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Babri Masjid Demolition: बाबरी विध्वंस की बरसी आज, कारसेवकों ने 32 साल पहले गिराया था विवादित ढांचे को

Babri Masjid Demolition Anniversary: बाबरी विध्वंस की आज 32वीं बरसी है। आज से ठीक 32 साल पहले 6 दिसंबर 1992 को कारसेवकों की भीड़ ने बाबरी विध्वंस के विवादित ढांचे को गिरा दिया था। वहीं, 6 दिसंबर को कुछ लोग शौर्य दिवस के रूप में मनाते है तो कोई काले दिवस (ब्लैक डे) के रूप में। बाबरी विध्वंस की वजह से काफी लंबे वक्त तक अयोध्या में तनाव बना रहा था।

मगर, 09 नवंबर 2019 को सु्प्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए इस विवाद को खत्म कर दिया था। बता दें कि 6 दिसंबर 1992 में जब कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद गिराई थी उस वक्त उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह थे। बाबरी विध्वंस की साजिश रचने का आरोप भी कल्याण सिंह समेत लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती पर लगे थे।

Babri Masjid Demolition Anniversary

इस मामले में इनलोगों पर केस दर्ज हुआ था और बाद में कल्याण सिंह को इस मामले में एक दिन की जेल की सजा भी हुई थी। बता दें, कि बाबरी विध्वंस की घटना ने न केवल देश की राजनीति को प्रभावित किया, बल्कि हिंदू-मुस्लिम समुदायों के बीच तनाव को भी बढ़ाया, जिससे देश भर में सांप्रदायिक दंगे और हिंसा भड़क उठी थी।

दरअसल, बाबरी मस्जिद को सन् 1528 में मुगल सम्राट बाबर के आदेश पर बनवाया गया था, तभी से यह मस्जिद विवादों में थी। क्योंकि, यह मस्जिद उस स्थान पर बनी थी, जहां भगवान राम का जन्म हुआ था। ब्रिटिश शासन काल के दौरान भी यह मुद्दा उठाया गया था। हिंदूओं ने उस वक्त कहा था कि भगवान राम के जन्मस्थान मंदिर को तोड़कर मस्जिद बना ली गई।

इसके बाद से रामलला के जन्मस्थल को वापस पाने की लड़ाई शुरू हुई थी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, मस्जिद बनाने के 330 साल बाद 1858 में लड़ाई कानूनी हो गई और पहली बार परिसर में हवन, पूजन करने पर एक एफआईआर हुई। अयोध्या रिविजिटेड किताब के मुताबिक एक दिसंबर 1858 को अवध के थानेदार शीतल दुबे ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि परिसर में चबूतरा बना है।

ये पहला कानूनी दस्तावेज है जिसमें परिसर के अंदर राम के प्रतीक होने के प्रमाण हैं। 1858 में दर्ज हुई एफआईआर के 27 साल बाद 1885 में राम जन्मभूमि के लिए लड़ाई कोर्ट तक पहुंची थी। खबर के मुताबिक, आजादी के बाद पहला मुकदमा हिंदू महासभा के सदस्य गोपाल सिंह विशारद ने 16 जनवरी, 1950 को सिविल जज फैजाबाद की अदालत में दायर किया था।

इस विवाद ने 1980 के दशक के अंत में नया मोड़ उस वक्त ले लिया, जब विश्व हिंदू परिषद (VHP), शिवसेना और बजरंग दल जैसे संगठन अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की मांग को लेकर सक्रिय हो गए। इन संगठनों ने "राम जन्मभूमि" आंदोलन शुरू किया और बाबरी मस्जिद को हटाकर वहां राम मंदिर बनाने की मांग की। आंदोलन को व्यापक समर्थन मिला, खासकर उत्तर भारत में।

6 दिसंबर 1992 को हजारों की संख्या में कारसेवक अयोध्या पहुंचे और बाबरी मस्जिद को ध्वस्त करना शुरू कर दिया। मस्जिद को गिराने के दौरान भारी हिंसा हुई, जिसमें कई लोग घायल हुए और सैकड़ों की संख्या में लोग मारे गए। इस घटना के बाद देशभर में सांप्रदायिक हिंसा की लहर दौड़ी, जिसमें हजारों लोग अपनी जान गंवा बैठे।

खासकर मुंबई और अन्य बड़े शहरों में दंगे भड़क उठे, जो महीनों तक जारी रहे। यह मुद्दा भारतीय राजनीति में दशकों तक छाया रहा। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद, राम मंदिर निर्माण की मांग को लेकर राजनीति और न्यायिक विवाद चलते रहे। 2019 में, सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए भूमि दी जाए।

कोर्ट ने मस्जिद के लिए अयोध्या में ही कहीं अन्य स्थान पर जमीन दी जाए। इस फैसले ने एक तरह से बाबरी मस्जिद विध्वंस के मुद्दे को कानूनी रूप से समाप्त कर दिया, हालांकि समाज में इसके प्रभाव अभी भी महसूस होते हैं। हालांकि, बाबरी मस्जिद गिराए जाने के तीन दशक बाद तीर्थ नगरी के लोग सारी कड़वाहट भूलकर आगे बढ़ गए हैं।

कुछ वक्त पहले तक अयोध्या (फैजाबाद) पुलिस छावनी में तब्दील हो जाता था। लेकिन, अब बाबरी मस्जिद विध्वंस की बरसी की पूर्व संध्या पर अयोध्या पुलिस छावनी और बख्तरबंद किले में तब्दील नहीं होता। हालांकि, जिला प्रशासन एहतियात के तौर पर 6 दिसंबर को अयोध्या में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा देता है। बदलाव का आलम यह है कि अब 6 दिसंबर को न तो 'शौर्य दिवस' मनाया जाएगा और न ही 'काला दिवस'।

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