जिम्बाब्वे को हल्के में मत लीजिए ! हरा चुका है भारत और पाकिस्तान को

क्रिकेट का छुपा रुस्तम है जिम्बाब्वे। वह भारत और पाकिस्तान जैसी मजबूत टीमों को हरा चुका है। हाल ही में उसने बांग्लादेश को हराया है। इसलिए टीम इंडिया को मौजूदा दौरे पर संभल कर खेलना होगा।

नई दिल्ली, 17 अगस्त: क्रिकेट का छुपा रुस्तम है जिम्बाब्वे। वह भारत और पाकिस्तान जैसी मजबूत टीमों को हरा चुका है। हाल ही में उसने बांग्लादेश को हराया है। इसलिए टीम इंडिया को मौजूदा दौरे पर संभल कर खेलना होगा। अगर जिम्बाब्वे राजनीति अराजकता और गृहयुद्ध की विभीषिका में न फंसा होता तो वह दक्षिण अफ्रीका की तरह क्रिकेट की एक बड़ी शक्ति होता। लेकिन राजनीतिक उथल पुथल ने इस देश के क्रिकेट को बहुत नुकसान पहुंचाया। इसके बावजूद नैसर्गिक गुणों के कारण यहां कई प्रतिभाशाली खिलाड़ी हुए। अफ्रीकी देश जिम्बाब्वे पहले रोडेशिया के नाम से जाना जाता था। यह ब्रिटेन का एक उपनिवेश था। दक्षिण अफ्रीका इसका पड़ोसी देश है। अंग्रेजी शासन के दौरान ही यहां क्रिकेट की नींव पड़ी।

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    राजनीतिक अराजकता

    राजनीतिक अराजकता

    जिम्बाब्वे में अंग्रेजों की संख्या कम थी लेकिन वे बहुसंख्यक काले समुदाय पर हुकूमत कर रहे थे। 1980 में जिम्बाब्वे अंग्रेजों की दासता से मुक्त हो कर एक आजाद देश बना। अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र लड़ाई लड़ने वाले रोबर्ट मुगाबे ने सत्ता संभाली। जब मुगाबे सरकार ने अंग्रेजों से जमीन छीन कर काले लोगों में बांटना शुरू किया तो देश में अशांति फैल गयी। रॉबर्ट मुगाबे काले समुदाय की उन्नति के नाम पर सत्ता में आये थे लेकिन वे कुछ समय बाद निरंकुश बन गये। 2003 से लेकर 2017 तक गृहयुद्ध की स्थिति रही। 2017 में सेना ने रॉबर्ट मुगाबे का तख्ता पलट कर दिया। मुगावे पर हजारों लोगों को मारने का आरोप लगा था। इसकी वजह से अमेरिका समेत पश्चिमी देशों ने जिम्बाब्वे पर कई प्रतिबंध लगा दिये।

    क्रिकेट को नुकसान

    क्रिकेट को नुकसान

    प्रतिबंधों और अस्थिरता की वजह से यहां क्रिकेट का ढांचा चरमरा गया। 1997 से 2002 तक यहां क्रिकेट का स्वर्णकाल था। लेकिन 2003 के बाद से जिम्बाब्वे क्रिकेट का पतन शुरू हो गया। क्रिकेट में भी काले-गोरे का मतभेद शुरू हो गया। क्रिकेट में राजनीतिक का दखलंदाजी होने लगी। टीम चयन में सरकार हस्तक्षेप करने लगी। नतीजतन बार-बार क्रिकेट खिलाड़ी विद्रोह करने लगे। देश की आर्थिक हालत खराब थी। क्रिकेट खिलाड़ियों को देने के लिए पैसा नहीं था। 2006 में जिम्बाब्वे क्रिकेट प्रबंधन ने देश की टेस्ट मान्यता को निलंबित कर दिया। वह सीमित ओवरों का मैच खेलता रहा। छह साल बाद अगस्त 2011 में जिम्बाब्वे की टेस्ट मान्यता फिर बहाल हुई। 2022 तक जिम्बाब्वे क्रिकेट ने बहुत उतार चढ़ाव देखे। इसलिए प्रदर्शन में निरंतरता नहीं रही। लेकिन बीच-बीच में वह मजबूत देशों को भी हराता रहा। जिम्बाब्वे ने अपना पहला टेस्ट मैच भारत के खिलाफ 1992 में खेला था जो ड्रा रहा था।

    जिम्बाब्वे का ऐतिहासिक प्रदर्शन

    जिम्बाब्वे का ऐतिहासिक प्रदर्शन

    1995 में पाकिस्तान की टीम जिम्बाब्वे के दौर पर गयी थी। तब जिम्बाब्वे को टेस्ट मान्यता मिले हुए सिर्फ तीन साल ही हुए थे। पाकिस्तान के कप्तान सलीम मलिक थे। टीम में आमिर सेहौल, सईद अनवर, इंजामुमल हक, राशिद लतीफ, वसीम अकरम, आकिब जावेद जैसे दिग्गज शामिल थे। उस समय जिम्बाब्वे के कप्तान एंडी फ्लावर थे। तब उन्हें विश्व का सर्वश्रेष्ठ विकेटकीपर बल्लेबाज माना जाता था। उनके भाई ग्रांट फ्लावर भी विश्वस्तरीय बल्लेबाज थे। पूर्व कप्तान डेव हॉटन भी धांसू बल्लेबाज थे। हीथ स्ट्रीक और हेनरी ओलेंगा जैसे प्रमुख तेज गेंदबाज थे। जिम्बाब्वे ने पहले बैटिंग की। ग्रांट फ्लावर ने पाकिस्तान की मजबूत गेंदबाजी को बेअसर करते हुए नाबाद 201 रन बनाये। उनके भाई एंडी फ्लावर ने भी शतक (156) ठोका था। तीसरा शतक गॉय विट्टल (113 नाबाद) ने लगाया था। जिम्बाब्वे ने चार विकेट पर 544 रन कर पारी समाप्ति की घोषणा कर दी।

