Baba Shyam Janmotsav : राजस्‍थान के सीकर में खाटू श्याम बाबा के जन्‍म की असली कहानी क्‍या है?

हारे का सहारा, भगवान श्री कृष्ण के कलयुगी अवतार, लखदातार, शीश का दानी और बाबा श्‍याम के नाम पुकारे जाने वाले खाटूश्‍यामजी का जन्‍मदिन हर साल कार्तिक शुक्‍ल पक्ष की देवउठनी एकादशी को मनाया जाएगा। इस बार यह तिथि 4 नवंबर 2022 को है। राजस्‍थान के सीकर जिले के खाटू कस्‍बे में स्थित खाटू मंदिर समिति और दुनियाभर से श्‍याम भक्‍तों ने बाबा श्‍याम का जन्‍मोत्‍सव धूमधाम से मनाने की तैयारी की है।

कोलकाता से 10 क्विंटल फूल खाटूश्‍यामजी मंगवाए

कोलकाता से 10 क्विंटल फूल खाटूश्‍यामजी मंगवाए

देवउठनी एकादशी को खाटू नरेश के जन्‍मदिन के मौके पर पूरे खाटूश्‍यामजी मंदिर को दुल्‍हन की तरह सजाया जाएगा। इसके लिए श्री श्‍याम मंदिर कमेटी ने कोलकाता से 10 क्विंटल फूल मंगवाए हैं। वहीं से विशेष कारीगर भी खाटू आए हैं। कारीगर 3 नवंबर को दिनभर मंदिर को सजाने में जुट रहे।

 बाबा श्‍याम के बर्थ डे पर सजा खाटू मंदिर

बाबा श्‍याम के बर्थ डे पर सजा खाटू मंदिर

मीडिया से बातचीत में श्री श्‍याम मंदिर कमेटी के मंत्री श्‍याम सिंह चौहान ने बताया कि देवउठनी एकादशी 2022 को बाबा श्‍याम का जन्‍मदिन मनाया जाएगा। इस दिन मंदिर को फूलों से सजाने के साथ साथ रूह के इत्र से बाबा को स्‍नान करवाया जाएगा।

कटेंगे 70 क्विंटल से अधिक केक

कटेंगे 70 क्विंटल से अधिक केक

बता दें कि खाटू श्‍यामजी मंदिर लाखों श्‍याम भक्‍तों की आस्‍था का केंद्र है। खाटू लक्‍खी मेला के अलावा खाटूश्‍यामजी के जन्‍मदिन पर भी बड़ी संख्‍या में यहां श्‍याम भक्‍त पहुंचते हैं। होटल धर्मश्‍शालाओं में जन्‍मोत्‍सव कार्यक्रम होंगे और खूब केक काटे जाएंगे। अनुमान है कि पूरे खाटूश्‍यामजी के बर्थ डे पर श्‍याम भक्‍त 70 क्विंटल केक काटेंगे।

खाटूश्‍यामजी मंदिर का इतिहास

खाटूश्‍यामजी मंदिर का इतिहास

बता दें कि खाटू नगरी में बाबा श्‍याम को विशाल मंदिर बना हुआ है, जिसके शिखर पर सालभर सूरजगढ़ का निशान लहराता है। खाटूश्‍यामजी का मंदिर काफी प्राचीन है। कई वेबसाइटों पर इतिहासकार पंडित झाबरमल्‍ल शर्मा के हवाले से लिखा गया है कि साल 1679 में मुगल शासक औरंगजेब की सेना हिंदू मंदिरों को नष्‍ट करते हुए खाटू पहुंचकर बाबा श्‍याम के मंदिर को भी नुकसान पहुंचाया था। मंदिर की रक्षा के लिए उस वक्‍त राजपूतों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी। कहते हैं कि खाटूश्‍यामजी मंदिर के वर्तमान स्‍वरूप की नींव साल 1720 में रखी गई थी।

