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ओवैसी की यूपी में एंट्री से भाजपा को फायदा, सपा को नुकसान?

ओवैसी की यूपी में एंट्री से भाजपा को फायदा, सपा को नुकसान?

लखनऊ: बसपा, सुभासपा और प्रसपा का ओवैसी प्रेम देख अगर कोई दल सबसे ज्यादा मगन है तो वह है बीजेपी। बसपा, सुभासपा, प्रसपा और असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम में सियासी गठबंधन, अगले विधान सभा चुनाव में भाजपा और सपा का खेल बिगाड़ सकता है। क्योंकि दलित और मुस्लिम एकसाथ हो गए तो बीजेपी के लिए भी चुनौती कड़ी हो जाएगी। लेकिन कागजी गणित और वास्तविक सियासी गणित में बहुत फर्क होता है।

भाजपा चाहती है ओवैसी मजबूती से लड़ें

भाजपा चाहती है ओवैसी मजबूती से लड़ें

इसी लिए बीजेपी चाहती है कि ओवैसी 22 के विधान सभा चुनाव में पूरी ताकत से यूपी के मैदान में उतरें। ओवैसी की पार्टी ने बिहार में 5 सीट जीती और कई सीटों पर दूसरे दलों का खेल बिगाड़ दिया। आरजेडी के मन में जो लड्डू फूट रहा था वह चूर-चूर हो गया। इससे ओवैसी के मन का राजनीतिक शेर दहाड़ने लग है। बिहार से उत्साहित ओवैसी फिलहाल बंगाल को लेकर दहाड़ रहे हैं। ममता दीदी इससे परेशान हैं। क्योंकि जिस तरह यूपी में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी मुसलमानों की सबसे ज्यादा चहेती पार्टी है उसी तरह बंगाल में ममता की तृणमूल कांग्रेस मुसलमानों की प्रिय है। बंगाल के मैदान में ओवैसी के उतरने से, आरजेडी की तरह सबसे ज्यादा तृणमूल को नुकसान हो सकता है। बंगाल में लोकसभा के बाद अब विधान सभा चुनाव में भी बीजेपी ने पहले ही ममता का तनाव बढ़ा रखा है।

पश्चिम बंगाल में कुल मुस्लिम आबादी करीब 27 प्रतिशत है। मुर्शिदाबाद में 66.3 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। इस क्षेत्र में अंतर्गत करीब 22 विधानसभा सीटें आती हैं। मालदा क्षेत्र में 12 विधानसभा सीटें आती हैं और यहां मुस्लिम आबादी 51.3 प्रतिशत है। उत्ततर दीनापुर क्षेत्र में मुस्लिम आबादी 49.9 प्रतिशत है। इस क्षेत्र में 9 विधानसभा सीटें आती हैं। बीरभूम में मुस्लिम आबादी 37.1 प्रतिशत है। इस क्षेत्र में 11 विधानसभा सीटें हैं। दक्षिण 24 परगना में मुस्लिम आबादी 35.6 प्रतिशत है। इस क्षेत्र में 31 विधानसभा सीटें आती हैं। यहाँ ध्यान देने की बात है की बंगाल में तृणमूल के अलावा अभी कोई दूसरा राजनीतिक दल नहीं है जिस पर मुस्लिम भरोसा कर सकें।

