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Ground Report: रणथम्भौर अभ्यारण्य के घने जंगल में अद्भूत शोलेश्वर महादेव, क्या है सच , क्या कहानियां ?

Ground Report Sholeshwar Mahadev Sawai Madhopur: राजस्थान में जब भी कोई विदेशी और देशी मेहमान घूमने का प्लान बनाते है तो सबसे पहले सवाईमाधोपुर जिले के रणथम्भौर दूर्ग और अभ्यारण्य को देखना जरूर तय करते है।

लेकिन क्या आप जानते है कि रणभम्भौर अभ्यारण्य सिर्फ टाइगर के लिए नहीं जाना जाता है यह अपनी पौराणिकता के भी आस्था का धाम है। आज हम आपकों ऐसी अनदेखी तस्वीरों को किस्सों के साथ दिखाएंगे कि आप भी दांतों तले अंगुली दबा लेंगे।

आज हम आपकों रणथम्भौर दूर्ग के घने जंगल में स्थित शोलेश्वर महादेव मंदिर से जुड़ी कहानी और किवदंतियों के साथ यहां की अलौकिक, अद्भूत, अविश्वसनीय तस्वीरें दिखाएंगे।

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दरअसल जिस अनदेखी, अलौकिक, अद्भूत और अविश्वसनीय कहानी से आपकों रूबरू करवाने जा रहे है वो सवाईमाधोपुर जिले के रणथम्भौर अभ्यारण्य में करीब 450 फीट ऊंची पहाड़ी पर स्थित भगवान शिव शंकर भोलेनाथ के शोलेश्वर महादेव मंदिर की है।

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    रणथम्भौर अभ्यारण्य के घने जंगल में अद्भूत शोलेश्वर महादेव

    यहां तक पहुंचने के लिए श्रद्धालु अपनी जान की परवाह किए बगैर घने जंगल के दुर्गम रास्तों से होकर 450 फीट ऊंची पहाड़ी पर कठिन चढ़ाई चढ़कर पहुंचते है। यह इतना आसान नहीं है। इस मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को रणथम्भौर अभ्यारण्य के जोन 10 से गुजरकर, जोन 4, जोन 3 और फिर जोन 2 तक पहुंचना पड़ता है।

    ऐसा नहीं है कि यहां पहुंचने वाले श्रद्धालु सिर्फ सवाईमाधोपुर जिले या फिर आस-पास के ग्रामीण इलाके के बाशिंदे है। यहां पर मध्यप्रदेश, यूपी, दिल्ली, जयपुर, भरतपुर, दौसा सहित कई जिलों के हजारों श्रद्धालु हर महीने भगवान शोलेश्वर महादेव मंदिर के दर्शन करने के लिए दौड़े चले आते है।

    यह वहीं सोलेश्वर महादेव है जहां तक पहुंचने के दौरान रास्तों में आपकों टाइगर की दहाड़ भी सुनाई देगी, तो भालू की चहलकदमी भी दिखाई देगी, बंदरों की उछल कूद भी आपकों अपने आस-पास नजर आएगी। पैरों में जहरीले सांपों की सरसराहट भी महसूस हो सकती है तो कुछ दूर पर ही पंख फैलाएं मस्ती में झूमता मोर भी दिखाई देगा।

    लेकिन जैसे-जैसे आप सोलेश्वर महादेव मंदिर की ओर बढ़ेगे तो वैसे-वैसे ही आपकी सांसे फूलने लगेगी। जमीन से गगनचुम्भी पहाड़ियों की ओर बढ़ते आपके कदम लड़खड़ाने लगेंगे, शरीर पसीने से तरबतर हो जाएगा, घुटने जवाब देने लगेंगे। मंदिर की ओर जाने वाला रास्ता आपकों चारों ओर से डराएगा, हमने भी जब इस कहानी को लोगों की जबान से सुना तो शरीर में सीहरन सी उठ गई, दिल से एक आवाज आई कि अब तो यहां जाना ही है।

    लोगों ने खुद दावे किए इस पूरी यात्रा के वीडियो अब तक किसी टीवी चैनल पर नजर नहीं आए है यानी कोई भी न्यूज चैनल अब तक यहां पहुंचा ही नहीं था।

