ऑस्ट्रेलियाई वैज्ञानिकों ने खोजा सबसे ठंडा सितारा

सिडनी यूनिवर्सिटी के फिजिक्स विभाग से पीचएडी कर रहे कोवी रोज और उनके साथियों ने अब तक का सबसे ठंडा सितारा खोजा है, जो अभी भी रेडिएशन उत्सर्जित कर रहा है. कोवी रोज कहते हैं कि इस खोज से सितारों के विकास को समझने में मदद मिलेगी.
खगोलविदों ने जो नया सितारा खोजा है, वह एक भूरा ड्वॉर्फ स्टार है और इसका व्यास बृहस्पति से करीब दो तिहाई है. अनूठी बात यह है कि यह आज भी रेडिएशन छोड़ रहा है यानी इसकी आंच अभी पूरी तरह बुझी नहीं है.
चूल्हे जितना गर्म
शोध के मुताबिक यह बेहद ठंडा सिकुड़ता सितारा गैसों का एक गोला है जिसका तापमान 425 डिग्री सेंटिग्रेट के आसपास है, जो ठंडे होते एक चूल्हे का तापमान होता है. यह कितना ठंडा है इसका अनुमान सूरज की सतह से लगाया जा सकता है. सूरज एक परमाणु भट्टी है जिसका तापमान लगभग 5,600 डिग्री सेंटिग्रेट है.
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द एस्ट्रोफिजिकल जर्नल लेटर्स में इस शोध के निष्कर्ष प्रकाशित हुए हैं. शोध कहता है कि ऐसा नहीं है कि यह अब तक का मिला सबसे ठंडा सितारा है लेकिन रेडियो एस्ट्रोनॉमी से विश्लेषित यह सबसे ठंडा सितारा है.
मुख्य शोधकर्ता कोवी रोज कहते हैं, "इतने ठंडे ड्वॉर्फ का रेडियोधर्मी विकिरण उत्सर्जित करना दुर्लभ होता है. ऐसा इसलिए है क्योंकि आमतौर पर ऐसे सितारों पर वो मैग्नेटिक फील्ड नहीं होता, जिसे धरती से आंका जा सके. इतने कम तापमान वाले बौने सितारे का रेडियो तरंगें छोड़ना एक अनूठी खोज है."
रोज कहते हैं कि इस खोज से ठंडे होते सितारों के बारे में हमारी समझ बढ़ेगी और हम समझ पाएंगे कि सितारों का विकास कैसे होता है और वे मैग्नेटिक फील्ड कैसे पैदा करते हैं.
कैसे पैदा होती हैं तरंगें
इस बारे में अभी ज्यादा जानकारी हासिल नहीं है कि भूरे बौने सितारे कभी-कभी रेडियो तरंगें कैसे पैदा करते हैं. हालांकि खगोलविद जानते हैं कि सूर्य जैसे बड़े सितारे, जो अपने चरम पर होते हैं, वे मैग्नेटिक फील्ड और रेडियो तरंगें पैदा करते हैं. लेकिन इस बारे में ज्यादा जानकारी हासिल नहीं है कि 10 फीसदी से भी कम ड्वॉर्फ स्टार ही ऐसी तरंगें क्यों पैदा करते हैं.
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माना जाता है कि इन सितारों का तेजी से घूमने की मैग्नेटिक फील्ड के पैदा होने में कोई भूमिका होगी. जब मैग्नेटिक फील्ड सितारे के वातावरण से भिन्न गति से घूमता है तो इससे विद्युतीय तरंगें पैदा हो सकती हैं.
ताजा खोज के मामले में माना गया है कि सितारे के ध्रुवीय क्षेत्र में चुंबकीय प्रभाव की ओर इलेक्ट्रॉन के बहाव के कारण रेडियो तरंगें पैदा हो रही हैं और सितारे की गति के कारण बार-बार रेडियो तरंगें बन रही हैं, जिन्हें पृथ्वी से भी आंका जा सकता है.
भूरे बौने सितारों को यह नाम इसलिए दिया गया है क्योंकि उनमें बहुत कम ऊर्जा या प्रकाश होता है और वे इतने बड़े नहीं होते कि उनमें न्यूकलियर फ्यूजन हो सके, जैसा कि सूर्य में होता है.
रोज बताते हैं, "ये सितारे न्यूकलियर रिएक्शन में हाइड्रोजन जलाने वाले सबसे छोटे सितारों और गैसीय ग्रहों के बीच का वह अंतर है, जिसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है."
Source: DW
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