कौन हैं डॉ. अर्जुन सिंह शेखावत जो राजस्थानी भाषा को मान्याता नहीं मिलने पर लौटा देंगे पद्मश्री?
पाली, 18 मई। राजस्थान में मायड़ भाषा के साहित्यकार पद्मश्री डॉ. अर्जुनसिंह शेखावत ने राजस्थानी भाषा को मान्यता दिलवाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व गृहमंत्री अमित शाह को पत्र लिखा है। पत्र में शेखावत ने कहा कि राजस्थानी भाषा को जल्द मान्यता नहीं मिली तो वे पद्मश्री पुरस्कार लौटा देंगे।

90 वर्षीय अुर्जन सिंह शेखावत ने पीएम को लिखा पत्र
बता दें कि अर्जुन सिंह शेखावत बीते पचास साल से राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं सूची में शामिल करवाने के लिए प्रयासरत हैं। 90 वर्षीय शेखावत ने पीएम को लिखे पत्र में यह भी कहा कि राजस्थानी भाषा को मान्यता नहीं मिलने पर वे अवार्ड लौटाने के साथ-साथ वे संसद के सामने अनशन पर भी बैठेंगे।

2021 को मिला पद्मश्री
उल्लेखनीय है कि अर्जुनसिंह शेखावत को 9 नवंबर 2021 को राजस्थानी साहित्य व शिक्षा के लिए राष्ट्रपति ने पद्मश्री से सम्मानित किया था। तब भी अर्जुनसिंह शेखाखत ने पीएम से मिलकर राजस्थानी को भाषा के रूप में मान्यता देने की मांग रखी थी।

राजस्थानी भाषा की स्थिति दयनीय
अब शेखावत ने पत्र में लिखा कि मां (मायड़ भाषा) को मान नहीं तो सपूतों का कैसा सम्मान। दुनिया में गत जनगणना के अनुसार सात हजार भाषाएं थीं। तीन सौ की हत्या हो गई। अब राजस्थानी की भी यही स्थिति बन रही है।
President Kovind presents Padma Shri to Dr Arjun Singh Shekhawat for Literature and Education. He is a scholar, educationist, thinker and writer. pic.twitter.com/hj7uEabDxs
— President of India (@rashtrapatibhvn) November 9, 2021
40 किताबें लिख चुके हैं शेखावत
राजस्थानी भाषा की मान्यता की पैरवी करने वाले अर्जुनसिंह शेखावत प्रदेश के जाने माने साहित्यकार हैं। ये राजस्थानी में 40 से ज्यादा पुस्तकें लिख चुके हैं। आदिवासियों पर लिखी 'भाखर रा भोमिया' इनकी चर्चित पुस्तकों में से एक है।

साहित्यकार अर्जुनसिंह शेखावत की जीवनी
अर्जुनसिंह शेखावत का जन्म पाली जिले के गांव देवली पाबूजी में 5 फरवरी 1934 को हुआ। इन्होंने साल 1967 में आदिवासी बाहुल्य बाली इलाके में अध्यापक के रूप में कार्य किया। फिर उपजिला शिक्षा अधिकारी पद पर भी रहे। शिक्षा व साहित्य के क्षेत्र में ये पद्मश्री पुरस्कार 2021 से नवाजे गए थे।

राजस्थानी भाषा मान्यता मिलने में क्या दिक्कत?
वन इंडिया हिंदी से बातचीत में अर्जुन सिंह शेखावत कहते हैं कि मायड़ भाषा को मान्यता दिलाने की मुहिम में हर राजस्थानी का जुड़ना जरूरी है। किसी भी भाषा की परिभाषा यह है कि उसका अपना शब्दकोष, व्याकरण, साहित्य व लिपी हो। ये सब राजस्थानी भाषा के पास हैं, मगर यूपी, एमपी जैसे हिंदी भाषी क्षेत्र राजस्थानी को भाषा के रूप में मान्यता मिलने की राह में अड़गा लगा देते हैं। वे राजस्थानी को अलग भाषा की बजाय हिंदी ही मानते हैं।
संविधान की आठवीं सूची में शामिल भाषा
भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाएं हैं। इनमें असमिया, बंगाली, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, सिंधी, तमिल, तेलुगू, उर्दू, बोडो, संथाली, मैथिली, डोंगरी भाषा शामिल हैं।

राजस्थानी भाषा को मान्यता क्यों?
मायड़ भाषा के साहित्यकार चूरू निवासी दुलाराम सहारण कहते हैं कि 'क्यूकै आ आपणे रोजगार सूं जुड़ेड़ी बात है। असम में बिनां असमियां आयां बडी नौकरी तौ छोडौ बाबू तकात कोनीं बण सकौ। पंजाब में पंजाबी, गुजरात में गुजराती अर बंगाल में बांग्ला आवणी जरूरी है नौकरी खातर। आपणै अठै अड़ाव है, कुणई आवौ चरौ, उगाळी स्हारौ, मौज मारौ...
जे राजस्थानी नै जरूरी कर देवै तौ सगळी सरकारी नौकरी कलक्टर सूं लेयनै बाबू तांणी किण री? राजस्थानी आवै उण री... डफोळ नेता आ बात कद समझै अर आपरा पीए अफसर जिका दूजां प्रांतां रा है, वांरी मानै अर गूंगा बणै...।

बढ़ेंगे रोजगार के अवसर
मायड़ भाषा के साहित्यकार दुलाराम सहारण की मानें तो
राजस्थानी नै मानता मिलतां ई प्राइवेट फैक्टरी, अखबार, टीवी, दफ्तर, सरकार हरेक में भासा जाणणियौ जवांन नौकरी पर राखणौ पड़सी। स्कूल, कॉलेजां में बाबू, मास्टर सगळा राजस्थानी जाणसी वै ई लागसी। लाखूं लोगां नै नौकरी मिलसी, आपणा लोगां नै...।
पारका पराया लोगां नै कद सुहावै आ बात, वै लागेड़ा है के मानता नीं मिलै, बूझै कुणसी राजस्थानी? वांनै बांटनै राज करणौ आवै। वांनै कुणई पूठौ बूझै कुणसी थारली भासा- कबीर वाळी, तुलसीदास वाळी, रेणु वाळी, प्रसाद वाळी के पछै सरकारी मुहर लाग्यां फेर बणी वा? बोली भांत भांत री पण भासा एक। एकरूपता पेटै सरकारी मुहर लागतां रै एक बरस में कांम हुय जावै। पण वै माधिया भाई करण कोनीं देवै। वांनै डर है के मानता मिली, नौकरी गमी।
वै चावै के नौकरी म्हानै मिलै अर राजस्थान वां सारू अड़ाव रैवै, अर आपरला बावळी टाट कीं जांणै कोनीं, जे जांणै ताै मानता दिरावण रौ डोळ कोनीं....। जिकौ आ समझसी, वौ मानता दीरासी.... मोड़ौ है इत्तै ई फोड़ौ है.... जीत आपणी हुवणी है एक दिन।
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