Pooja Sihmar Sikar : खेतों की पगडंडी पर दौड़ लगाने वालीं पूजा ने लिखी कामयाबी की नई कहानी
सीकर, 22 जनवरी। अपनी शारीरिक कमी को ही जब कोई अपनी सबसे बड़ी ताकत बना ले तो सफलता उसके कदम चूमती है। यह कर दिखाया है राजस्थान के सीकर जिले के खाटूश्यामजी इलाके की राजावाली ढाणी की बेटी दिव्यांग पूजा सिमहार ने।
पोलियोग्रस्त पूजा अपने जुनून और बुलंद हौसलों के दम पर के नित नए आयाम स्थापित कर रही है। पूजा ने खेतों के उबड़-खाबड़ रास्तों में ही दौड़ लगाकर प्रेक्टिस की। तीन साल में राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर सात गोल्ड मेडल जीत डाले।
वन इंडिया हिंदी से बातचीत में पूजा के पिता किसान सरदारमल ने बताया कि बेटी बचपन से पोलियो की शिकार हो गई थी। जैसे-जैसे बड़ी हुई तो चिंता भी सताने लगी, लेकिन पूजा ने हमारी चिंता को दूर किया।

PTI महेश कुमार नेहरा ने दिखाई राह
पूजा जब अपने गाँव से सीकर जिला मुख्यालय पर विकलांगता का प्रमाण पत्र बनवाने गई तो वहाँ पीटीआई महेश कुमार नेहरा ने पूजा को देखा और उसकी माताजी से उसे एथेलेटिक में भविष्य बनाने के लिए प्रोत्साहित किया। बस यहीं से पूजा के हौसलों का सफर शुरू हुआ।

लोग हंसते थे, पूजा नहीं रुकी
घर आने के बाद काफी सोच विचार किया और अगले ही दिन से पूजा ने एथेलेटिक की तैयारी शुरू कर दी। रोजाना घर से सुबह खाटूश्यामजी में आकर दौड़ लगाना शुरू किया। पूजा को दौड़ लगाते देख लोग हंसने लगे, लेकिन वह रुकी नहीं और अपने जोश, जुनून व जिद्द के चलते 2018 में अपना सफर शुरू किया। आखिर पूजा के इस कठोर परिश्रम के बल बूते उसका जयपुर में स्टेट लेवल पर चयन हुआ।

दौड़ने के लिए नहीं थे जूते
जब पूजा ने अपनी प्रेक्टिस शुरू की तो उसके पैरों में जूते नहीं थे तब इनके कोच महेश नेहरा ने ना केवल जूते दिलाये बल्कि हौसला अफजाई के साथ हर संभव मदद भी की। कक्षा 11वीं में पढ़ने वाली पूजा ने महज तीन साल में स्टेट लेवल पर छह तथा नेशनल लेवल पर एक गोल्ड मेडल जीतकर अपनी मेहनत का लोहा मनवाया है।

भारत का प्रतिनिधित्व करने का सपना
किसान परिवार में जन्मी व पली-बढ़ी दो भाइ-बहिनों में सबसे बड़ी पूजा रोजाना तीन से चार घंटे दौड़कर अभ्यास करती है। सीकर जिले के साथ राज्य का नाम रोशन करने के बाद अब पूजा एथलीट में भारत का प्रतिनिधित्व का सपना लेकर तैयारी कर रही है।

जन्म के समय नहीं थे बचने के आसार
पूजा का जब जन्म हुआ तब उसके बचने के आसार नहीं थे। जन्म के समय अस्पताल में भर्ती रहीं और काफी उपचार के बाद पूजा को नया जीवन मिला। इसके बाद दिव्यांगता ने पूजा को परेशान किया तो माता-पिता ने उसकी हौसला अफजाई की। मन ही मन माता-पिता को भी यह चिंता रहती थी लेकिन आज अपनी बिटिया की सफलताओं पर फूले नहीं समाते है और वे उसकी पूरा हौसला अफजाई करते हैं।

रोज चालीस किलोमीटर का सफर करती है तय
पूजा पढ़ाई के साथ अपनी दौड़ की भी प्रेक्टिस जारी रखना चाहती थी। इसके लिए खाटूश्यामजी के स्कूलों में प्ले ग्राउंड की सुविधाएं नहीं होने के कारण उसे सीकर के गोकुलपुरा के राजकीय स्कूल में प्रवेश लिया। रोजाना खाटूश्यामजी से गोकुलपुरा बस से सफर करती है। पढाई के साथ-साथ अपने खेल को पंख लगाने के लिए कड़ी मेहनत भी कर रही है।

प्रोत्साहन राशि का है इंतजार
जानकारी अनुसार गोल्ड मेडल जीतने पर सरकार द्वारा खिलाड़ी को प्रोत्साहन राशि दी जाती है। जूनियर स्तर पर प्रत्येक मेडल पर पचास हजार रुपए की प्रोत्साहन राशि सरकार की ओर से मिलती है। लेकिन राज्य सरकार की ओर से अभी तक मेडल की राशि ही पूजा को मिली है। हालांकि उतराखंड, बिहार सहित कई राज्यों में भी पूजा ने मेडल जीते हैं।












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