    पाकिस्तान की शर्मनाक हार

    पाकिस्तान की शर्मनाक हार

    जब पाकिस्तान की टीम बैटिंग के लिए मैदान पर उतरी तो वह इस नवोदित देश की गेंदबाजी के सामने लड़खड़ा गयी। उसकी पहली पारी 322 पर खत्म हुई। इंजामुमल हक ने सबसे अधिक 71 रन बनाये। हीथ स्ट्रीक ने छह विकेट लिये। पाकिस्तान को फॉलऑन खेलना पड़ा। उसकी दूसरी पारी और खराब रही। पूरी टीम सिर्फ 158 रनों पर आउट हो गयी। इंजमाम ने एक बार फिर सबसे अधिक 65 रन बनाये। डेविड ब्रेन, हीथ स्ट्रीक और गॉय विट्टल ने 3-3 विकेट लिये। पॉल स्ट्रैंग को एक विकेट मिला। इस तरह पाकिस्तान यह टेस्ट मैच एक पारी और 64 रनों से हार गया।

    जब जिम्बाब्वे के सामने भारत लड़खड़ाया

    जब जिम्बाब्वे के सामने भारत लड़खड़ाया

    1983 के विश्वकप में भारत कपिलदेव के यादगार प्रदर्शन के कारण तो जिम्बाब्वे के खिलाफ हार से बच गया था लेकिन 1999 में उसे हार झेलनी ही पड़ी। 1983 की तरह 1999 का विश्वकप क्रिकेट भी इंग्लैंड में खेला गया था। लिसेस्टर में भारत और जिम्बाब्वे के बीच मैच हुआ। एलिस्टर कैंपबेल जिम्बाब्वे के कप्तान थे। इस मैच में भी एंडी फ्लावर और उनके भाई ग्रांट फ्लावर का जादू चला। ग्रांट के 45 और एंडी के 68 रनों की बदौलत जिम्बाब्वे ने 50 ओवर में 252 रनों का स्कोर खड़ा किया। भारत को शुरुआत में झटका लगा। सौरव गांगुली 9 रनों पर नील जॉनसन का शिकार बने। द्रविड़ को हीथ स्ट्रीक ने 13 रनों पर आउट कर दिया। स्ट्रीक ने कप्तान अजहरुद्दीन को भी 7 रनों पर चलता कर भारत के खेमे में खलबली मचा दी।

    गिरते रहे भारत के विकेट

    गिरते रहे भारत के विकेट

    56 रन पर तीन विकेट गिर चुके थे। ऐसे हालात में ही कपिलदेव ने 1983 में 175 रनों की नाबाद पारी खेली थी। लेकिन 1999 में कपिल सरीखा कोई नहीं था। भारत के रन तेजी से तो बन रहे थे लेकिन विकेट धड़धड़ गिरते जा रहे थे। 44वां ओवर खत्म हुआ तो भारत का स्कोर था 7 विकेट के नुकसान पर 244 रन। भारत को और दो ओवर खेलने थे जिसमें जीत के लिए सिर्फ 9 रन चाहिए थे। क्रीज पर रॉबिन सिंह (33) और जवागल श्रीनाथ (16) थे। 45 वां ओवर हेनरी ओलेंगा फेंकने आये। ओलेंगा को उस समय दुनिया का बेहतरीन तेज गेंदबाज माना जाता था।

    जब ओलेंगा ने अकेले दम पर भारत को हराया

    जब ओलेंगा ने अकेले दम पर भारत को हराया

    45 वें ओवर की पहली गेंद पर रॉबिन सिंह ने 2 रन लिये। अब जीत के लिए 11 गेंद में 7 रन चाहिए थे। अगली गेंद पर ओलेंगा ने कमाल कर दिया। रॉबिन सिंह 35 के स्कोर पर कैच आउट हो गये। उनकी जगह अनिल कुंबले खेलने आये। तीसरी गेंद पर कुंबले ने एक रन लिया। चौथी गेंद पर श्रीनाथ ने दो रन लिये। अब जीत के लिए चार रन चाहिए था। पांचवीं गेंद पर ओलेंगा ने श्रीनाथ को बोल्ड कर भारत की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। अब 7 गेंदों पर जीत के लिए चार रन चाहिए थे लेकिन चिंता की बात ये थी कि विकेट केवल एक ही बचा था। जिसका डर था वहीं बात हुई। हेनरी ओलेंगा ने अंतिम गेंद वैंकटेश प्रसाद को फेंकी और वे एलबीडब्ल्यू करार दिये गये। इस तरह ओलेंगा ने इस ओवर में तीन विकेट लेकर भारत के जबड़े से जीत छीन ली। करीबी मुकाबले में भारत 3 रनों से यह मैच हार गया था।

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