ऑक्सीजन के लिए छटपटा सकते हैं समुद्री जीव

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नई दिल्ली, 29 अप्रैल। मानवता अगर धरती का तापमान बढ़ाने वाली गैसों के उत्सर्जन पर ब्रेक लगाने में नाकाम हुई तो सन 2300 तक महासागरों से ज्यादातर जिंदगियां उजड़ जाएगी. यह दावा वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी और प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी के शोध में किया गया है. शोध कहता है कि अगर धरती का तापमान दो डिग्री बढ़ा तो यह नतीजा आना तय है.

शोध के लेखक जस्टिन पेन और कर्टिस डॉयच हैं. दोनों वैज्ञानिकों ने समुद्र में रहने वाले कई जीवों का अध्ययन किया. इस दौरान उन्होंने परखा कि कौन सा जीव कितने गर्म समुद्री पानी का सामना कर सकता है. गर्म होते महासागरों में ऑक्सीजन की मात्रा घटती जाती है और यही सबसे बड़ी चिंता है.

वैज्ञानिकों के मुताबिक, अगर मौजूदा इंसानी गतिविधियां इसी तरह से जारी रहीं तो बेहद खतरनाक नतीजे आने तय हैं. पूरी पृथ्वी के महासागरों में ज्यादातर जीव खत्म हो सकते हैं. ऐसा 25 करोड़ साल पहले भी हुआ था, उस कालखंड को वैज्ञानिक भाषा में "ग्रेट डाईंग" भी कहा जाता है. उस वक्त भी पृथ्वी और उसके महासागरों का तापमान बढ़ा था. खारे पानी से लबालब महासागरों के गर्म होने पर पानी में घुली ऑक्सीजन की मात्रा घट गई और अनगिनत प्रजातियां लुप्त हो गईं.

गर्म होते महासागरों में तेजी से काई पनपती है और ऑक्सीजन को सोखने लगती है

भारत समेत कई देश खतरे में

शोध में दावा किया गया है कि गर्म होते महासागरों का सबसे बुरा असर ट्रॉपिकल इलाकों पर पड़ेगा. विषुवत रेखा से ऊपर कर्क व नीचे मकर रेखा तक के इलाके को ट्रॉपिकल या उष्णकटीबंधीय क्षेत्र कहा जाता है. इस इलाके में 80 फीसदी अफ्रीका, आधा भारत, पूरा मध्य अमेरिका, करीब 50 फीसदी दक्षिण अमेरिका, पूरा दक्षिण पूर्वी एशिया और उत्तरी ऑस्ट्रेलिया का कुछ हिस्सा आता है. तापमान यूं ही बढ़ता रहा तो समुद्री जीवों की सबसे ज्यादा प्रजातियां इन्हीं इलाकों में लुप्त होंगी.

2015 के पेरिस जलवायु समझौते के तहत अगर वैश्विक तापमान वृद्धि को औद्योगिक काल की शुरुआत के मुकाबले, दो डिग्री सेल्सियस से ज्यादा नहीं बढ़ने दिया गया तो, समुद्री जीवों के बड़े पैमाने पर लुप्त होने के जोखिम को 70 फीसदी से कम किया जा सकता है. संयुक्त राष्ट्र के जलवायु विशेषज्ञों के मुताबिक भी तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस पर रोकना आदर्श स्थिति होगी.

महासागरो के कई इलाकों में दम तोड़ रही है कोरल रीफ

वैज्ञानिक मैलिन पिस्काई और एलेक्सा फ्रेडसन ने शोध पर अपनी टिप्पणी में कहा है, "जमीन पर जीवों के लुप्त होने के मुकाबले महासागरों में अभी ये खतरा बहुत आगे नहीं बढ़ा है, लिहाजा समाज के पास महासागरों के जीवन को मौका देना का मौका बचा है."

अरब सागर में लगातार बढ़ रहा है मौत का इलाका

टिप्पणी आगे कहती है, "भविष्य में क्या होगा, यह इस बात पर निर्भर है कि समाज आदर्श और बेहद बुरे नतीजों के मद्देनजर कैसे फैसले करता है. यह बात सिर्फ जलवायु परिवर्तन पर ही लागू नहीं होती, बल्कि इसमें प्राकृतिक आवास का उजड़ना, बड़ी मात्रा में मछली पकड़ना और तटीय प्रदूषण जैसे मुद्दे भी शामिल हैं."

वर्ल्ड रजिस्टर ऑफ मरीन स्पिसीज के मुताबिक दुनिया भर के महासागरों में अब तक 2,40,000 प्रजातियों का पता चला है. वैज्ञानिकों के मुताबिक महासागरों में मौजूद बाकी 91 फीसदी प्रजातियों के बारे में इंसान को अब भी कोई जानकारी नहीं है.

पानी के बढ़ते ताप से खराब होता ग्रेट बैरियर रीफ का सिस्टम

कितना गर्म हो चुका है धरती का वातावरण

पृथ्वी का 71 फीसदी हिस्सा महासागरों से ढका है. बाकी के 29 फीसदी हिस्से पर जमीन है. वैज्ञानिक रिकॉर्डों को देखें तो पता चलता है कि सन 1900 से 1980 तक महासागरों का सतही तापमान सिर्फ दो बार शून्य और प्लस एक डिग्री सेल्सियस के बीच पहुंचा. लेकिन 1980 के बाद से यह तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है. बेहद ठंडे पानी से लबालब महासागर आज तकरीबन एक डिग्री सेल्सियस गर्म हो चुके हैं. समंदरों की यह गर्मी पूरी धरती की जलवायु को भी प्रभावित कर रही है.

1880 से 1980 तक हर दशक में पृथ्वी का तापमान 0.08 डिग्री सेल्सियस बढ़ता गया. लेकिन 1981 के बाद यह वृद्धि दोगुने से भी ज्यादा होकर 0.32 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक हो गई. इस गणना के आधार पर वैज्ञानिकों को दावा है कि बीते 142 साल में धरती का तापमान 1.1 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है.

ओएसजे/एनआर (एएफपी)

Source: DW

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