 खाटू श्‍याम जी के जन्‍म की कहानी

खाटू श्‍याम जी के जन्‍म की कहानी

- बाबा श्‍याम के जन्‍म से जुड़ी पौराणिक कथा है, जिसका संबंध महाभारत काल से है। कहा जाता है कि वन-वन भटकते पांडवों की मुलाकात हिडिंबा नाम की राक्षसी से हुआ। हिडिंबा भीम पर मोहित हो गई थी। भीम से शादी करना चाहती थी। फिर भीम और हिडिंबा की शादी हुई। इनके बेटा घटोत्कच जन्‍मा। फिर घटोत्‍कच के बेटा बर्बरीक हुआ।

- बर्बरीक को देवी के वरदान से तीन दिव्य बाण प्राप्त हुए थे। खास बात थी कि वे बाण अपना लक्ष्य भेदकर वापस लौट आते थे। महाभारत के दौरान बर्बरीक युद्ध देखने के इरादे से कुरुक्षेत्र आ रहा था। श्रीकृष्ण जानते थे कि अगर बर्बरीक युद्ध में शामिल हुआ तो परिणाम पाण्डवों के विरुद्ध होगा।

-बर्बरीक को रोकने के लिए श्री कृष्ण गरीब ब्राह्मण बनकर बर्बरीक के सामने आए। अनजान बनते हुए श्रीकृष्ण ने बर्बरीक से पूछ कि तुम कौन हो और कुरुक्षेत्र क्यों जा रहे हो? जवाब में बर्बरीक ने बताया कि वह एक दानी योद्धा है जो अपने एक बाण से ही महाभारत युद्ध का निर्णय कर सकता है। श्री कृष्ण ने उसकी परीक्षी लेनी चाही तो उसने एक बाण चलाया जिससे पीपल के पेड़ के सारे पत्तों में छेद हो गया। एक पत्ता श्रीकृष्ण के पैर के नीचे था इसलिए बाण पैर के ऊपर ठहर गया।

- श्रीकृष्ण बर्बरीक की क्षमता से हैरान थे और किसी भी तरह से उसे युद्ध में भाग लेने से रोकना चाहते थे। इसके लिए श्रीकृष्ण ने बर्बरीक से कहा कि तुम तो बड़े पराक्रमी हो मुझ गरीब को कुछ दान नहीं दोगे।

-बर्बरीक ने जब दान मांगने के लिए कहा तो श्रीकृष्ण ने बर्बरीक से उसका शीश मांग लिया। बर्बरीक समझ गया कि यह ब्राह्मण नहीं कोई और है और वास्तविक परिचय देने के लिए कहा। श्रीकृष्ण ने अपना वास्तविक परिचय दिया तो बर्बरीक ने खुशी-खुशी शीश दान देना स्वीकर कर लिया।

-रात भर भजन-पूजन कर फाल्गुन शुक्ल द्वादशी को स्नान पूजा करके, बर्बरीक ने अपने हाथ से अपना शीश श्री कृष्ण को दान कर दिया। शीश दान से पहले बर्बरिक ने श्रीकृष्ण से युद्ध देखने की इच्छा जताई थी इसलिए श्री कृष्ण ने बर्बरीक के कटे शीश को युद्ध अवलोकन के लिए, एक ऊंचे स्थान पर स्थापित कर दिया।

-युद्ध में विजय श्री प्राप्त होने पर पांडव विजय का श्रेय लेने हेतु वाद-विवाद कर रहे थे। तब श्रीकृष्ण ने कहा की इसका निर्णय बर्बरीक का शीश कर सकता है। बर्बरीक के शीश ने बताया कि युद्ध में श्री कृष्ण का सुदर्शन चक्र चल रहा था जिससे कटे हुए वृक्ष की तरह योद्धा रणभूमि में गिर रहे थे। द्रौपदी महाकाली के रूप में रक्त पान कर रही थीं।

-श्री कृष्ण ने प्रसन्न होकर बर्बरीक के उस कटे सिर को वरदान दिया कि कलयुग में तुम मेरे श्याम नाम से पूजित होगे तुम्हारे स्मरण मात्र से ही भक्तों का कल्याण होगा और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति होगी।

- स्वप्न दर्शनोंपरांत बाबा श्याम, खाटू धाम में स्थित श्याम कुण्ड से प्रकट हुए थे। श्री कृष्ण विराट शालिग्राम रूप में सम्वत् 1777 से खाटू श्याम जी के मंदिर में स्थित होकर भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण कर कर रहे हैं।

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