मांझी की सियासत नीतीश पर पड़ी भारी, क्या है भविष्य?
पटना। बिहार का सियासी बखेड़ा बुधवार को दिल्ली पंहुचा। नीतीश ने अपने समर्थक विधायकों का परेड राष्ट्रपति भवन में करवाया, पर उनकी इस कवायद का उन्हें क्या फायदा मिला? फिजुल की वर्जिश साबित हुई। आखिरकार मामले में राज्यपाल की चलनी थी। उन्हीं की चली। बिहार के राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी ने मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी को सदन का विश्वास हासिल करने के लिए कहा है।

मांझी अब 20 फरवरी को बजट सत्र के पहले दिन अपने विश्वास मत का प्रस्ताव पेश करेंगे। संवैधानिक तौर पर यही होना भी चाहिए। पर नीतिश इसे केन्द्र की पटकथा पर राज्यपाल का अमल बता रहे हैं। राष्ट्रपति से उन्होंने गुहार लगाई कि जल्द से जल्द विशेष सत्र बुलाकर मांझी को सदन का विश्वास हासिल करने को कहा जाए। यक-ब-यक नीतीश को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने की जल्दबाजी हो गई है। सूबे में मुख्यमंत्री अभी अपने पद पर बरकरार है और आनन-फानन में नीतिश कुमार ने विधायक दल की बैठक बुलायी।
मांझी को पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण बर्खास्त करवाया और खुद को विधायक दल का नेता भी चुन लिया। मांझी समर्थक पार्टी के इस फैसले के खिलाफ कोर्ट जा पहुंचे। कोर्ट में भी नीतीश को मुंह की खानी पड़ी। असल में नीतिश मांझी को और समय नहीं देना चाहते। पर राज्यपाल के फैसले से मांझी को अपने पत्ते खेलने का पूरा समय मिल गया है। भाजपा के शह पर मांझी अड़े हैं। कुल 111 में से 97 विधायकों की मौजूदगी में मांझी की जगह नीतीश कुमार को सर्वसम्मति से विधायक दल का नेता चुन लिया गया था।
यानी मांझी के पास अधिकतम 14 विधायकों का ही समर्थन बचा। कायदे से उनको अपना पद छोड़ देना चाहिए था, पर उन्होंने इस बैठक को ही अवैध बताते हुए पार्टी का फैसला मानने से इनकार कर दिया। उनकी दलील थी कि विधायक दल की बैठक मुख्यमंत्री ही बुला सकता है। पटना हाइकोर्ट ने उनके इस दावे को सही ठहराते हुए नीतीश को जेडीयू विधायक दल का नेता चुने जाने के फैसले पर रोक लगा दी है। सूबे के सियासी खींचतान में फिलहाल नीतीश के साथ 130 विधायक हैं। उधर बीजेपी के भरोसे मांझी ने भी मोर्चा संभालने का फैसला किया है, पर भाजपा की कुल संख्या को मिलाकर भी मांझी कागजी हिसाब में बहुमत आंकडा छूते नजर नहीं आ रहे।
इतने भर से नीतीश का संकट समाप्त नहीं हो जाता। उन्हें यह डर लगातार सता रहा है कि भाजपा के भरोसे मांझी कहीं उनके विधायकों की खरीद फरोख्त न शुरु कर दें। क्योंकि सूबे में यह चुनावी साल है। लिहाजा येन मौके पर सत्ता में बैठने के लाभ से भाजपा भी वंचित नहीं होना चाहेगी। क्योंकि सीमित समय की सत्ता जहां नीतिश के लिए चुनौती बन कर आयेगी। वहीं मांझी के लिए यह एक बेहतर मौका साबित हो सकता है।
हलांकि बिहार के सियासी खींचतान को लेकर भाजपा की क्या रणनीति है। यह अब तक साफ नहीं हो सका है। क्या भाजपा तुरंत विधानसभा चुनाव चाहती है? या जदयू के सियासी संकट को और गहरा होने देने में ही उसकी दिलचस्पी है? वैसे दिल्ली के विधानसभा चुनावों के फैसले के मद्देनजर भाजपा के लिए यह फैसला थोड़ा जटिल है। हालांकि यह बात भी साफ है कि जदयू के कलंह से भाजपा को किसी भी हाल में सियासी फायदा ही होना है। एक महादलित मुख्यमंत्री की बगावत जदयू वोट बैंक में तो खलल पैदा करेगी ही।
मांझी भी फिलहाल इसी रणनीति पर काम करते नजर आ रहे हैं। उनकी सीधा मानना है नीतिश और लालू मिलकर उनकी जितनी फजीहत करेंगे। महादलीत तबके में उनकी साख उतनी बढेगी और वे नीतिश के महादलीत वोट बैंक में उतनी ही सेंधमारी कर पायेंगे। यही उनकी ताकत होगी। जिसके दम पर वे भाजपा से मोलभाव भी कर पायेंगे। असल में नीतीश के बिहार की सोशल इंजीनियरिंग ने ही बिहार के दलितों के बीच भी एक नई चेतना जगाई है। अब यह तबका दूसरों के पीछे चलने के बजाय खुद अपना नेतृत्व चाहता है। मांझी उस तबके के इसी आकांक्षा की नुमाइंदगी कर रहे हैं। लिहाजा मांझी की रणनीति भाजपा के सहारे वे रबर स्टैंप छवि से मुक्ति पाने की है। पर, उनकी सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि गवर्नेंस के मोर्चे पर उनका रेकॉर्ड अच्छा नहीं रहा। सूबे में विकास कार्य ठप पड़ने लगा और कानून-व्यवस्था भी बिगड़ती गई।
ऊपर से मांझी के विवादास्पद बयानों ने सरकार की इमेज और खराब की। यही कारण रहा कि पिछले उपचुनाव के समय हाथ मिला चुके लालू-नीतीश को लगा कि जल्द ही होने जा रहे विधानसभा चुनाव में उतरने से पहले जनता के मन में उनकी सरकार की एक अच्छी छवि होनी चाहिए। नीतीश को फिर से बागडोर सौंपने का फैसला इसी चिंता के तहत किया गया। फिर भी बिहार के सियासी बिसात पर मांझी मोहरे चतुराई से चल रहे हैं। आम तौर पर लो प्रोफाइल के नेता माने जाते रहे मांझी के लिए फिलहाल सब तरफ से जीत दिख रही है। कल्पना कीजिए यदि गुप्त मतदान होने की हालत में मांझी यदि विश्वास मत हासिल करने में सफल रहे तो इस साल के अंत में होने वाले चुनाव तक सत्ता उनके ही हाथों में होगी। फिर वे अपनी शर्तों पर भाजपा के साथ मोलभाव करने की हालत में भी होंगे। यदि हार गए तो महादलितों का एक तबका उन्हें अपना नेता तो मान ही सकता है। वैसे भी सियासत यदि अवसरों को भुनाने की कला का नाम है तो भला मांझी क्यों किसी से पीछे रहें।
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