Ayodhya Ram Mandir: कौन हैं अयोध्या के कालेराम? 500 साल पहले संतों ने जिनकी मूर्ति सरयू में कर दी थी प्रवाहित

Ayodhya News: अयोध्या का कोना- कोना किसी ना किसी रूप में धर्म और आस्था से जुड़ा है। लेकिन आज से पांच शताब्दी पहले यहां बहुत कुछ बदल गया था, जिसे रामनगरी के काले इतिहास के रूप में जाना जाता है। बात तब की है जब अयोध्या की पहचान बदलने के लिए यहां लगातार मुगल शासकों ने धार्मिक स्थलों में परिवर्तन और तोड़फोड़ किया। अयोध्या के कालेराम मंदिर (Kaleram Mandir) में प्रतिष्ठित विग्रह उन्हीं में से एक है। इस मंदिर में पुर्नप्रतिष्ठित की गई मूर्ति उन पांच धार्मिक स्थलों की मूर्तियों में कभी शामिल थी, जिसे आज 2000 वर्ष पहले अयोध्या में उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने स्थापित किया था।

मुगल शासनकाल में हिंदू मंदिरों पर हुए हमले के दौरान अपने आराध्य यानी भगवान का भवन टूटते देख अयोध्या के पुजारियों का हृदय भर आया। अयोध्या में ऐसे कुछ प्रमख मंदिर हैं,जिनका इतिहास ही विलुप्त सा हो गया। जबकि कुछ प्रमुख मंदिर ऐसे हैं, जिनके विग्रह बाद में मिले और फिर से उन्हें प्रतिष्ठित किया गया।

Ayodhya Kaleram Mandir

220 पुराना इतिहास ज्ञात
अयोध्या में राम मंदिर (Ayodhya Ram Mandir) के साथ अन्य मंदिरों के इतिहास को लेकर इतिहासकारों ने दावा किया है कि मुगल आक्रांताओं से मंदिर में प्राण प्रतिष्ठित विग्रह को बचाने ने संतों, महंतों ने उसे सरयू नदी में प्रवाहित करना उचित समझा। अयोध्या के स्वर्गद्वार इलाके में स्थित में कालेराम मंदिर में स्थापित उन्हीं विग्रहों में से एक है। इस इस मंदिर का इतिहास 220 साल पुराना है। कालेराम मंदिर के इतिहास के अनुसार, श्रीरामजन्म भूमि में आक्रांताओं के आक्रमण के समय तत्कालीन पुजारी श्यामानंद ने भगवान के विग्रह को अपमान से बचाने के लिए सरयू नदी में प्रवाहित कर दिया था। यह विग्रह 1748 के आसपास महाराष्ट्रीयन संत नरसिंह राव मोघे को मिली। कथित रूप से ये दावा किया किया गया मूर्ति के मिलने पहले मोघे को तीन-तीन बार के स्वप्न में सरयू में मूर्ति होने की जानकारी हुई। मान्यता के अनुसार स्वप्न में ही मिले आदेश के बाद जब वे सरयू नदी के पास पहुंचे तो उन्हें मूर्ति मिली।

5 प्राचीन मंदिरों के विग्रह में कालेराम शामिल
अयोध्या नगर को फिर से बसाने का श्रेय उज्जैन के राजा विक्रमादित्य को जाता है। माना जाता है कि उन्होंने अयोध्या को 2000 वर्ष पहले फिर से बसाया। इस दौरान उन्होंने राम मंदिर के साथ कुल पांच मंदिर बनवाए थे। जिसमें बड़ी देवकाली मंदिर, कनक भवन का वह विग्रह जो ओरक्षा के राम राजा मंदिर में विराजित है। इसके अलावा कनक भवन के निकट राजगद्दी और लक्ष्मण घाट पर स्थित शेषावतार मंदिर के विग्रह है। जबकि पांचवे मंदिर में कालेराम का विग्रह का स्थापित किया था।

क्यों पड़ा कालेराम पड़ा नाम?
वर्ष 1528 के बाद मंदिर 1748 के आसपास मिली थी। चूंकी 220 वर्ष तक नदी के तलहटी में पडे होने के चलते ये और काली पड़ गई थी। इसलिए मूर्ति काली पड़ गई थी। ऐसे में हाथ में मूर्ति लेते ही संत मोघे के मुंह से अचानक 'कालेराम' शब्द निकल पड़ा। जिसके बाद इस विग्रह को जहां स्थापित किया गया, मंदिर का नाम कालेराम ही रखा गया।

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