IND vs AUS: काश, किसी ने पुजारा की तरह सब्र से बैटिंग की होती !
इंदौर टेस्ट मैच में ऑस्ट्रेलिया की जीत में स्पिनरों की बड़ी भूमिका रही लेकिन उनके सामने भारतीय टीम से चेतेश्वर पुजारा ने परेशानी में डाला।

IND vs AUS 3rd Test: भारत और ऑस्ट्रलिया के बीच अभी तक तीन टेस्ट मैच खेले गये हैं। तीनों मैचों के नतीजे जरूर निकले लेकिन ये सभी करीब ढाई दिनों में ही खतम हो गये। एक भी टेस्ट चार या पांच दिन नहीं चल पाया। टेस्ट मैच का हुलिया अब पूरी तरह बदल गया। पहले बल्लेबाजों का बोलबाला था। गेंदबाजों को अपनी कला से विकेट लेनी होती थी। कभी-कभी बल्लेबाज ऐसे जम जाते थे कि किसी गेंदबाज को पूरे दिन बॉलिंग के बाद तीन या चार विकेट मिलते थे। लेकिन अब तो गेंदबाज आते ही कमाल कर रहे हैं। इंदौर टेस्ट की बात ले लीजिए। उमेश यादव ने केवल 5 ओवर गेंदबाजी की और 12 रन देकर तीन विकेट झटक लिये। स्पिन गेंदबाजों ने उमेश के लिए ऐसा प्लेटफॉर्म सेट कर दिया था जिस पर उन्हें आसानी स्विंग का जादू दिखाने का मौका मिल गया।
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गेंदबाजों के अनुकूल हो रहा टेस्ट मैच
अब टेस्ट मैच गेंदबाजों के अनुकूल हो गया। अब पिच गेंदबाजों के अनुरूप होती जिस पर वे आसानी से विकेट निकाल लेते हैं। जब कि बल्लेबाजों को रन बनान के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता है। लेकिन बल्लेबाजों की असली परीक्षा ऐसे ही पिचों पर होती है। यहां खेलने के बाद ही पता चलता है कि उनकी तकनीक कितनी अच्छी है और वे कितने धैर्यवान हैं। जब कप्तान रोहित शर्मा ने इंदौर में टॉस जीत कर पहले बल्लेबाजी चुनी तो अपने फैसले के अनुरूप खेलना चाहिए था। आम तौर पर किसी भी टेस्ट में जब सलामी बल्लेबाज पारी की शुरुआत करते हैं तो पहला सेशन संभल कर खेलते हैं। अंपायर और स्टीव स्मिथ की गलती से रोहित पहले ओवर में आउट होने से बच गये थे। ये उनके लिए वार्निंग थी। तब भी वे संभल कर नहीं खेले।
रोहित छठे ओवर में ही बड़े हिट के लिए क्यों गये ?
रोहित को एक-दो रन से स्कोर आगे बढ़ाना चाहिए था। उन्होंने बिना कोई सिंगल लिये 12 रन बनाये थे और इसके लिए 3 चौके लगाये थे। छठा ओवर ही चल रहा था कि रोहित कुहनेमन पर बड़ा हिट मारने के लिए क्रीज से निकल पड़े। इस शॉट को खेलने की कोई जरूरत नहीं थी। ये कोई टी-20 मैच नहीं था कि पावर प्ले में रन गति बढ़ाने के लिए जोखिम उठाना जरूरी था। क्रीज से बाहर निकले रोहित गेंद खेलने से चूके और स्टंप आउट हो गये। इसका खामियाजा भारत को भुगतना पड़ा। रोहित जैसे बड़े बैटर के आउट होने से भारत दबाव में आ गया।
अगर एक बल्लेबाज भी पुजारा जैसा खेलता तो...
टेस्ट मैच में सब्र के साथ बैटिंग की जाती है। रन बनाने के लिए कमजोर गेंद का इंतजार करना पड़ता है। जैसा कि चेतेश्वर पुजारा ने दूसरी पारी में कर दिखाया। उन्होंने क्रीज पर समय बिताया। 59 रन बनाने के लिए 142 गेंदें खेलीं। उन्होंने स्पिन गेंदबाजी का बखूबी सामना किया। अगर किसी अन्य बल्लेबाज ने पुजारा की तरह बल्लेबाजी की होती तो मैच का नतीजा कुछ और होता। विराट कोहली (7) के सस्ते में निबट जाने से भारत की उम्मीदों पर पानी फिर गया। श्रेयस अय्यर काउंटर अटैक कर रहे थे। भारतीय आशा की लौ फिर टिमटिमाने लगी। पुजारा और अय्यर के बीच 35 रनों की साझेदारी हो चुकी थी। लेकिन इसी निर्णायक पल में अय्यर गलत शॉट खेल कर अपना विकेट गंवा बैठे। उन्हें स्टार्क को पुल करने की जरूरत नहीं थी। रोहित की तरह अय्यर भी अपनी गलती से आउट हुए। जाहिर है भारतीय बल्लेबाजों ने टेस्ट मैच के अनुरूप बल्लेबाजी नहीं की। टेस्ट मैच के पहले दिन, पहले सेशन में अगर कोई टीम 7 विकेट गंवा दे तो आप क्या कहेंगे ?
