कैसे यूपी चुनाव में ओवैसी की एंट्री से बदल रहा है मुस्लिम वोटों का समीकरण ? जानिए

लखनऊ, 30 सितंबर: उत्तर प्रदेश के 82 विधानसभा क्षेत्रों में उम्मीदवारों की हार-जीत निश्तित करने की ताकत मुसलमानों को ऐसा वोट बैंक बनाता है, जिन्हें कोई भी राजनीतिक दल नजरअंदाज नहीं कर सकते। अबतक यूपी में मुस्लिम वोट पर सपा, बसपा और कांग्रेस जैसी पार्टियां ही अपना एकाधिकार समझी रही हैं। लेकिन, इस बार हैरदाबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी की सीरियस एंट्री ने मुसलमानों के वोटों के समीकरण को बिगाड़ दिया है। यही वजह है कि जिन पार्टियों को लगता था कि मुसलमानों के पास विकल्प नहीं है, वह ओवैसी को कोस रही हैं। वहीं जो क्षेत्रीय मुस्लिम पार्टियां पहले से थीं, उनमें भी अपना प्रभाव जमाने का हौसला कायम हुआ है।

गैर-भाजपा दलों में मुस्लिम वोटों के लिए गोलबंदी

गैर-भाजपा दलों में मुस्लिम वोटों के लिए गोलबंदी

ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के उत्तर प्रदेश चुनाव में उतरने के चलते बाकी क्षेत्रीय मुस्लिम केंद्रित पार्टियों ने भी इस बार के लिए खूब जोर लगाना शुरू कर दिया है कि उन्हें भी प्रदेश की सत्ता में ज्यादा भागीदारी मिले। ये तमाम पार्टियां भाजपा-विरोधी कथित 'सेक्युलर' वोटों को गोलबंद करना चाहती हैं। पिछले हफ्ते मोहम्मद अयूब की अगुवाई वाली पीस पार्टी और राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल ने अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए यूनाइटेड डेमोक्रेटिक एलायंस के नाम से गठबंधन करने का ऐलान किया है। अयूब ने यह भी कहा है कि उनका गठबंधन एआईएमआईएम समेत तमाम पिछड़े, दलित या मुस्लिम पार्टियों के साथ भी साझेदारी करने के लिए तैयार है, ताकि मुसलमानों का वोट बंटने न पाए।

सपा को हो सकती है ज्यादा मुश्किल

सपा को हो सकती है ज्यादा मुश्किल

2012 के यूपी चुनाव में पीस पार्टी को 4 सीटें मिली थीं, लेकिन 2017 में उसने वो चारों सीटें भी गंवा दीं। इसी तरह राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल आजमगढ़ इलाके में काफी मजबूत है, लेकिन कभी चुनाव नहीं जीत सकी है। अगर इन दलों के गठबंधन ने गंभीरता से चुनाव लड़ा और ओवैसी को भी मुसलमान वोटों का वास्ता देकर अपने साथ लाने में कामयाब रहे तो इसका खामियाजा समाजवादी पार्टी को सबसे ज्यादा भुगतना पड़ सकता है।

मुस्लिम नेतृत्व तैयार करना चाहते हैं ओवैसी

मुस्लिम नेतृत्व तैयार करना चाहते हैं ओवैसी

उत्तर प्रदेश में मुसलमानों की आबादी 19 फीसदी से अधिक है। इनकी तुलना कुछ हिंदू जातियों जैसे कि यादव, जाटव, राजभर और निषादों की जनसंख्या (अलग-अलग) काफी कम है। लेकिन, इन सब जातियों का कोई ना कोई अपना एक चेहरा है, जिनके नाम पर इनके ज्यादातर वोट पड़ते हैं। ओवैसी भी उसी आधार पर यूपी में मुसलमानों के बीच में से भी अपना नेतृत्व खड़ा करने का वादा कर रहे हैं। उनकी यही दलील है कि सभी पार्टियों ने मुसलमानों को सिर्फ एक 'वोट बैंक' की तरह इस्तेमाल किया, उनके मसलों की फिक्र नहीं की है। ओवैसी की पार्टी के नेताओं के मुताबिक हैदराबाद के सांसद प्रदेश के मुसलमानों को सपा, बसपा और कांग्रेस की 'गुलामी' से निकालना चाहते हैं।

बिहार के सीमांचल में मिल चुका है जीत का स्वाद

बिहार के सीमांचल में मिल चुका है जीत का स्वाद

ओवैसी को पता है कि अगर उनकी चल गई तो यूपी के 403 सीटों में से मुस्लिम बहुल 82 पर उनकी पार्टी या उनका गठबंधन बेहतर प्रदर्शन कर सकता है। एआईएमआईएम को पिछले साल बिहार के सीमांचल इलाके की मुस्लिम बहुल पांच सीटों पर जीत का स्वाद लग चुका है। वह इलाका भी हमेशा से आरजेडी, कांग्रेस और जेडीयू का गढ़ माना जाता था। ओवैसी पहले ही यूपी में 100 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की घोषणा कर चुके हैं। उन्होंने इसी महीने अयोध्या से चुनाव अभियान की शुरुआत भी कर दी है और कई जगहों पर सभाएं भी कर चुके हैं।

अब सिर्फ 'वोट बैंक' नहीं बनना चाहते मुसलमान!

