यूपी में अखिलेश के PDA के सामने पस्त NDA, सवर्णों पर भारी पड़े पिछड़े उम्मीदवार
उत्तर प्रदेश में इस बार लोकसभा चुनाव में जिस तरह से इंडिया गठबंधन ने जबरदस्त प्रदर्शन किया उसके सामने भाजपा के पसीने छूट गए। प्रदेश में सपा ने सर्वाधिक 37 सीटों पर जीत दर्ज की है जबकि कांग्रेस के खाते में 6 सीटें आई हैं। वहीं भाजपा यूपी में 33 सीटों पर ही सिमट गई।
इस चुनाव में पिछड़ी जाति के सांसदों के मामलों में भी सपा आगे निकल गई है, इसकी बड़ी वजह रही है कि अखिलेश यादव की सोशल इंजीनियरिंग। अखिलेश की रणनीति के चलते प्रदेश में अगणी जाति के सांसदों की संख्या भी कम हुई है।

जिस तरह से अखिलेश यादव ने ओबीसी और दलित उम्मीदवारों को बड़ी संख्या में टिकट दिया, उसके सामने भाजपा के उम्मीदवार संघर्ष करते नजर आए। प्रदेश में इंडिया गठबंधन के कुल 43 उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की है, जिसमे से 21 उम्मीदवार ओबीसी हैं। जिसमे जबकि 9 उम्मीदवार दलित, 8 अपर कास्ट और 5 मुस्लिम उम्मीदवार हैं।
वहीं एनडीए की ओर से इस चुनाव में 36 उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की जिसमे से अपर कास्ट के 15, ओबीसी के 13, दलित वर्ग के 8 उम्मीदवार हैं। यूपी में कुल 80 लोकसभा सीटों की बात करें तो 34 सांसद ओबीसी समुदाय के हैं।
जबकि 23 सांसद सवर्ण समुदाय से आते हैं। 18 दलित और पांच मुस्लिम हैं। आजाद समाज पार्टी के दलित नेता चंद्रशेखर आजाद ने नगीना लोकसभा सीट से जीत दर्ज की है।
अगर 2019 से इसकी तुलना की जाए तो भाजपा ने सपा-बसपा-आरएलडी के महागठबंधन को मात दी थी। पिछले चुनाव में यूपी से 28 ओबीसी, 29 अगणी जाति के, 17 दलित और 6 मुस्लिम उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की थी।
इस चुनाव में अखिलेश ने ओबीसी, दलित और मुसलमानों को पीडीए के तहत मैदान में उतारा। पीडीए यानि पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक। पिछड़े हिंदुओं को अधिक प्रतिनिधित्व देने की अखिलेश की रणनीति रंग लाई और इस चुनाव में सपा को इसका स्पष्ट तौर पर लाभ हुआ।
यूपी में समुदायों का प्रतिनिधित्व
| समुदाय | एनडीए | इंडिया ब्लॉक | अन्य | कुल |
| ओबीसी | 13 | 21 | 0 | 34 |
| सवर्ण | 15 | 8 | 0 | 23 |
| दलित | 8 | 9 | 1 | 18 |
| मुस्लिम | 0 | 5 | 0 | 5 |
| कुल | 36 | 43 | 1 | 80 |












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