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Umaria: बांधवगढ़ किले में बाघों की दहाड़ के बीच मनाई गई जन्माष्टमी, 365 दिन में सिर्फ एक बार खुलता है मंदिर

Krishna Janmashtami 2023: बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व क्षेत्र के अंतर्गत यह पूरा मंदिर आता है जहां 8 किलोमीटर दूर पैदल सफर करने के बाद लोग मंदिर तक पहुंच पाते हैं और भगवान का दर्शन करते हैं।

Krishna Janmashtami 2023: मध्य प्रदेश के बांधवगढ़ नेशनल पार्क स्थित किले के कृष्ण मंदिर में श्री कृष्ण जन्माष्टमी धूमधाम से मनाई गई। ऐतिहासिक मंदिर में जन्माष्टमी पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। आस्था के आगे बाघों का खौफ भी छोटा पड़ गया। बाघों के मूवमेंट और दहाड़ के बीच लगभग 7 हजार से ज्यादा श्रद्धालुओं ने यहां पर दर्शन किए।

बांधवगढ़ नेशनल पार्क के ताला गेट से श्रद्धालु सुबह 7 बजे से ही किला स्थित राम जानकी के दर्शन के लिए पहुंच गए थे। बांधवगढ़ स्थित किले में राम जानकी मंदिर मे रीवा रियासत के वंशज व महाराजा मार्तण्ड सिंह जू देव के पोते सिरमौर विधायक दिव्यराज सिंह द्वारा पूजा अर्चना की गई। झमाझम बारिश में भी श्रद्धालुओं की आस्था कम नहीं हुई और 8 किलोमीटर पैदल चलकर मंदिर दर्शन के लिए पहुंचे।

Bandhavgarh Fort Krishna Temple

साल में सिर्फ एक बार कृष्ण जन्माष्टमी के दिन ही ऐसा अवसर आता है जब आम श्रद्धालु यहां तक पहुंच पाते हैं। कृष्ण जन्मोत्सव के अवसर पर यहां भब्य मेले का आयोजन किया जाता है। इस दिन बांधवगढ़ नेशनल पार्क के गेट श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए जाते हैं। श्रद्धालु लगभग 8 किलोमीटर के ट्रैक पैदल पार कर किला स्थित राम जानकी मंदिर दर्शन करने पहुंचते हैं।

बांधवगढ़ किला स्थित राम जानकी मंदिर में हर साल जन्माष्टमी के अवसर पर मेला लगता है। बांधवगढ का किला लगभग दो हजार साल पहले बनाया गया था। जिसका जिक्र शिव पुराण में भी मिलता है।

जानकारी अनुसार इस किले को रीवा के राजा विक्रमादित्य सिंह ने निर्माण कराया था। किले में जाने के लिये मात्र एक ही मार्ग है। जो बांधवगढ नेशनल पार्क के घने जंगलो से होकर गुजरता है। जन्माष्टमी के दिन भगवान कृष्ण का जन्म बांधवगढ किले में पारंपरिक उत्साह और धूमधाम के साथ मनाया जाता है।

जानकारी अनुसार इस किले के नाम के पीछे भी पौराणिक गाथा है। भगवान राम वनवास से लौटने के बाद अपने भाई लक्षमण को यह किला भेंट किया था। इसी लिए इसका नाम बांधवगढ़ मतलब भाई का किला रखा गया है। स्कंध पुराण और शिव संहिता में इस किले का जिक्र मिलता है।

बांधवगढ़ की जन्माष्टमी वर्षों पुरानी है। पहले ये रीवा रियासत की राजधानी थी तभी से यहां जन्माष्टमी का पर्व धूमधूम से मनाया जाता रहा है और आज भी इलाके के लोग उस परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं।

इस ट्रेक पर पहला पडाव शेष शैया है जहां एक छोटा कुंड तालाब है। जो प्राकृतिक खनिज से भरपूर और ठंडा पानी भक्तों की प्यास बुझाने के लिए काफी होता है। यहां उन्हे भगवान विष्णु की लेटी हुई विशाल पत्थर की मूर्ति जिसे शेष सैय्या के नाम से बोला जाता है। साल भर पानी की एक अविरल धारा उनके पैर को स्पर्श करती है और तालाब में एकत्रित होती है। वहां कई विशाल दरवाजे बने हुए हैं। जिनका निर्माण किले की सुरक्षा के लिये किया गया था। इन दरवाजो को पार करने के बाद भक्तगण राम जानकी मंदिर पहुचते है। जहां श्रद्धालु जन्माष्टमी समारोह में वर्षा से भीगते हुये घने जंगलो, वादियों और पहाडो का लुत्फ उठाते हुए पहुंचते हैं।

अधिकारियों के जानकारी अनुसार जिस मार्ग से होकर भक्तगण मंदिर तक पहुंचे हैं। वहां अक्सर एक बाघिन का मूवमेंट रहता है। इसके साथ ही किले के आसपास भी कुछ फुटप्रिंट मिले थे। पार्क प्रबंधन ने सुरक्षा के लिहाज से जगह जगह हाथियों का दल लगा रखा था।

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