Munich Olympic: ढूंढ ढूंढकर आतंकियों को उतारा मौत के घाट! मोसाद ने इस तरह लिया एथलीटों की हत्या का बदला
Munich 1972 Olympics: सुबह करीब 4 बजे के बाद एक ऐसा हमला शुरू हुआ जिसने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया था। ट्रैकसूट पहने आठ लोग म्यूनिख के ओलंपिक विलेज में घुस आए, जोकि अपने साथ बैग में राइफलें और ग्रेनेड लेकर आए थे। साल 1972 म्यूनिख ओलंपिक खेलों में हुए नरसंहार को शायद ही कोई कभी भूल पाएगा। इस हमले का बदला लेने के लिए मोसाद ने तब तक ऑपरेशन चलाया जब तक कि मास्टरमाइंड को मौत के घाट नहीं उतार दिया।
कैदियों की रिहाई करना था उद्देश्य
म्यूनिख ओलंपिक में जिन आतंकियों ने हमला किया वे ब्लैक सितंबर नामक संगठन के सदस्य थे- जो फिलिस्तीन मुक्ति संगठन से जुड़ा हुआ था। उनका मिशन इजरायली एथलीटों को बंधक बनाना और 236 कैदियों की रिहाई की मांग करना था।

हमले में इजरायल ओलंपिक टीम के 11 सदस्य मारे गए थे
नरसंहार ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया हालांकि, उनका ये मिशन सफल नहीं हो सका, रिपोर्ट्स के मुताबिक, हमले के शुरू होने के लगभग 20 घंटे बाद, बंधक बनाने वालों में से पांच की मौत हो गई, साथ ही इजरायल की ओलंपिक टीम के 11 सदस्य और एक पश्चिम जर्मन पुलिसकर्मी भी मारे गए। इस हमले ने खेल जगत की आंखें खोल दीं, और 5 से 6 सितम्बर, 1972 के म्यूनिख नरसंहार के अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दीर्घकालिक परिणाम हुए।
मोसाद ने संभाली बदला लेने की जिम्मेदारी
इस आतंकी हमले का बदला लेने की जिम्मेदारी इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने संभाली, और एजेंसी ने करीब-करीब दो दशक तक एक-एक आतंकवादी को ढूंढ ढूंढकर मारा। इस ऑपरेशन को 'रैथ ऑफ गॉड' (Operation Wrath of God) के नाम से चलाया गया।
ऑपरेशन के दौरान मोसाद से हो गई गलती
अपने एथलीटों की मौत का बदला ले रहे मोसाद एजेंट्स से तब एक बड़ी गलती हो गई, जब उन्होंने एक इनपुट पर यकीन करते हुए मोरक्को के एक वेटर को मार दिया, जिसका इस घटना से कोई संबंध नहीं था। मोसाद को इनपुट मिला था कि हमले का मास्टरमाइंड अली हसन सलामे नॉर्वे के लिलेहैमर में रह रहा है, लेकिन इनपुट गलत निकला और एक वेटर मारा गया।
नॉर्वे पुलिस ने मोसाद के छह एजेंट्स को किया गिरफ्तार
इस घटना के बाद नॉर्वे पुलिस ने मोसाद के छह एजेंट्स को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद इजरायल पर अंतरराष्ट्रीय दबाव पड़ा और कुछ समय के लिए ऑपरेशन को रोक दिया गया, क्योंकि इस घटना ने गुप्त अभियानों में शामिल जोखिमों और जटिलताओं को उजागर किया। गलत पहचान के कारण न केवल एक निर्दोष व्यक्ति की मौत हुई, बल्कि इजरायल और नॉर्वे के बीच महत्वपूर्ण कूटनीतिक तनाव भी पैदा हुआ।
मास्टरमाइंड तक पहुंचने में लग गए पांच साल
इस सब चीजों के बाद भी इजरायल ने बदले की प्लानिंग करना बंद नहीं किया था, और करीब पांच साल पर म्यूनिख हत्याकांड के मास्टरमाइंड तक पहुंच गए, जोकि 'रेड प्रिंस' के नाम से मशहूर था, जिसका असली नाम अली हसन सलामे था।
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मास्टरमाइंड की गली में लिया कमरा
अब टारगेट सेट था, मास्टरमाइंड को मौत के घाट उतराने के लिए एरिका मैरी चैम्बर्स नाम की मोसाद एजेंट को चुना गया। एरिका ने उस गली में रेंट पर कमरा लिया जिससे होकर सलामे का आना-जाना था। कुछ समय बीता और मोसाद के दो और एजेंट्स बेरूत पहुंच गए।
इस तरह किया मास्टरमाइंड का अंत
अब बारी थी घटना को अंजाम देने की, जिसकी पूरी तैयारी हो चुकी थी। तीनों एजेंट्स ने प्लानिंग के तहत गली में एक विस्फोटक से भरी कार खड़ी कर थी। 22 जनवरी, 1979 को जब सलामे और उसके बॉडीगार्ड्स कार में गली के भीतर दाखिल हुए तो विस्फोटकों वाली गाड़ी को मोसाद ने रेडियो डिवाइस से उड़ा दिया, और इस तरह मोसाद ने म्यूनिख के मास्टरमाइंड का अंत कर दिया।












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