Churu : जिस भाषा में वोट मांगते हैं, उसमें शपथ नहीं ले पाना दुर्भाग्यपूर्ण-डॉ देवल
Churu News, चूरू। प्रयास संस्थान की ओर से जिला मुख्यालय पर सूचना केंद्र में राजस्थानी साहित्य पुरस्कार समारोह 2019 का आयोजन किया गया। गुरुवार को हुए समारोह के दौरान राजस्थानी साहित्य में योगदान के लिए विभिन्न साहित्यकारों को पुरस्कृत किया गया।
समारोह को संबोधित करते हुए पद्मश्री एवं साहित्य अकादेमी से सम्मानित राजस्थानी के ख्यातनाम साहित्यकार डॉ चंद्रप्रकाश देवल ने कहा कि हमारे नेता जिस भाषा में वोट मांगते हैं, उस भाषा में विधानसभा में शपथ नहीं ले पाना शर्म की बात है।

हम राजस्थानी इतने सरल लोग हैं कि यह भी नहीं देख पा रहे हैं कि राजस्थानी की मान्यता नहीं होने के कारण किस प्रकार प्रदेशवासियों के हित प्रभावित हो रहे हैं। राजस्थानी की मान्यता हमारी अस्मिता का सवाल है और मातृभाषा प्रत्येक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है।
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राजस्थानी को नहीं मानने का अर्थ है कि हमारे वजूद को ही अस्वीकार किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि किसी भी लेखक के लिए मातृभाषा अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने राजस्थानी की समृद्धता के अनेक उदाहरण देते हुए बताया कि राजस्थानी को नहीं समझने वाले लोग यहां के लोगों की पीड़ा का निदान नहीं कर सकते हैं। उन्होंने स्व. किशोर कल्पनाकांत और रावत सारस्वत का स्मरण करते हुए क्षेत्र में राजस्थानी साहित्य के लिए किए जा रहे काम के लिए संस्थान की सराहना की।
मुख्य अतिथि राजस्थानी के नामचीन लेखक मालचंद तिवाड़ी ने कहा कि मातृभाषा का राज्य के समग्र विकास से गहरा संबंध है और यह बात नीति-निर्माताओं का समझनी होगी। उन्होंने भाषा को गलत ढंग से सहेजने के गहरे दुष्परिणाम होते हैं और इससे पीढ़ियों में एक बड़ा कम्युनिकेशन गेप पैदा होता है। राजस्थानी भाषा को जानने वाले लोग ही यहां के लोगों का दर्द और समस्याएं समझ सकते हैं।
उन्होंने कहा कि मातृभाषा में लिखने का एक उत्तरदायित्व भी है जो लेखकों को समझना होगा। लेखक को किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रह से मुक्त होकर कलम उठानी होगा, तब जाकर उसका दायित्व पूर्ण होगा। भाषा शब्दों से नहीं अपने मुहावरे से बनती है और राजस्थानी के मुहावरे की समझ के लिए राजस्थानी भाषा के नजदीक जाना ही होगा।
समारोह की अध्यक्षता करते हुए ख्यातनाम लेखिका सावित्री चौधरी ने कहा कि राजस्थान के प्रत्येक नागरिक में राजस्थानी बोलने, लिखने और पढ़ने का चाव होना चाहिए। राजस्थानी एक समृद्ध भाषा है जो संसार की किसी भी भाषा से कमतर नहीं है। इससे पूर्व शुरुआत में संस्थान अध्यक्ष दुलाराम सहारण ने आयोजन की पृष्ठभूमि से अवगत कराया। वरिष्ठ साहित्यकार भंवर सिंह सामौर ने स्वागत उद्बोधन दिया। कुमार अजय ने आभार जताया।
'अपणायत रौ अहसास' का विमोचन
कार्यक्रम के दौरान सावित्री चौधरी की कहानी पुस्तक 'अपणायत रौ अहसास' का विमोचन किया गया। कार्यक्रम के दौरान वरिष्ठ पत्रकार माधव शर्मा, शिवकुमार मधुप, विजयलक्ष्मी नेहरा, एडवोकेट रामेश्वर प्रजापत, जिला कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता नरेंद्र सैनी, सादीराम गोठवाल, जमील चौहान, रामगोपाल इसराण, दिलीप सरावग, हरिसिंह सिरसला, प्रो. एचआर इसराण, कमल कोठारी, डॉ कृष्णा जाखड़, भंवर लाल कस्वां, उम्मेद गोठवाल, शिशपाल बुडानिया, धर्मपाल शर्मा, इदरीश राज खत्री, अरविंद भांभू, बीरबल नोखवाल, शैलेंद्र माथुर, राजेंद्र मुसाफिर, ओमप्रकाश तंवर, बनवारी खामोश, श्यामसुंदर शर्मा, अशोक डूडी आदि ने अतिथियों का स्वागत किया। इस दौरान बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।
राजस्थानी साहित्य के लिए ये हुए पुरस्कृत
इस दौरान अजमेर के डॉ. चन्द्रप्रकाश देवल को कन्हैयालाल पारख राजस्थानी साहित्य पुरस्कार प्रदान किया गया। पुरस्कार के रूप में उन्हें 51 हजार रुपये, सम्मान पत्र, शॉल, श्रीफल भेंट किया गया। इसी प्रकार कोटा के अतुल कनक को उनके उपन्यास 'छेकड़लो रास' के लिए 11 हजार रुपये का बैजनाथ पंवार कथा साहित्य पुरस्कार, जोधपुर की जेबा रशीद को उनकी कविता पुस्तक 'बगत और बायरो' के लिए 11 हजार रुपये का सावित्री चौधरी खूमसिंह साहित्य पुरस्कार तथा राजपुरा के उम्मेद धानिया को उनकी कहानी पुस्तक 'लेबल' के लिए 5100 रुपये का दुर्गेश युवा साहित्यकार पुरस्कार प्रदान किया गया।
पुरस्कृत लेखकों ने साझा किए अनुभव
पुरस्कृत साहित्यकार जेबा रशीद ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि राजस्थानी भाषा की समृद्धि में लेखिकाओं का भी बड़ा योगदान रहा है। अतुल कनक ने कहा कि प्रत्येक पुरस्कार लेखक का दायित्व बढाता है और पुरस्कार के तौर पर उन पर जो विश्वास व्यक्त किया गया है, वे उसके निर्वहन का प्रयास करेंगे। चर्चित साहित्यकार उम्मेद धानिया ने कहा कि साहित्य उनके लिए किसी खुशी का प्रकटन नहीं, अपितु अपने आक्रोश की अभिव्यक्ति है।












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