हंडिया में हुआ बड़ा उलटफेर, राजनीति के दो कद्दावर नेताओं की साख डूबी
हाकिम लाल न तो मीडिया की सुर्खियों में आए और न ही विवादों में घिरे। यहां तक कि उनके लिए स्टार प्रचारकों की बड़ी रैली या जनसभा भी नहीं हुई है। इसके बावजूद भी हाकिम ने बाजी पलट दी।
इलाहाबाद। हंडिया विधानसभा सीट पर पूर्व मंत्री राकेशधर त्रिपाठी के साथ सपा के एमएलसी व कद्दावर नेता वासुदेव यादव की साख डूब गई। न राकेशधर त्रिपाठी की पत्नी प्रमिला त्रिपाठी जीती और न ही वासुदेव यादव की बेटी निधी यादव। दो दिग्गजों की लड़ाई में बाजी बसपा के हाकिम लाल मार ले गए। प्रमिला त्रिपाठी जहां दूसरे स्थान पर रहीं वहीं निधि यादव को तीसरे स्थान से संतोष करना पड़ा। हंडिया के चुनाव में सारे अनुमान व कयास ध्वस्त हो गए। लड़ाई में नहीं गिने जा रहे हाकिम लाल ने न सिर्फ मठाधीशों को चित्त कर दिया बल्कि राजनीति का वो नाटकीय घटनाक्रम दिखाया जो कभी भाजपा के दिग्गज नेता मुरली मनोहर जोशी ने लोकसभा के चुनाव में देखा था।

हाकिम ने पलट दी बाजी
हाकिम लाल न तो मीडिया की सुर्खियों में आए और न ही विवादों में घिरे। यहां तक कि उनके लिए स्टार प्रचारकों की बड़ी रैली या जनसभा भी नहीं हुई है। इसके बावजूद भी हाकिम ने बाजी पलट दी और फर्श से अर्श तक का सफर तय कर दिखाया। हाकिम लाल हंडिया से बतौर बसपा प्रत्याशी 72446 वोट पाकर विजयी हुए। उनके निकटतम प्रतिद्वंदी प्रमिलाधर त्रिपाठी जो भाजपा-अद गठबंधन से अपनादल एस प्रत्याशी थी ने 63920 वोट हासिल किए। हाकिम ने 8 हजार से अधिक वोटों से प्रमिला को हराया। वहीं सपा से निधि यादव 55403 वोट के साथ हाकिम से बहुत पीछे रह गई।
वासुदेव गुट में खामोशी
मालूम हो कि यूपी बोर्ड के सचिव रहे और मौजूदा समय में सपा एमएलसी वासुदेव यादव का कद सपा में कैबिनेट मंत्री स्तर का है और उनकी सपा में इस तरह चलती है कि बिना शोर शराबे को अपनी बेटी के राजनीतिक कैरियर को आगाज कराने के लिए विधायकी का टिकट दिला दिया। वह भी विधायक प्रशान्त का टिकट काट कर वासुदेव ने निधि की जीत के लिए वो एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था लेकिन परिणाम के बाद वासुदेव खेमा किसी सदमे में जाता दिखा है।
राकेशधर हैं हंडिया की पहचान
हंडिया विधानसभा सीट अगर चर्चित है तो उसकी वजह है पूर्व शिक्षा मंत्री राकेशधर। असल मायने में हंडिया को पहचान दिलाने वाले और इस सीट को किसी जागीर की तरह बार-बार कब्जाने वाले पूर्व शिक्षा मंत्री राकेशधर त्रिपाठी ने इस बार अपनी पत्नी को चुनाव लड़ाकर अपनी साख दांव पर लगाई थी। जेल से छूटकर आए राकेशधर चुनाव की पूरी कमान संभाले हुये थे और यह चुनाव उनकै राजनैतिक कैरियर बचाने का आखिरी मौका। जिसमे वह फेल हो गए।












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