BJP President UP: पंकज चौधरी सबसे आगे या फिर होगी चौंकाने वाली एंट्री? यूपी बीजेपी को आज मिलेगा नया अध्यक्ष
BJP UP President Chunav Update News: उत्तर प्रदेश की राजनीति में आज (13 दिसंबर शनिवार) का दिन बेहद अहम माना जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के प्रदेश अध्यक्ष पद को लेकर लंबे समय से चल रहा इंतजार अब खत्म होने वाला है। 13 दिसंबर को लखनऊ स्थित बीजेपी प्रदेश कार्यालय में अध्यक्ष पद के लिए नामांकन की प्रक्रिया पूरी की जाएगी और अगर सब कुछ तय कार्यक्रम के मुताबिक रहा, तो 14 दिसंबर को उत्तर प्रदेश बीजेपी को अपना नया अध्यक्ष मिल जाएगा।
मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी का कार्यकाल पहले ही पूरा हो चुका है और अब पार्टी संगठन की कमान किसके हाथ जाएगी, इस पर सबकी नजरें टिकी हैं। फिलहाल रेस में केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री और महाराजगंज से सात बार के सांसद पंकज चौधरी सबसे आगे हैं। आज वो नामांकन करने लखनऊ जाएंगे।

🟡 UP BJP President Election: यूपी बीजेपी चीफ के लिए नामांकन आज, कल ऐलान
बीजेपी के तय कार्यक्रम के मुताबिक शनिवार (13 दिसंबर) को दोपहर 1 बजे से 3 बजे तक प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए नामांकन होगा। शाम 5 बजे तक नामांकन वापस लेने का समय रखा गया है। अगर एक ही उम्मीदवार मैदान में रहता है तो आज ही तस्वीर साफ हो जाएगी। चुनाव अधिकारी महेंद्रनाथ पांडेय ने बताया कि आज ही नामांकन, जांच और वापसी की प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी।
जरूरत पड़ने पर रविवार (14 दिसंबर) को मतदान कराया जाएगा, लेकिन अगर मुकाबले की स्थिति नहीं बनती है तो रविवार दोपहर नए प्रदेश अध्यक्ष के नाम का औपचारिक ऐलान कर दिया जाएगा।
🟡 पंकज चौधरी का नाम सबसे आगे
इस पूरे सियासी घटनाक्रम के बीच सबसे ज्यादा चर्चा जिस नाम की है, वह हैं केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री और महाराजगंज से सात बार के सांसद पंकज चौधरी। सूत्रों के मुताबिक पंकज चौधरी आज प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए नामांकन कर सकते हैं। कहा जा रहा है कि उनके नाम पर शीर्ष नेतृत्व की मुहर लग चुकी है और बस औपचारिक ऐलान होना बाकी है। पिछले कई दिनों से उनका नाम रेस में सबसे आगे चल रहा है। पंकज चौधरी कुर्मी समाज से आते हैं और ओबीसी वर्ग का मजबूत चेहरा माने जाते हैं।
हालांकि बीजेपी की राजनीति में आखिरी वक्त तक सस्पेंस बनाए रखने की परंपरा रही है। इसलिए कुछ नेताओं का मानना है कि पार्टी अंतिम समय पर किसी चौंकाने वाले चेहरे का भी ऐलान कर सकती है, हालांकि इस बार इसकी संभावना कम मानी जा रही है।
🟡 भाजपा यूपी अध्यक्ष के लिए दिल्ली से लखनऊ तक लंबा मंथन
यूपी प्रदेश अध्यक्ष के चयन को लेकर दिल्ली से लखनऊ तक कई दौर की बैठकें हो चुकी हैं। 11 दिसंबर को दिल्ली में पार्टी के शीर्ष नेतृत्व और संगठन मंत्री बीएल संतोष के साथ मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी की बैठक हुई थी।
इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यूपी के एनडीए सांसदों के साथ मुलाकात भी हुई। बताया जाता है कि इस बैठक में प्रधानमंत्री ने खुद को मजदूर बताते हुए सांसदों से कहा कि आप बस काम करिए, यह मजदूर आपके साथ खड़ा है। इसे संगठन और सरकार के बीच तालमेल का संदेश माना जा रहा है।
🟡 UP BJP प्रदेश अध्यक्ष के लिए कितने नेताओं के नाम रेस में?
यूपी प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए फिलहाल छह नामों की सबसे ज्यादा चर्चा है। इनमें पंकज चौधरी के अलावा बीएल वर्मा, साध्वी निरंजन ज्योति, बाबूराम निषाद, धर्मपाल सिंह और स्वतंत्र देव सिंह शामिल हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बीजेपी किसी हैवीवेट नेता को सरप्राइज के तौर पर प्रदेश अध्यक्ष बना सकती है। डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य का नाम इसी वजह से चर्चा में है। उनके प्रदेश अध्यक्ष रहते ही बीजेपी 2017 में सत्ता में लौटी थी। संगठन मंत्री बीएल संतोष का लखनऊ दौरा भी इन अटकलों को हवा दे रहा है।
पंकज चौधरी पूर्वांचल से आते हैं और संगठन में उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है। पार्षद से राजनीति की शुरुआत कर उन्होंने गोरखपुर के डिप्टी मेयर तक का सफर तय किया और 1991 में पहली बार सांसद बने। सात बार सांसद रह चुके पंकज चौधरी को एक कुशल प्लानर और प्रधानमंत्री मोदी का करीबी माना जाता है।
बीएल वर्मा बदायूं से आते हैं और लोध बिरादरी से ताल्लुक रखते हैं। वह भी केंद्र में राज्य मंत्री हैं। साध्वी निरंजन ज्योति निषाद समाज से आती हैं और पूर्व केंद्रीय मंत्री रह चुकी हैं। वहीं धर्मपाल सिंह, स्वतंत्र देव सिंह और बाबूराम निषाद भी ओबीसी वर्ग के प्रभावशाली चेहरे माने जाते हैं।
🟡 पिछड़ा वर्ग (OBC) पर क्यों टिकी है भाजपा की नजर
यूपी प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर पिछड़ा वर्ग के नेता को चुने जाने के पीछे कई सियासी वजहें बताई जा रही हैं। 2019 के मुकाबले 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को ओबीसी वोटों में गिरावट का सामना करना पड़ा। आंकड़ों के मुताबिक कुर्मी और कोइरी समाज का समर्थन करीब 80 प्रतिशत से घटकर 61 प्रतिशत पर आ गया। अन्य ओबीसी वर्गों का समर्थन भी 74 प्रतिशत से घटकर 59 प्रतिशत रहा। ऐसे में पार्टी संगठन को फिर से मजबूत करने के लिए ओबीसी चेहरे पर दांव लगाया जा सकता है।












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