राजस्थान के IAS विश्राम मीणा छुट्टी के दिन भी आते हैं ऑफिस, 30 साल से नहीं लिया वीकली ऑफ

बाड़मेर। आमतौर पर हर सरकारी व निजी कार्यालय रविवार के अवकाश के दिन आपको बंद नजर आएंगे और अधिकारी भी वीकेंड के दिन अपने निजी कार्यों या परिवार को समय देते हैं, लेकिन इन सब के बीच आज हम आपको एक ऐसे अधिकारी की कहानी बताने जा रहे हैं, जिन्होंने प्रदेश में कोरोना की एंट्री होते ही पश्चिमी राजस्थान के बाड़मेर जिला कलेक्टर के रूप में पदभार संभाला और उसके बाद से 1 दिन की भी छुट्टी नहीं करते हुए आमजन की समस्याओं के निराकरण करने के लिए तत्पर रहे हैं।

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    मार्च में बने बाड़मेर जिला कलेक्टर

    मार्च में बने बाड़मेर जिला कलेक्टर

    हम बात आईएएस अधिकारी विश्राम मीणा की, जिन्होंने मार्च 2020 के अंतिम सप्ताह में बाड़मेर जिले में कलेक्टर के रूप में पदभार ग्रहण किया और उसी वक्त कोरोना का प्रवेश प्रदेश में हुआ था। कोरोना को लेकर आमजन को जागरूक करना, सरकारों द्वारा जारी गाइडलाइन की पालना करवाना, समय समय पर चिकित्सा अधिकारियों से बैठक कर चिकित्सा व्यवस्थाओं को सुदृढ़ करवाना, जनप्रतिनिधियों,आमजन एवं मीडिया से तालमेल बनाकर लगातार आमजन के लिए अवकाश के दिन भी अपनी सेवाएं देते नजर आ रहे हैं।

     रविवार शनिवार को भी कार्यालय में मिलते हैं

    रविवार शनिवार को भी कार्यालय में मिलते हैं

    साथ ही जिले के अन्य मुद्दों एवं सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं कि क्रियान्वित को लेकर लगातार प्रशासनिक अधिकारियों एवं पुलिस अधिकारियों के साथ सामंजस्य बनाकर काम कर रहे हैं। उनकी खास बात यह है कि वे शनिवार और रविवार के अवकाश के दिन भी सुबह 9:00 से लगाकर शाम को 7:00 बजे तक अपने कार्यालय में रहते हैं। बाड़मेर जिले का कोई भी व्यक्ति अपनी समस्या लेकर उनके पास पहुंचता है तो उनकी हर संभव मदद करने की कोशिश करते हैं। इन दिनों कोरोना के साथ-साथ जिले में राजस्थान पंचायती राज चुनाव 2020 भी होने हैं। उसकी भी मॉनिटरिंग व्यवस्थित तरीके से इनके द्वारा की जा रही हैं।

     कलेक्टर का दावा: तीस साल हो साप्ताहिक अवकाश लिए

    कलेक्टर का दावा: तीस साल हो साप्ताहिक अवकाश लिए

    इनकी कार्यशैली से बाड़मेर का हर नागरिक प्रभावित हैं। विशेष रुप से इनके हर समय ऑफिस में उपस्थित रहने व आमजन की बात सुनने को लेकर लोग काफी प्रभावित नजर आ रहे हैं। जिला कलेक्टर विश्राम मीणा के मुताबिक उन्होंने अपने जीवन के 30 वर्ष के प्रशासनिक जीवन में अवकाश लेना मुनासिब नहीं समझा। उनका कहना है कि सरकार ने उन्हें जो कर्तव्य दिया है। उसकी पालना करने के लिए वे निरंतर इसी प्रकार कार्य कर रहे हैं।

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