पंजाब: CM चन्नी के सामने कई चुनौती, सत्ता में वापसी की क्या है कांग्रेस की रणनीति, जानिए सियासी गणित
पंजाब विधानसभा चुनाव की तैयारियां सभी पार्टी अपनी-अपनी रणनीतियों के तर्ज़ पर कर रही है। वहीं चुनावी तैयारियों के बीच पंजाब कांग्रेस अंदुरूनी कलह से जूझ रही है।
चंडीगढ़, अक्टूबर 5, 2021। पंजाब विधानसभा चुनाव की तैयारियां सभी पार्टी अपनी-अपनी रणनीतियों के तर्ज़ पर कर रही है। वहीं चुनावी तैयारियों के बीच पंजाब कांग्रेस अंदुरूनी कलह से जूझ रही है और आगामी चुनाव की तैयारी भी कर रही है। ऐसे में कांग्रेस किस तरह की रणनीति के साथ चुनावी मैदान में राजनीतिक पकड़ बना रही है। इस पर सियासी महकमे में सबकी निगाहें टिकी हुई हैं। चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बना कर कांग्रेस ने चुनावी रणनीति की झलक साफ़ कर दी है कि वह किस तरह शह और मात का खेल खेलने वाली है। आपको बता दें कि चन्नी जिस समुदाय से आते हैं उनकी पंजाब 32 फ़ीसद आबादी है। देश में पंजाब का नाम उन राज्यों में शुमार है जहां सबसे ज्यादा दलित रहते हैं।

कांग्रेस का मास्टर स्ट्रोक
कांग्रेस आलाकमान ने चरणजीत सिंह चन्नी को पंजाब का मुख्यमंत्री बनाकर बड़ा दांव खेला है। कांग्रेस का ये मास्टर स्ट्रोक काम कर गया तो पंजाब की कुर्सी पर दोबारा से कांग्रेस का ही क़ब्ज़ा होगा। वहीं 2024 के लोकसभा चुनाव मंप इसका काफ़ी असर पड़ेगा। चुनाव से ठीक पांच महीने पहले सीएम बदलने से जनता में बड़ा संदेश पहुंचा है।लेकिन नवजोत सिंह सिद्धू के कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष के इस्तीफ़े के बाद पंजाब के सियासी समीकरण काफ़ी बदलाव हुए हैं। हालांकि कांग्रेस आलाकमान ने अभी तक सिद्धू के इस्तीफ़े पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष के पद पर संशय बरक़रार है।

कैप्टन ने बढ़ाई मुश्किलें
पंजाब कांग्रेस के रीढ़ कहे जाने वाले कैप्टन अमरिंदर सिंह का मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देना और उसके बाद से कैप्टन के बदले तेवर से कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ती हुई ज़रूर दिख रही हैं। वहीं यह भी बात काफ़ी अहमियत रखती है क्या कैप्टन का पंजाब में 2017 जैसा जलवा बरक़रार है या परिस्थीतियां बदली हैं। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने बतौर मुख्यमंत्री साढ़े चार साल का सफ़र पूरा किया है। कैप्टन के पास 55 साल का सियासी तजुर्बा है वहीं साढे 9 साल का सीएम को तजुर्बा है। लेकिन इस दौरान सरकार से लेकर संगठन काफ़ी चीज़े बदली हैं। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने 2017 चुनाव से पहले पंजाब के लोगों से "नौ नुक़्ते" नाम से नौ वादे किये थे। उन नौ वादों में से कई वादे अभी तक पूरे नहीं हुए हैं। हर घर में 18-35 साल के एक बेरोजगार नौजवान को नौकरी ,सरकार बनते ही चार हफ्ते में पंजाब से नशा ख़त्म किया जाएगा, हर ग़रीब को मकान जैसे वादे अभी भी पूरे नहीं हुए हैं। कैप्टन के ये वादे नवियुक्त मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के लिए चुनौती साबित हो रही है।

कांग्रेस को हो सकता है फ़ायदा
पंजाब में कांग्रेस ने 2017 में मालवा क्षेत्र से कुल 77 में से 38 सीटों पर क़ब्ज़ा जमाया था। वहीं शिरोमणि अकाली दल की बात करें तो 2012 में 33 सीटें जीतने के बावजूद 2017 में 8 सीटें पर ही सिमट गई। पंजाब में दुआब और मांझा भी अहम क्षेत्रों में शुमार किया जाता है। दुआब में 26 और मांझा में कुल 25 सीटें हैं। 2017 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने दुआब की कुल 26 सीटों में से 17 सीटों और मांझा की कुल 25 सीटों में से 22 सीटों पर सीट दर्ज की थी। आपको बता दें कि दोआब क्षेत्र में जालंधर, कपूरथला, होशियारपुर और नवांशहर जिले हैं। यहां पंजाबी दलितों की आबादी 40 फीसदी है। चरणजीत सिंह चन्नी के सीएम बनाने से कांग्रेस को दोआब इलाके में फायदा मिल सकता है।

