 जुलाई की सुबह दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर से जबरन हटाकर सफदरजंग अस्पताल में भर्ती करा दिया है। इस कार्रवाई के बाद देश में एक नई कानूनी बहस शुरू हो गई है। वांगचुक की पत्नी गीतांजलि ने साफ लफ्जों में कहा है कि डॉक्टरों और परिवार की मर्जी के बिना उनके पति को कोई भी दवा या ड्रिप न दी जाए।
अस्पताल के मेडिकल सुपरिटेंडेंट के बुलेटिन के मुताबिक, सोनम वांगचुक ने ड्रिप और मुंह से लिक्विड लेने से पूरी तरह मना कर दिया है। उनका ब्लड प्रेशर और पल्स तो ठीक है, पर शरीर में पानी की भारी कमी है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी अनशनकारी को जबरदस्ती खाना या दवा दी जा सकती है? हमारा कानून इस पर क्या कहता है? और ऐसे मामलों में कोर्ट का फैसला क्या रहा है।

क्या भूख हड़ताल में डॉक्टर जबरदस्ती लिक्विड डाइट दे सकते हैं?
भूख हड़ताल में भारत में जबरन खाना खिलाने या ड्रिप लगाने को लेकर कोई एक तय सामान्य कानून नहीं है। हालांकि वर्ल्ड मेडिकल एसोसिएशन की अंतरराष्ट्रीय गाइडलाइन कहती है कि अगर अनशन करने वाला इंसान अपने फैसले के अंजाम को अच्छी तरह समझता है और इलाज या खाना लेने से मना करता है, तो डॉक्टरों को नैतिक रूप से उसकी बात माननी चाहिए।
लेकिन इसके कुछ अपवाद भी हैं। अगर मरीज अनशन के दौरान बेहोश हो जाए या फैसला लेने की दिमागी हालत में न रहे, या कोर्ट उसकी जान बचाने के लिए कोई खास निर्देश जारी कर दे, तब डॉक्टर मरीज की भलाई के लिए नसों के जरिए (IV ड्रिप) दवा या लिक्विड दे सकते हैं।
क्या ड्रिप लगने से अनशन टूटा हुआ माना जाता है?
अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि क्या अस्पताल में ड्रिप लगते ही अनशन खत्म हो जाता है? इसका जवाब मेडिकल या कानूनी तौर पर 'ना' है।
ऐसा कोई नियम नहीं है। यह पूरी तरह इस बात पर तय होता है कि प्रदर्शनकारी ने अपनी मर्जी से ड्रिप ली है या सिर्फ अपनी जान बचाने के लिए उसे मजबूरी में मेडिकल सपोर्ट दिया गया है। इतिहास में कई बड़े आंदोलनों में ऐसा देखा गया है कि प्रदर्शनकारी अस्पताल में ड्रिप लगने के बाद भी अपने अनशन को जारी रखते हैं।
संविधान में क्या है कानून?
भारतीय संविधान में भूख हड़ताल को लेकर कोई अलग से कानून नहीं लिखा गया है। यहां दो अलग-अलग अधिकारों के बीच का संतुलन काम करता है।
अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b): यह हर भारतीय नागरिक को अपनी बात रखने (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और शांति से बिना हथियारों के इकट्ठा होकर विरोध करने का हक देता है।
अनुच्छेद 21: यह जीवन जीने का अधिकार है। इसके तहत सरकार और प्रशासन की यह कानूनी जिम्मेदारी होती है कि वे किसी भी नागरिक की जान की रक्षा करें। सोनम वांगचुक के मामले में भी दिल्ली हाई कोर्ट ने इसी बात को दोहराते हुए कहा है कि 'हर नागरिक की जिंदगी बेशकीमती है।'
अब जानिए कोर्ट ने ऐसे अनशन के मामलों में पहले क्या फैसला दिया है?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई बड़े फैसलों में साफ किया है कि अनशन करने वाले लोगों के प्रति सरकार को टकराव का रास्ता नहीं चुनना चाहिए। साल 2024 में 70 साल से अधिक उम्र के किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल शंभू बॉर्डर पर आमरण अनशन पर बैठे थे। 20 दिन बाद पुलिस ने उन्हें जबरन उठाकर लुधियाना के अस्पताल में भर्ती कराया था।
तब अदालत ने केंद्र और पंजाब सरकार को सख्त निर्देश दिए थे,"सरकार को डल्लेवाल की उम्र और उनकी सेहत से जुड़ी दिक्कतों को देखते हुए उन्हें पूरी मेडिकल मदद देनी चाहिए, लेकिन साथ ही उनके आंदोलन जारी रखने के फैसले का भी पूरा सम्मान किया जाना चाहिए।"
इसी तरह साल 2011 में दिल्ली के रामलीला मैदान में बाबा रामदेव के अनशन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया था। अदालत ने अपने फैसले में दर्ज किया था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और चार वरिष्ठ मंत्रियों ने हवाई अड्डे से लेकर होटल तक बाबा रामदेव को मनाने और अनशन टालने की हर संभव कोशिश की थी।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि महात्मा गांधी के सत्याग्रह से प्रेरित भूख हड़ताल न तो असंवैधानिक है और न ही कानूनन बैन है। जब तक इससे सार्वजनिक शांति और सामाजिक व्यवस्था को कोई बड़ा खतरा न हो, तब तक इसमें दखल नहीं दिया जा सकता।
क्या भूख हड़ताल करना आत्महत्या की कोशिश है?
क्या अपनी मांगों के लिए भूखे रहना और डॉक्टरों का सहयोग न करना आईपीसी की धारा 309 (आत्महत्या का प्रयास) के तहत अपराध है? फरवरी 2021 में मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस एन. आनंद वेंकटेश ने इस पर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था।
साल 2013 में एक विशेष शरणार्थी शिविर में बंद पी. चंद्रकुमार नाम के शख्स ने आवाजाही की आजादी न मिलने पर 10 दिनों तक भूख हड़ताल की थी। उन पर आरोप था कि तबीयत बिगड़ने पर उन्होंने तहसीलदार की मेडिकल टीम का सहयोग नहीं किया।
इस केस को पूरी तरह खारिज करते हुए जस्टिस एन. आनंद वेंकटेश ने कहा था, "भूख हड़ताल करना आईपीसी की धारा 309 के तहत कोई अपराध नहीं बनता है। अगर रिकॉर्ड पर मौजूद सभी बातों को सच भी मान लिया जाए, तो भी इसे खुदकुशी की कोशिश नहीं कहा जा सकता।" हमारी न्यायपालिका ने हमेशा यह साफ किया है कि एक तरफ जहां सरकार को हर नागरिक की जान बचानी है। वहीं दूसरी तरफ शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करने के अधिकार को भी कुचला नहीं जा सकता।














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