    फिर क्या था, वन इंडिया हिंदी की टीम ने निर्णय किया कि आज हम हमारे पाठकों,दर्शकों को इस अनदेखी कहानी का पूरा सच दिखाएंगे।

    हमारे राजस्थान संवाददाता अपने एक साथी के साथ चल पड़े मंजिल की ओर, जयपुर से ट्रैन के सफर से सवाईमाधोपुर पहुंचने के बाद सिटी बस का सहारा लेकर बोदल गांव पहुंचे और फिर वहीं से रणथम्भौर अभ्यारण्य के जोन 4 से सफर की शुरूआत करते हुए 10 किमी का लम्बा सफर तय किया।

    इस सफर के दौरान जान का तो जोखिम था ही, क्योंकि टाइगर के दहाड़ने की आवाजें पूरे सफर में कई बार सुनाई दी, कई बार वन्यजीवों की सरसराहट महसूस हुई, यूं मानिए कि एक-एक कदम पर हमारी सांसे उखड़ रही थी, लेकिन जैसे -जैसे आगे बढ़े तो श्रद्धालुओं का जत्था हमें मिल गया।

    हमारी मुलाकात हुई मुकुट शर्मा और उनकी पत्नी रानी से, जो हर महीने शोलेश्वर महादेव के दर्शन करने के लिए सपरिवार आती है। इस बार तो उनका छोटा बेटा सौरभ शर्मा भी साथ था, इतना ही नहीं उनका भांजा विकास दीक्षित भी इस सफर में साथ ही था।

    हमने भी अपने सफर को इन्ही की यात्रा के साथ जोड़ लिया और इनसे पूरी यात्रा में एक-एक जगह के बारे में तफ्सील से समझा। इस सफर में सबसे पहले आई मक्खी, कहते है कि इस मक्खी में छोटी सी सुरंग है, जहां बारिश के मौसम को छोड़कर हर मौसम में मधुमक्खी नजर आती है। इस छोटी सी सुरंग में ही सफर पर आने वाले श्रद्धालु और आस-पास के वन्यजीव अपनी प्यास बुझाते है।

    इसके बाद जैसे-जैसे हमारा सफर आगे बढ़ा तो हमे पहाड़ की एक चट्टान पर अद्भूत नजारा देखने को मिला, जहां एक चट्टान पर नाग देवता की बैठी हुई अवस्था की आकृति में चट्टान कटी हुई थी, तो थोड़ी दूर आगे चलते ही नाग देवता से शयन वाली अवस्था में चट्टान की आकृति साफ नजर आ रही थी।

    जब हमने मुकुट शर्मा से इस बारे में बातचीत की तो उन्होने साफ बताया कि जिस तरह से यह आकृति नजर आ रही है, लोग मानते है कि यहां किसी समय में नाग देवता ने जरूर तपस्या की होगी और सालों तक इसी अवस्था में होकर तपस्या करने पर पहाड़ पर वहीं आकृति बन गई।

    अब हम पहाड़ी की ऊचाई की ओर बढ़ रहे थे, शरीर की सांसे फूल रही थी ऐसा लग रहा था कि आक्सीजन की कमी हो रही है, लेकिन हमने मंजिल तक पहुंचने की कोशिश जारी रखी करीब 5-6 किमी पहाड़ों के जटिल रास्तों से ऊंचाई पर चलने के बाद हम चोटी पर पहुंच गए थे।

    चारो ओर नजर दौड़ाकर देखा तो पहाड़ी के नीचे हजार मीटर से ज्यादा गहरी खाई नजर आने लगी। घना जंगल नजर आ रहा था।हम मुश्किलों से लड़ते हुए मंजिल की ओर बढ़े, करीब 3 किमी फिर चलने के बाद हमें हमारी मंजिल नजर आई। जो पहाड़ी की चोटी से करीब 300 मीटर से ज्यादा नीचे गहरी खाई में नजर आ रही थी।

    लेकिन शुक्र यह था कि यहां अब कच्ची सीढ़ियों से सफर तय करना था, हमें वह सीढ़िया भी कम मुसीबत नजर नहीं आ रही थी, जरा सी चूक होते ही हादसा तय था, लेकिन हम सावधानी बरते हुए मंजिल तक पहुंचे और फिर शोलेश्वर महादेव का दर्शन पहली बार भक्तों, श्रद्धालुओं के सामने आए।

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