वोट बैंक की राजनीति
कांग्रेस ने हिन्दू वोटर को भी साधने की कोशिश में है इसलिए ओम प्रकाश सोनी को उप मुख्यमंत्री बना दिया। जबकि जट्ट सिख कम्युनिटी को ख़ुश रखने के लिए सुखजिंदर सिंह रंधावा को डिप्टी सीएम बनाया दिया है। कैप्टन अमरिंदर सिंह, नवजोत सिंह सिद्धू और प्रकश सिंह बादल सभी जट सिख समुदाय से ही हैं, पंजाब में जट सिख समुदाय की कुल आबादी 20 % है। शिरोमणि अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी किसान आंदोलन की वजह से बैक फुट पर है। 2017 के विधानसभा चुनाव में शिरोमणि अकाली दल के साथ गठबंधन और मोदी लहर के बावजूद भाजपा सिर्फ़ 3 सीटों पर ही जीत दर्ज कर पायी थी। केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ किसान बिल को लेकर इस बार सबसे ज़्यादा नाराज़गी पंजाब में ही है। वही पिछले विधानसभा चुनाव में 20 सीट जीतने वाली आम आदमी पार्टी के पास कोई मज़बूत चेहरा नहीं है। ऐसे में शिरोमणि अकाली दल, भाजपा और आम आदमी पार्टी की ये कमियां सियासी कलह का शिकार हुई कांग्रेस के लिए किसी वरदान से कम नहीं है।

सिद्धू ने साधा निशाना
नवजोत सिंह सिद्धू पंजाब के कार्यकारी डीजीपी और एडवोकेट जनरल की नियुक्ति को लेकर चन्नी सरकार पर सवाल उठा रहे हैं। इल बाबत ही उन्होंने पंजाब कांग्रेस अध्याक्ष पद से इस्तीफा भी दे दिया और ख़ुद इसी तरह के सवालों से घिर गए । नवजोत सिंह सिद्धू का आरोप है कि 1988 बैच के आइपीएस अधिकारी इकबाल प्रीत सिंह सहोता की अगुआई में गठित एसआइटी की कस्टडी में दो भाइयों का उत्पीड़न हुआ था। इसलिए वह इकबाल प्रीत सिंह सहोता के कार्यकारी डीजीपी नियुक्त किए जाने का हकर विरोध कर रहे हैं। नवजोत सिंह सिद्धू शायद यह भूल गए हैं कि वह सहोता की जगह जिन आइपीएस अधिकारी को डीजीपी लगाने की पैरवी कर रहे हैं, वह अधिकारी बादलों के ख़िलाफ़ गवाही से मुकर चुके हैं।

सिद्धू ने दिया इस्तीफ़ा
कार्यवाहक डीजीपी और एडवोकेट जनरल की नियुक्तियों के विरोध में इस्तीफा तक दे चुके नवजोत सिंह सिद्धू का यह मानना है कि 1986 बैच के आइएएस अधिकारी एस चटोपाध्याय बेअदबी, कोटकपूरा गोलीकांड सहित ड्रग्स मामले के दोषियों को सज़ा दिलवा सकते हैं। ग़ौरतलब है कि एस चटोपाध्याय उन अधिकारियों में शामिल हैं जिन्होंने बादल परिवार के खिलाफ दर्ज भ्रष्टाचार और आय से अधिक संपत्ति के मामले में गवाही देने से साफ़ मुकर गए थे।आपको बता दें कि चट्टोपाध्याय के अलावा बीके उप्पल, जांच अधिकारी आइपीएस विर्क सहित कई पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी न सिर्फ अपने बयान से पलट गए थे बल्कि अदालत में यह भी कह दिया था कि यह केस तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के मीडिया सलाहकार रहे भरत इंदर सिंह चाहल के दबाव में दर्ज किया गया था। 2002 में बनी कैप्टन सरकार के वक़्त प्रकाश सिंह बादल और सुखबीर सिंह बादल पर आय से अधिक संपत्ति का केस दर्ज हुआ था।

यूपीएससी को भेजे गए नाम
2007 में पंजाब में सत्ता परिवर्तन के बाद इस केस में अदालत में यह अधिकारी गवाही देने मुकर गए थे। पंजाब सरकार ने सिद्धू के दबाव में एस चटोपाध्याय सहित 10 वरिष्ठ अधिकारियों के नाम का पैनल यूपीएससी को भेजा है। वहीं सियासी गलियारों में यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि जो अधिकारी सत्ता परिवर्तन के साथ बादलों के खिलाफ़ गवाही से मुकर सकता है तो क्या गारंटी है की आगे भी ऐसा नहीं दोहराएंगे। बहरहाल पंजाब के नवनियुक्त सीएम चन्नी अपने ताबड़तोड़ फ़ैसले से पंजाब कांग्रेस की सियासी ज़मीन मज़बूत करने में जुटे हुए हैं यह तो आने वाला वक़्त ही बताएगा चन्नी के फ़ैसले से पंजाब कांग्रेस को कितना फ़ायदा मिलता है।
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