Satna News : चित्रकूट में लगता है गधों का ऐतिहासिक Mela ,औरंगजेब ने यहीं से खरीदे थे खच्चर
Chitrakoot Gadha Mela : आप सब ने बचपन में मेले तो बहुत देखे सुने होंगे और घूमा भी होगा, मगर क्या आपने कभी गधों का मेला देखा है। जी हां, भले ही आप इस मेले के बारे में पहली बार सुन रहे हैं, लेकिन भारत का इकलौता गधों का मेला मध्य प्रदेश जिले के सतना की धार्मिक नगरी चित्रकूट में वर्षों से यह ऐतिहासिक मेला लगता आ रहा है। अलग-अलग प्रदेशों से व्यापारी खच्चर-गधे लेकर चित्रकूट पहुंचते हैं। यहां खच्चरों-गधों की बोली-बोली जाती है है। यहां खरीदारों के साथ-साथ मेला घूमने वालों की भी भारी भीड़ भाड़ रहती है।

औरंगजेब मेले की थी शुरुआत
बताते चलें कि इस मेले की शुरुआत मुगल बादशाह औरंगजेब ने करवाई थी। तब से लेकर आज तक मेला लगातार लगता आ रहा है। यह मेला तीन दिन तक लगता है। लोगों का दावा है की मुगल शासक औरंगजेब की सेना में जब रसद और असलहा ढोने वालो में कमी हो गई तो पूरे क्षेत्र से खच्चरों-गधों के मालिकों को इसी मैदान में एकत्र कर उनके गधे खरीदे गए थे। तभी से प्रारंभ हुआ व्यापार का यह सिलसिला हर वर्ष लगता चला आ रहा है।

इकलौता अनोखा मेला
देश का इकलौता अनोखा मेला को केवल देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं, दीपावली के दूसरे दिन से चित्रकूट के पवन पवित्र मंदाकिनी नदी के तट पर तीन दिवसीय मेला आयोजित होता है, मेले में काफी दूर-दूर से लोग अपने खच्चर - गधे लेकर आते हैं और खरीद बिक्री करते हैं। वहीं, तीन दिन के मेले में लाखों का कारोबार किया जाता है।

व्यापारियों के लिए सुविधाओं का अभाव
गधा व्यापारी महेश प्रसाद और जगदीश्वर ने बताया कि करोडों रुपयों के लेनदेन के बावजूद इस मेले में सुरक्षा के कोई इंतजाम न होने से व्यापारी काफी चिंतित और परेशानियों का सामना करना पड़ता है। दूर-दूर से आने वाले गधे व्यापारियों के लिए प्रशासन की ओर से कोई सुविधा भी उपलब्ध नहीं कराई गई।
चित्रकूट में लगने वाला यह गधा मेला जहां गधे का व्यापार करने वालों के लिए कमाई करने का अवसर ले कर आता है वहीं विभिन्न जगह से आए गधों को भी एक- दूसरे से मिलने मिलाने का भी अवसर देता है। यहां गधे भी आपस में अपनी बिरादरी का दुःख दर्द बांटते नजर आते हैं। व्यापारियों का कहना था कि इस बार विगत कई सालों के बाद अच्छा बिजनेस हुआ है।

बरसों पुरानी विरासत
यहां गधे- खच्चर खरीददारों के अलावा इनको देखने वालों की भीड़ उमड़ती है. आज के टेक्नोलॉजी के दौर पर लोग आधुनिकता की ओर बढ़ते चले जा रहे हैं, लेकिन आज भी सालों पुरानी है परंपरा चित्रकूट में बखूबी चली आ रही है। इस मेले में गधे और खच्चरों की कीमत हजारों करोड़ों रुपए तक बोली जाती है, हालांकि मुगल काल से प्रारंभ हुआ यह मेला अब सुविधाओं के अभाव में कम होता जा रहा है, लेकिन इस विरासत को संजों कर रखने वाले आज भी मेले का आयोजन करते आ रहे हैं।












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