ओवैसी की मजबूती बंगाल में ममता के लिए लेकिन यूपी में सपा के लिए हानिकारक

ओवैसी की मजबूती बंगाल में ममता के लिए लेकिन यूपी में सपा के लिए हानिकारक

लेकिन यूपी में सियासी गणित ज्यादा उलझा हुआ है। उत्तर प्रदेश के मुस्लिम हमेशा टैक्टिकल वोटिंग करते हैं। यानी उस दल को वोट देते हैं जो बीजेपी को हरा सके। इस कसौटी में सपा खरी उतरती है। लेकिन बसपा से भी मुसलमानों को उम्मीद रहती है। अगर मुस्लिम मतदाताओं को लगा कि बसपा की स्थिति मजबूत है तो उनके साथ भी जा सकते हैं। ऐसा 2007 के चुनाव में हो भी चुका है। अगर बसपा और ओवैसी की एआईएमआईएम में चुनाव गठबंधन हो जाता है और साथ में ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा की भी आ जाती है तो सपा का खेल बिगड़ सकता है। साथ ही मुस्लिम वोट का सपा, और बसपा एंड कम्पनी के बीच बिखराव भी होगा। बंगाल में ओवैसी सत्तारूढ़ ममता को नुक्सान पहुंचा सकते लेकिन यूपी में सत्तारूढ़ बीजेपी के बजाय सपा नुकसान पहुंचाएंगे। क्योंकि यूपी में मुस्लिम वैसे भी बीजेपी को वोट नहीं देते। बंगाल और यूपी में यही बड़ा फर्क है।

असदुद्दीन ओवैसी 16 दिसंबर को लखनऊ में थे। ओमप्रकाश राजभर से गले मिलने के बाद उन्होंने उन्होंने यूपी की नहीं दीदी की बात की और उन्हें खरी खरी सुनाई। इसीलिए सपा ओवैसी को बीजेपी की बी टीम कहती है। ओवैसी के आने से उत्तर प्रदेश में 2022 के विधान सभा चुनाव रोचक हो जायेंगे। मायावती की बसपा और शिवपाल की प्रसपा भी ओवैसी की पार्टी पर डोरे डाल रहीं हैं। बीजेपी चाहती है यह मोहब्बत फले-फूले। ओवैसी यूपी में किसी भी दल से हाथ मिलाकर चुनाव लड़ें, फायदा बीजेपी का होगा। अगर सपा न होती तो यूपी में दलित-मुस्लिम गठबंधन बीजेपी को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता था। इसी लिए ओवैसी के आने पर बीजेपी के दोनों हाथ में लड्डू होगा।

मुसलमानों के लिए एक तरफ बहनजी दूसरी तरफ माँ है

मुसलमानों के लिए एक तरफ बहनजी दूसरी तरफ माँ है

दूसरी तरफ प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (प्रसपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव ने असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन को धर्मनिरपेक्ष बताते हुए उसके सहित अन्य छोटे दलों से गठबंधन करने का एलान कर भावी सियासत का संकेत दे दिया है। यूपी में जमीन तलाश रहे ऑल इंडिया मजलिस-इत्तेहादुल मुसलमीन (एआईएमआईएम) प्रमुख व सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने बुधवार को छोटे दलों के साथ मिलकर यूपी विधानसभा चुनाव लड़ने का एलान कर दिया। उन्होंने सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के प्रमुख ओमप्रकाश राजभर से मुलाकात के बाद कहा, अब हम राजभर के नेतृत्व में गठित भागीदारी संकल्प मोर्चा का हिस्सा हैं। राजभर के नेतृत्व में सभी छोटे दल मिलकर चुनाव लड़ेंगे। वहीं, राजभर ने कहा कि ओवैसी के शामिल होने से मोर्चा और मजबूत होगा। इस मोर्चे में अब तक 9 छोटे दल शामिल हो चुके हैं। आगे कुछ और दलों के भी शामिल होने की संभावना है। ओमप्रकाश राजभर ने कहा प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष शिवपाल यादव से जल्द ही मुलाकात हो सकती है। ओवैसी के भी जल्द शिवपाल से मिलने की चर्चा है। बसपा से गठबंधन की संभावना पर ओम प्रकाश राजभर ने कहा कि फिलहाल तो मायावती से इस मुद्दे पर कोई वार्ता नहीं हो पाई है। ऐसा लगता है ओवैसी यूपी में फुटकरिया दल को साथ लेकर बिहार के फार्मूले पर चुनाव लड़ना चाहते हैं। लेकिन दोनों राज्यों के सियासी माहौल में फर्क है। हो सकता है ओवैसी और उनके साथी दल बहन जी के साथ मिल कर चुनाव लड़ें लेकिन नहीं भूलना चाहिए कि यूपी में मुसलमानों के लिये एक तरफ बहन जी हैं तो दूसरी तरफ सपा के रूप में माँ है।

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