रन बनाने वाले विकेटकीपर की जरूरत
जब विकेट लगातार गिर रहे हों तब नम्बर 6 के बल्लेबाज की भूमिका बहुत अहम हो जाता है। इस नम्बर पर खेल रहे एस. भरत ने तीनों ही टेस्ट मैचों में बहुत निराश किया। वे बल्ले से बिल्कुल योगदान नहीं दे पाये। इंदौर टेस्ट की दूसरी पारी में जब भारत को रनों की सख्त जरूरत थी तब वे केवल 3 रन बना पाये। ऐसे में ऋषभ पंत की कमी बहुत खलती हैं। विकट परिस्थियों के बीच उनका टेस्ट रिकॉर्ड बहुत शानदार है। कई बार ऐसा हुआ कि टेस्ट मैच में भारत का टॉप ऑर्डर फेल हो गया और पंत ने रन बना कर टीम को जीत दिला दी। ऐसे में रन बनाने वाले विकेटकीपर को टीम में जगह देनी होगी। जब टीम में ईशान किशन शामिल हैं तो उनके विकल्प पर भी गौर करना चाहिए।
ऐसे बदल गया परिदृश्य
भारत 109 के स्कोर का बचाव कर सकता था। लेकिन रवीन्द्र जडेजा की गलती के कारण ऐसा नहीं हुआ। वे मैच विनर खिलाड़ी जरूर हैं लेकिन उनके नोबॉल से मैच भारत की गिरफ्त से निकल गया। तीसरे ओवर की समाप्ति पर ऑस्ट्रेलिया का स्कोर था एक विकेट के नुकसान पर 14 रन। भारतीय स्पिनरों ने दबाव बना दिया था। रवीन्द्र जडेजा चौथा ओवर डाल रहे थे। उन्होंने पहली गेंद ऑफ स्टंप के बाहर शॉर्ट ऑफ लेंथ गेंद डाली। लाबुशेन उसे कट करने गये लेकिन गेंद बल्ले का अंदरुनी किनारा लेकर विकट में समा गयी। 14 रन पर ऑस्ट्रेलिया का दूसरा विकेट गया था। लेकिन ये नोबॉल निकली। लाबुशेन ने इस जीवनदान का फायदा उठाया। उन्होंने ख्वाज ने मिल कर दूसरे विकेट के लिए 96 रन जोड़ दिये। जो स्कोर 14 पर 2 होना चाहिए वह हो गया 108 रन पर 2 विकेट। इसके बाद ऑस्ट्रेलिया को 88 रनों की बढ़त मिल गयी।
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गेंद बदलने का फैसला ऑस्ट्रेलिया के हक में
इसके अलावा एक और बात हुई जिससे मैच ऑस्ट्रेलिया के पक्ष में चला गया। तीसरे दिन जब ऑस्ट्रेलिया 76 रनों के लक्ष्य के लिए मैदान पर उतरा तो उसका पहला विकेट 0 पर ही गिर गया। पारी की दूसरी गेंद पर ख्वाजा को अश्विन ने आउट कर दिया। इसके बाद भारतीय गेंदबाजों ने मैच पर दबाव बना दिया। कंगारू 10 ओवर में सिर्फ 13 रन बना पाये थे। तभी 11वें ओवर में गेंद बदलने की नौबत आ गयी। गेंद बदली गयी लेकिन अश्विन उससे खुश नहीं थे। देखने में वह दस ओवर से ज्यादा पुरानी लग रही थी। बदली हुई गेंद को न पहले की तरह स्पिन मिल रही थी और न ही उसे बाउंस मिल रहा था। फिर तो ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाजों ने इस स्थिति को अपने हक में भुना लिया। उन्होंने अगले 8.5 ओवर में 65 रन कूट दिये और मैच आसानी से जीत लिया। अगर गेंद बदली नहीं गयी होती तो ये 75 रन भी भारी पड़ सकते थे।












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