चुनाव लड़ने का अद्भुत रिकॉर्ड, लड़े 350 चुनाव लेकिन नसीब नहीं हुई जीत

काका जोगिन्दर सिंह उर्फ धरती पकड़ जो कि सिर्फ हारने के लिये ही चुनाव लड़ा करते थे और उन्होंने राष्ट्रपति चुनावों सहित आम और विधानसभा के 350 चुनावों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई थी।

बरेली। क्या कोई उम्मीदवार हारने के लिये चुनाव लड़ता है? शायद नहीं, छोटे से छोटा उम्मीदवार भी अपनी जीत को सुनिश्चित करने के लिये हर संभव प्रयास करता है। लेकिन बरेली की एक ऐसी शख्सियत थे काका जोगिन्दर सिंह उर्फ धरती पकड़ जो कि सिर्फ हारने के लिये ही चुनाव लड़ा करते थे और उन्होंने राष्ट्रपति चुनावों सहित आम और विधानसभा के कुल 350 चुनावों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई थी। आज चुनावी मौसम है, हर तरफ चुनावी चर्चा है ऐसे में काका की याद आ जाना स्वाभाविक ही है।

राजनीति के सेंटा 'काका' जोगेंदर सिंह

राजनीति के सेंटा 'काका' जोगेंदर सिंह

काका न केवल हारने के लिये जाने जाते थे बल्कि वे लोगों का मुंह मीठा कराने के लिये भी जाने जाते थे। बरेली के बड़ा बाजार में कापड़ों की दुकान पर हर आने-जाने वाले को काका छुआरे, किसमिस और मिसरी देकर उनका मुंह मीठा कराते थे। काका चुनावों में अपनी हार सुनिश्चित कराने के लिये चुनाव लड़ा करते थे। उनका यह नशा था कि वे चुनावों में खड़े होकर रिकॉर्ड कायम करें। इसी के चलते उन्होंने विधायक से लेकर राष्ट्रपति तक के 350 से ज्यादा चुनावों में अपनी उम्मीदवारी दर्ज कराई थी।

विधायकी से लेकर राष्ट्रपति तक का चुनाव लड़ा

विधायकी से लेकर राष्ट्रपति तक का चुनाव लड़ा

एक समय वो था जब काका को बरेली से विधायकी लड़ने के लिये नेहरू जी ने अपनी पार्टी से टिकट की पेशकश की थी। लेकिन काका ने निर्दलीय होकर ही चुनाव लड़ा। उनका चुनाव लड़ने का जज्बा ऐसा था कि वो हर किसी राज्य में होने वाले चुनावों में लड़ने पहुंच जाते थे। काका चुनाव में किसी भी दल से टिकट लेकर लड़ने को नामर्दी मानते थे और निर्दलीय ही मैदान में डटे रहते थे। उनके पास लोगों को देने के लिये छुआरे और मिसरी उनकी पोटली में हमेशा रहता था। जिससे लोग उन्हें छुआरे वाले काका के नाम से भी जानने लगे।

बेटे अतर सिंह ने परंपरा को रखा है जिंदा

बेटे अतर सिंह ने परंपरा को रखा है जिंदा

अब काका तो हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनके बेटे अतर सिंह ने उनकी इस परंपरा को आज तक जिंदा रखा है। काका ने राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा और उप राष्ट्रपति के.आर. नारायणन के खिलाफ भी पर्चा भरा था। तब इन पदों पर चुनाव निर्विरोध होता था लेकिन काका के चलते नहीं हो सका। दोनों प्रत्याशी चुनाव जीत गए और काका ने सर्वोच्च न्यायालय में नामांकन को चुनौती दे डाली थी। काका अब दुनिया को अलविदा कह चुके हैं लेकिन उनकी यादें आज भी लोगों के जहन में जिंदा हैं। काका जोगेंदर सिंह उर्फ धरती पकड़ आज हमारे बीच में तो नहीं हैं लेकिन उनकी याद हमें चुनाव में जरूर आती है और उनकी वो मुंह मीठा कराने की रिवायत भी याद आती है जिससे वह दूसरों का दिल जीत लिया करते थे। आज जरूरत है ऐसे राजनेताओं की जो लोगों के दिलों में अपने काम से मिठास घोल पाएं।

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