कोरोना वारियर जिन्होंने डर को बनाया साहस

पटना, जून 1। ये हैं पुरुषोत्तम सिंह, आस्था फाउंडेशन, पटना के सचिव। साल 2010 में पटना के अग्रणी चिकित्सकों के सहयोग से इन्होंने अपनी पत्नी श्रीमती निक्की सिंह के साथ मिलकर 'आस्था फाउंडेशन' की शुरुआत की थी। उस समय इन्हें लगा था कि 'मधुमेह' यानि कि 'डायबिटिज' ही इस युग की सबसे बड़ी महामारी है। हर घर में डायबिटीज के मरीज पाए जाते हैं और यह स्लो किलर शरीर के अनेक अंगों को कुप्रभावित कर लोगों को मौत के मुहाने तक ले जाता है। मधुमेह प्रबंधन के क्षेत्र में आस्था फाउंडेशन द्वारा चलाया गया 'वाक फोर लाइफ - जीना है तो चलना होगा' बहुत लोकप्रिय हुआ था और चिकित्सा बिरादरी द्वारा काफी सराहा गया था।

Purshottam Singh of Aastha foundation helping people in fighting coronavirus

पटना के नामचीन डॉक्टारों के साथ मिलकर जब डायबिटिज के खिलाफ मुहिम चला रहे थे उस समय इन्हें क्या मालूम था कि इसी कालखंड में वास्तविक महामारी कोरोना भी आएगी और मानव-जीवन पर सबसे बड़ा संकट बन जाएगी। कोरोना की पहली लहर जहां महानगरों में ही तबाही मचा सकी वहीं दूसरी लहर ने छोटे शहर और कस्बों की कमर भी तोड़ दी। 2021 अप्रैल के दूसरे हफ्ते से बिहार भी बुरी तरह से कोरोना की चपेट में आ गया। राज्य में चिकित्सा सेवा की लचर हालात के कारण अधिकांश रोगी पटना का रुख करते हैं। कोरोना की दूसरी लहर में भी यही हुआ।

पटना का मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर भी इन्हें संभालने के लिए नाकाफी था। हॉस्पिटल, आईसीयू, ऑक्सीजन, रेमडेसिविर, फेविपिराविर , एंबुलेंस... चारों ओर हाहाहाकार मचने लगा। पुरुषोत्तम सिंह के पास पहले से ही डॉक्टर्स का नेटवर्क था। वे मरीजों की आवश्यकता में मदद करने लगे। लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी थी। पटना के एक नामी हॉस्पिटल में कोविड के मरीज के मरणोपरांत परिजन उनकी लाश को छोड़कर चले गए। अब समस्या यह थी कि इसका अंतिम संस्कार कौन करेगा। पुरुषोत्तम सिंह आगे आते हैं। फिर उनकी टीम। कोविड मरीजों की अन्य प्रकार से सहायता से लेकर अभी तक ये अनेक ऐसे शव का अंतिम संस्कार करवा चुके हैं, जिन्हें लेने से परिजनों ने इंकार कर दिया था। साथ ही ऐसे परिजनों की मदद भी करते रहे हैं जो मृतकों के शव को ले जाने या उनके अंतिम संस्कार करने में असमर्थ हैं।

इसके साथ ही पुरुषोत्तम सिंह बताते हैं कि उनकी जानकारी में ऐसे अनेक केस भी आए जहां लोग कोरोना के तमाम लक्षण होने के बावजूद न तो जांच करवा रहे थे और न सही इलाज करवा रहे थे। इनमें से कई लोग दोस्त, रिश्तेदार या फिर नीम-हकीम से पूछ्कर बिना मतलब की दवाओं का सेवनकर कर और अधिक बीमार हो रहे थे। आस्था फाउंडेशन ने ऐसे लोगों तक नि:शुल्क डॉक्टरी परामर्श मुहैया करवाने का काम भी किया। कोरोना पीड़ितों की मदद के बीच भी पुरुषोत्तम सिंह लोगों को डायबिटिज के खतरे से आगाह कराते रहते हैं क्योंकि यह कोमोरबिडिटी कोरोना के खतरे को कई गुणा बढ़ा देती है। इस बीच भी वे लोगों को जितना और जहां संभव हो वाक करते रहने की सलाह देते हैं।

वन इंडिया से बात करते हुए पुरुषोत्तम सिंह कहते हैं कि सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है। डर उन्हें भी लगता है, इस बीच में कई मुश्किल परिस्थितियां भी आईं। लेकिन उन्होंने अपने डर को ही सबसे बड़ा साहस बना लिया। वे कहते हैं कि आज भी वे पटना के कदमकुआं , सालिमपुर अहरा गली नंबर 1 में स्थित आस्था फाउंडेशन के कार्यालय में बैठकर कॉल का ही इंतजार करते रहते हैं। इस संकट की घड़ी में वे लोगों से भी सबकी मदद करने की अपील करते हैं लेकिन साथ ही हिदायत भी देते हैं कि दूसरों की सेवा से पहले अपनी सुरक्षा भी सुनिश्चित करना जरूरी है। वे कहते हैं कि वे बिना मास्क, फेस-शील्ड और पीपीई किट के न तो अस्पताल में रोगियों की मदद के लिए जाते हैं न श्मशान में अंतिम संस्कार के लिए। सुरक्षा बहुत जरूरी है तभी हम निरंतर सेवा कर पाएंगे।

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