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Rajasthan History: रहस्यों से घिरा राजस्थान का यह किला, घूमने से पहले जान लें टाइमिंग और शेड्यूल

Rajasthan History: राजस्थान के भरतपुर जिले में स्थित लोहागढ़ किला आज भी चर्चा का विषय रहता है। अक्सर इस किले से जुड़े तथ्यों पर सरकारी परीक्षा में सवाल भी पूछे जाते हैं। यह भारत के इतिहास का वह अनोखा और अजेय दुर्ग है, जिसे न मुगल जीत सके, न मराठा और न ही अंग्रेज। भारत के जाट शासक और कुशल रणनीतिकार महाराजा सूरजमल ने इसे 1733 में बनाया था। यह किला अपनी अनोखी संरचना, मिट्टी की दीवारों और गहरी खाइयों के कारण "अजयगढ़" के नाम से प्रसिद्ध है। आज भी यह किला भारत की प्राचीन सैन्य इंजीनियरिंग का सबसे बेहतरीन उदाहरण माना जाता है।

लोहागढ़ किले की सबसे बड़ी खासियत है इसकी मिट्टी की विशाल और मजबूत दीवारें। यह दीवारें पत्थर या ईंट से नहीं बनी है, इसके बावजूद बेहद मजबूत है। इसे विशेष तरह की मिट्टी से बनाई गई थीं। यह मिट्टी तोपों के गोलों को सोख लेती थी, जिससे भारी से भारी तोप भी इन दीवारों को नुकसान नहीं पहुंचा पाती थी।

Rajashthan History

कब घूम सकते हैं लोहागढ़ किला

- किले के खुलने का समय: सुबह 10:00 बजे से शाम 6:00 बजे तक। यह सप्ताह के सभी दिनों में खुला रहता है।

- प्रवेश शुल्क: किले में प्रवेश निःशुल्क है। हालांकि, संग्रहालय देखने के लिए भारतीयों के लिए लगभग ₹20 और विदेशी पर्यटकों के लिए ₹100 का टिकट है।

- घूमने में 2 से 3 घंटे लग सकते हैं। निकलने से पहले राजस्थान टूरिज्म की वेबसाइट देखना न भूलें।

Lohagarh Fort की बनावट है इंजीनियरिंग की मिसाल

- जहां भारत के कई बड़े किले तोपों की मार से ढह गए, वहीं लोहागढ़ का दुर्ग लगभग अडिग ही खड़ा रहा।

- किले की सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा परत है गहरी और चौड़ी खाई, जिसे मोती झील कहा जाता है। यह खाई करीब 60 फुट गहरी और 100 फुट चौड़ी थी।

- इसमें पानी भरा रहता था और दुश्मन के आक्रमण से पहले अक्सर इसमें मगरमच्छ छोड़ दिए जाते थे।

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- यह व्यवस्था इतनी प्रभावी थी कि दुश्मन सैनिक खाई में उतरने से ही डर जाते थे। दुश्मन के लिए किले की दीवारों तक पहुंचना लगभग असंभव हो जाता था।

Rajasthan History: अंग्रेजों के 13 हमले रहे नाकाम

इतिहास में दर्ज है कि अंग्रेजों ने इस किले पर लगातार 13 हमले किए, लेकिन हर बार उन्हें पीछे हटना पड़ा। प्रसिद्ध ब्रिटिश कमांडर लॉर्ड लेक भी इसे जीतने में नाकाम रहे थे। अंग्रेजों से पहले शक्तिशाली मुगल साम्राज्य भी इस किले की दीवारों को भेदने में असफल रहा था। इसका श्रेय महाराजा सूरजमल की अनोखी सैन्य रणनीति और निर्माण तकनीक का बड़ा योगदान माना जाता है। इस रणनीति और तकनीक ने लोहागढ़ को भारत के सबसे सुरक्षित किलों में स्थान दिलाया।

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लोहागढ़ किला जाटों की वीरता का प्रतीक

आज भी लोहागढ़ किला जाट वीरता का प्रतीक माना जाता है। यह इस बात का प्रमाण भी है कि भारतीय कारीगरों ने सैकड़ों साल पहले ऐसी मजबूत रक्षा तकनीक विकसित की थी, जो आधुनिक हथियारों के सामने भी टिक जाती थी। यह किला भारतीय इतिहास की उस गौरवशाली धरोहर का हिस्सा है, जिसे दुनिया आज भी अद्भुत मानती है। हर साल हजारों की संख्या में इसे देखने के लिए पर्यटक पहुंचते हैं।

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