अब सिर्फ 'वोट बैंक' नहीं बनना चाहते मुसलमान!

एआईएमआईएम के राष्ट्रीय प्रवक्ता सैयद असीम वकार ने हाल ही में पीटीआई से कहा है कि उनकी पार्टी का असल मकसद अपनी राजनीति स्थापित करने और मुसलमानों के बीच लीडरशिप तैयार करना है, जो समुदाय के भविष्य के लिए काम कर सके। उनके मुताबिक, 'यहां तक कि तथा-कथित धर्मनिर्पेक्ष पार्टियां भी, जिन्हें मुसलमानों के वोट मिलते रहे हैं, उन्होंने कभी भी मुस्लिम नेतृत्व उभरने का मौका नहीं दिया।' उन्होंने कहा कि सच्चर कमिटी की रिपोर्ट से सारी स्थिति सामने आ चुकी है। हालांकि, सपा, बसपा और कांग्रेस जैसी पार्टियां ओवैसी पर बीजेपी के हित में काम करने का आरोप लगा रही हैं। लेकिन, राजनीति के कुछ जानकार अलग नजरिया जाहिर कर रह हैं।

भाजपा से ज्यादा गैर-भाजपा दलों के निशाने पर हैं ओवैसी

भाजपा से ज्यादा गैर-भाजपा दलों के निशाने पर हैं ओवैसी

मसलन, राजनीतिक विश्लेषक परवेज अहमद का मानना है कि इस बार यूपी में 'ओवैसी फैक्टर' का निश्चित रूप से असर पड़ेगा। उनके मुताबिक 'इसका कारण यह है कि देश में हार्डलाइन हिंदुत्व की राजनीति के उदय के बाद मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग अपने अलग नेतृत्व के महत्त्व को समझने लगा है।' क्योंकि, सपा, बसपा या कांग्रेस जैसी पार्टियों ने मुस्लिम हितों में काम करने का दावा तो खूब किया है, लेकिन मुसलमानों से संबंधित मसलों पर शांत रहे हैं। यानी अहमद का कहना है कि ओवैसी बीजेपी के निशाने पर नहीं हैं, उन पार्टियों के निशाने पर हैं जो अबतक भाजपा का डर दिखाकर मुस्लिम वोट लेते रहे हैं।

मुसलमानों के एक वर्ग का बदल रहा है नजरिया

मुसलमानों के एक वर्ग का बदल रहा है नजरिया

अहमद ने यहां तक बताया है कि मुसलमानों का एक वर्ग ऐसा भी है, जो सोच रहा है कि भाजपा ने आखिर उन्हें नुकसान क्या पहुंचाया है। 'मुजफ्फरनगर दंगे भी बीजेपी के नहीं, बल्कि सपा के शासन के दौरान हुए। योगी आदित्यनाथ के कार्यकाल में ऐसे कोई दंगे नहीं हुए, जिसमें खासकर मुसलमानों को निशाना बनाया गया हो। सरकारी नौकरियों में राज्य में मुसलमानों का हिस्सा 2 फीसदी से भी कम है, जिसमें गैर-भाजपा शासित पार्टियों ने ही सबसे लंबे समय तक शासन किया है।'

उत्तर प्रदेश के मुस्लिम बहुल जिले कौन हैं ?

उत्तर प्रदेश के मुस्लिम बहुल जिले कौन हैं ?

2011 की जनगणना के मुताबिक यूपी में मुस्लिम आबादी 19.26% है। प्रदेश के मुसलमान बहुल जिले हैं- अमरोहा (78%), रामपुर, (50.57%), मुरादाबाद (47.12%), बिजनौर (43.04%), सहारनपुर (41.95%), मुजफ्फरनगर (40%) और बलरामपुर। आजमगढ़, बरेली, मेरठ, बहराइच, गोंडा और श्रावस्ती में भी 30 % से ज्यादा मुस्लिम आबादी है। वैसे कुछ जानकारों का दावा है कि यूपी में मुस्लिम लीडरशिप की बात हर चुनाव में आती है, लेकिन मुसलमानों का वोट मिलता सपा और बसपा को ही है। बहरहाल ओवैसी की पार्टी प्रदेश में ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (एसबीएसपी) के साथ 'भागीदारी मोर्चा' के तहत चुनाव लड़ेगी।

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