बुआ- बबुआ और भैया आए साथ तो फूलपुर से भाजपा को धोना होगा हाथ, पढ़िए ये विशेष रिपोर्ट

Written By: अमरीष मनीष शुक्ला
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इलाहाबाद। हिंदुस्तान को पहला प्रधानमंत्री देने वाला लोकसभा क्षेत्र फूलपुर एक बार फिर से चुनाव के लिए तैयार है। भूतपूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इसी सीट पर जीत दर्ज कर देश की सत्ता संभाली थी और इसी सीट पर पहली बार केशव प्रसाद मौर्य ने बीते लोकसभा चुनाव में भगवा भी लहराया था। यह सीट केशव मौर्य के इस्तीफे के बाद खाली हो गई है और अब इस पर उपचुनाव होना है। उपचुनाव में केशव प्रसाद मौर्य की जगह चुनाव कौन लड़ेगा यह अभी तय नहीं हुआ है, लेकिन विपक्ष के तीन दल अगर साथ आए तो भाजपा की मुश्किलें पूरी तरह से बढ़ जाएंगी। पढ़िए फूलपुर लोकसभा सीट पर राजनीतिक गणित का ये शानदार विश्लेषण...

बुआ- बबुआ और भैया का साथ बिगाड़ सकता है खेल

बुआ- बबुआ और भैया का साथ बिगाड़ सकता है खेल

राजनीति में बुआ- बबुआ और भैया के नाम से मशहूर हो चुके तीन दलों के मुखिया फिलहाल इस सीट पर भाजपा को मात देने की गोटियां फेंक सकते हैं। बसपा सुप्रीमो मायावती से अपने गठबंधन के संकेत अखिलेश यादव ने कुछ दिन पहले दिए थे और साफ कर दिया था कि बुआ से कोई झगड़ा नहीं है। जबकि विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी के साथ अखिलेश का दोस्ताना अंदाज पूरे उत्तर प्रदेश में देखा था। ऐसे में अगर कांग्रेस- बसपा और सपा उपचुनाव में गठबंधन करती है और अपना संयुक्त प्रत्याशी फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में उतारती है तो यह सियासी गणित कहती है कि भाजपा को इस सीट से हाथ धोना पड़ सकता है। हालांकि मोदी लहर में जिस तरीके से केशव मौर्य ने फूलपुर लोकसभा से सभी विपक्षी दलों को के प्रत्याशियों को धूल में उड़ा दिया था उससे यह साफ है कि भाजपा के पास इस लोकसभा सीट पर पर्याप्त वोट बैंक है, लेकिन कहीं ना कहीं इसमें मोदी लहर का बड़ा असर था यह भी कटु सत्य है। फिलहाल इस बार केशव मौर्य का उत्तराधिकारी ढूंढना भाजपा के लिए आसान नहीं होगा क्योंकि स्थानीय नेतृत्व में भाजपा का कोई ऐसा बड़ा नेता नहीं है जो केशव के नाम के अनुरूप कार्य कर सके।

विपक्ष के समक्ष समस्या

विपक्ष के समक्ष समस्या

भाजपा से इस सीट को छीनने में विपक्ष के समक्ष जो सबसे बड़ी समस्या है, वह है गठबंधन। सबसे पहले तो विपक्ष का गठबंधन होगा या नहीं इस पर ही पूरी सियासी गणित अटकी हुई है। उसके बाद दूसरा जो मुद्दा होगा वह किसी एक चेहरे पर दांव खेलना होगा, लेकिन उससे पहले भी पहले गठबंधन की गणित ही सर्वोपरि है। यहां समस्या इस बात की है कि बसपा हमेशा से उपचुनाव से दूरी बनाकर रखती है यानी उप चुनाव नहीं लड़ती है। ऐसे में इस लोकसभा उपचुनाव में क्या बसपा अपना प्रत्याशी उतारेगी? अपना समर्थन किसी को देगी ? यह देखने वाला विषय होगा। दूसरी ओर विधानसभा चुनाव में अखिलेश और राहुल गांधी साथ आ चुके हैं, लेकिन उसका परिणाम अच्छा नहीं था। ऐसे में उपचुनाव में इन दोनों का साथ आना बहुत सीधा विषय नहीं होगा।

