95 साल की भगवानी देवी ने फिर रोशन किया देश का नाम, पोलैंड में जीते तीन गोल्ड मेडल, क्या है इनकी कहानी
Bhagwani Devi Dagar ने 100 मीटर की प्रतियोगिता 24.74 सेकेंड में पूरी की हुई है। वे केवल साल की उम्र में विधवा हो गईं थीं। उन्हें कंपटीशन के समय मरने का भी डर नहीं। वे देश के लिए मेडल जीतने की धुन पर सवार हैं।

भारत की 95 साल की धाविका भगवानी सिंह डागर (Bhagwani Devi Dagar) एक ऐसा नाम हैं जो रनिंग, शॉट पुट, डिस्कस थ्रो जैसे खेलों की दुनिया में देश के लिए वो कर रहा है जो 20-30 के उम्र में एथलीट भी कई बार नहीं कर पाते। ये काम है वर्ल्ड चैम्पियनशिप लेवल की प्रतियोगिता में देश के लिए गोल्ड मेडल लेकर आना, वो भी एक नहीं बल्कि तीन और ये उपलब्धि हासिल करने के लिए उनकी उम्र है 95 साल! ये अपने आप में अजूब भरी बात है जो भगवानी का नाम देश में बहुत ऊंचा कर देती है।
भगवानी ने पोलैंड में 9वीं वर्ल्ड मास्टर्स एथलेटिक इंडोर चैम्पियनशिप 2023 में तीन गोल्ड हासिल किए। उन्होंने 60 मीटर रनिंग, शॉटपुट और डिस्कस थ्रो में ये मेडल हासिल किए।
'स्प्रिंटर दादी'
वे वर्ल्ड मास्टर्स एथलेटिक चैम्पियनशिप फिनलैंड 2022 में भी 90-94 उम्र की कैटेगरी में भारत के लिए गोल्ड हासिल कर चुकी हैं। इस उम्र में कंपटीशन का मतलब है कभी भी कोई दुर्घटना होना। आपका दिल कभी भी जवाब दे सकता है या जोड़ उतर सकते हैं, टूट सकते हैं या फेफड़े जवाब दे सकते हैं। इस पर भगवानी देवी ने कहा था कि वे उम्र के उस पड़ाव पर हैं जहां मौत का उनको डर नहीं है। इसलिए विदेशों में मेडल जीतने के दौरान अगर उनको कुछ हो जाता है तो उन्हें वापस भारत लाया जाए लेकिन वे प्रतियोगिता में भाग लेना नहीं छोड़ेंगी और देश के लिए मेडल जीतेंगी।
30 साल की उम्र में हो गईं थीं विधवा
हरियाणा के खेड़का गांव में जन्मी भगवानी देवी की शादी 12 साल की उम्र में ही हो गई थी और 30 साल की उम्र में उनके पति नहीं रहे। उन्होंने दूसरी शादी करने के बजाय अपना सारा फोकस अपनी छोटी बेटी पर लगा दिया। उस समय वह एक और बच्चे के साथ गर्भवती थीं। वक्त के सितम ने चार साल बाद उनकी बेटी को उनसे छीन लिया जिससे उनका बच्चा बेटा उनकी एकमात्र संतान के रूप में रह गया।
भगवानी देवी ने खुद और अपने बेटे को पालने के लिए खेत में लंबे समय तक काम किया। उनकी लगातार मेहनत रंग लाई और भगवानी देवी के बेटे को दिल्ली नगर निगम में क्लर्क की नौकरी मिल गई, जिससे परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ। जल्द ही, भगवानी देवी को दो पोते और एक पोती हुई।
पोते विकास डागर ने पहचानी दादी की प्रतिभा
उनके पोती-पोतों में सबसे बड़े, विकास डागर की खेलों में खास रुचि थी। उन्होंने एशियाई खेलों सहित कई प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व किया। राजीव गांधी खेल रत्न अवॉर्ड हासिल कर चुके विकास के नाम पैरा एथलीट के रूप में कई रिकॉर्ड हैं। विकास ने ही दादी की क्षमताओं को पहचाना। भगवानी बचपन में अपनी सहेलियों के साथ बहुत कबड्डी भी खेलती थीं। वे आज भी फिट हैं लेकिन विकास के अनुसार एकमात्र चिंता उनका दिल है जिसकी बाइपास सर्जरी 2007 में हुई है।
विकास ने बताया कि ऐसे ही खेल-खेल में उन्होंने अपनी दादी की खेल क्षमताओं को पहचान लिया था जिसकी शुरुआत शॉट पुट से हुई थी। पिछले साल फिनलैंड जाने से पहले ही भगवानी देवी 6 गोल्ड जीत चुकी हैं। पहली बार दिल्ली और फिर चेन्नई में खिताब जीता। विकास इस समय दादी के कोच की भूमिका भी निभा रहे हैं।












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