संभावनाएं हैं बरकरार

संभावनाएं हैं बरकरार

फूलपुर लोकसभा सीट से कांग्रेस- बसपा - सपा और भाजपा चारों ने जीत हासिल की है। ऐसे में यह नहीं कहा जा सकता कि किसी एक पार्टी का ही वोट बैंक इस इलाके में है। फिलहाल यह पूरा इलाका कुर्मी बाहुल्य है और शुरुआती कुछ चुनाव के बाद यहां से बैकवर्ड राजनीति चरम पर रही है। क्योंकि यह उप चुनाव लोकसभा चुनाव का प्री ट्रायल है ऐसे में अपार संभावनाएं हैं कि अपनी ताकत को इकट्ठा करने के लिए बसपा - सपा और कांग्रेस एक साथ आ जाएं। चूंकि बसपा उप चुनाव नहीं लड़ती ऐसे में उसे अपना समर्थन देने में कोई हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए। फ़िलहाल पुराने विवाद इसमें जरूर कुछ अड़ंगा डाल सकते हैं, लेकिन राजनीति में विवाद भूलना कोई बड़ी बात नहीं है । कांग्रेस और सपा का गठबंधन बीते विधानसभा चुनाव में हो चुका है और ऐसे में उपचुनाव में इसे एक बार और आजमाने में कोई नुकसान नहीं है और गठबंधन की पूरी संभावना है और एक बड़ी मुलाकात के बाद यह गठबंधन हो सकता है । अगर तीनो दल एक साथ आते हैं और उनका संयुक्त प्रत्याशी मैदान में आता है तो निश्चित तौर पर भाजपा के लिए फिर से फूलपुर सीट पर कमल खिलाना मुश्किल होगा।

गठबंधन पर यह बन सकते हैं प्रत्याशी

गठबंधन पर यह बन सकते हैं प्रत्याशी

फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में अगर गठबंधन होता है तब कुछ ऐसे प्रत्याशी हैं जिनके नाम पर तीनों दल अपनी सहमति दे सकते हैं। कांग्रेस के दिग्गज नेता प्रमोद तिवारी, धर्मराज पटेल, सलीम शेरवानी, जनता दल यूनाइटेड के अध्यक्ष रहे शरद यादव, पूर्व विधायक अनुग्रह नारायण सिंह आदि शामिल हैं। गठबंधन प्रत्याशी के तौर पर इनमें जो सबसे बड़ा और प्रबल नाम है वह गिनीज आप वर्ल्ड बुक रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज करा चुके कांग्रेस के दिग्गज नेता प्रमोद तिवारी का है। राज्यसभा सदस्य प्रमोद तिवारी का नाम सबसे ऊपर है, अपने विशेष अंदाज बात व्यवहार और राजनीतिक कुशलता से इनकी टक्कर में दूसरा कोई प्रत्याशी नहीं है और यह कैसा नाम है जिस पर तीनों दल सहमति दे सकते हैं और प्रमोद तिवारी में वह क्षमता है कि वह लोकसभा उपचुनाव में गठबंधन की नैया पार लगा सकते हैं। दूसरे प्रत्याशी के तौर पर सपा के पूर्व सांसद धर्मराज सिंह पटेल है या दो बार फूलपुर लोकसभा से सांसद रह चुके हैं और पटेल वोट बैंक पर इनका प्रभाव हमेशा से रहा है। इनके नाम पर भी तीनों दल मुहर लगा सकते हैं।

विवादित बड़े नाम भी चर्चा में

विवादित बड़े नाम भी चर्चा में

इन नामों के अलावा कछ नाम ऐसे भी है जो विवादित तो है लेकिन इन में बहुत कुछ दमखम है और इनके पास एक बड़ा वोट बैंक है जो किसी भी सियासी दल के समीकरण को बना और बिगाड़ दोनों सकता है। इनमें दो दिग्गज नेता तो जेल में भी हैं और चुनाव लड़ सकते हैं। पूर्व में बसपा का एक बड़ा नाम रहे और मौजूदा समय में जेल में बंद करवरिया बंधुओं की सियासी ताकत को कोई नकार नहीं सकता है। बाहुबली करवरिया बंधुओं में से पूर्व सांसद कपिल मुनि करवरिया भी गठबंधन के प्रत्याशी हो सकते हैं। फूलपुर में बसपा का एक बार परचम लहरा चुके कपिल मुनि दुबारा जीत तो नहीं सके थे, लेकिन अपने वोट बैंक से उन्होंने खुद को दोबारा भी साबित किया था। उनके नाम पर भी चर्चा हो रही है और संभावना है कि गठबंधन उन्हें प्रत्याशी बना सकता है। इसके अलावा फूलपुर से पूर्व सांसद व बाहुबली अतीक अहमद बहुत ही कद्दावर नेता हैं और मुस्लिम वोट को एकतरफा बटोरने की क्षमता रखते हैं। जबकि बसपा छोड़कर सपा में आए इंद्रजीत सरोज भी बड़े कद के नेता हैं और बड़ा वोट बैंक अपने साथ रखते हैं। हालांकि इनके गठबंधन प्रत्याशी होने पर असमंजस की स्थिति बन सकती है।

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English summary
allahabad special report on phulpur bypoll keshav maurya bjp congress Bsp election date 11 march

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